पाञ्चजन्य - राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक पत्रिका | Panchjanya - National Hindi weekly magazine

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  • सियासत के समुद्र में अटल प्रकाश स्तंभ
  • अटल 'अटल' हैं 'अटल' रहेंगे
  • विराट व्यक्तित्व के 'अटल' खलती रहेगी कमी
  • विश्व पटल पर गूंज अटल
  • परमाणु शक्ति से सज्ज हो देश यह था अटल जी का सपना
  • भावपूर्ण श्रद्धांजलि
'संघ न होता तो पार नहीं कर पाते सीमा'

'संघ न होता तो पार नहीं कर पाते सीमा'

जब बंटवारा हुआ तो मैं बस छह बरस का था। मेरा गांव बिल्कुल सीमा पर था। उन दिनों जब ज्यादा हालात खराब हुए तो हमारे गांव से भी पलायन होने लगा। 500 से ज्यादा सिखों का एक जत्था पाकिस्तान से हिन्दुस्थान आने के लिए तैयार हो गया। लेकिन तब तक कुछ बहुरूपिये मुसलमान गांव आ गए। मुसलमानों ने जत्थे के लोगों से कहा कि जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह की रियासत में हथियार लेकर आना मना है तो जिनके पास जो भी अस्त्र-शस्त्र हों, वे दे दें। जत्थे में जवान और बुजुर्ग दोनों थे। जवानों ने हथियार देने से साफ मना कर दिया। तो मुसलमान
‘भूख और भय से भरे चेहरे आज तक याद हैं’

‘भूख और भय से भरे चेहरे आज तक याद हैं’

बंटवारे के दिनों को याद कर मैं आज भी विचलित हो जाता हूं। इंसानियत तो कुछ बची ही नहीं थी। उन दिनों मेरा परिवार मुगलपुरा (लाहौर) में रहता था। मुगलपुरा में ही मेरा दफ्तर था। 1947 में मैं रेलवे में लिपिक था और संघ का स्वयंसेवक भी। उन दिनों जींद के एक गुरुद्वारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रथम वर्ष का प्रशिक्षण शिविर लगा था। शिविर में भाग लेने के लिए मैं जींद गया और उधर मार-काट शुरू हो गई। मेरे मुहल्ले मुगलपुरा में भी हिंदुओं को काटा-मारा गया। शिविर में श्रीगुरुजी भी आए हुए थे। माहौल खराब होने की खबर सुनकर
‘हर परिस्थिति में डटे रहे स्वयंसेवक’

‘हर परिस्थिति में डटे रहे स्वयंसेवक’

बंटवारे के समय रावलपिंडी में मैं नौवीं कक्षा में पढ़ता था। उस समय स्कूल से लेकर घर तक एक ही माहौल था कि हिन्दुओं को पाकिस्तान छोड़ना ही पड़ेगा। मेरे पिताजी नार्दन रेलवे में कर्मचारी थे। पिता जी के आए दिन स्थानांतरण होते रहने के कारण हम लोगों के रहने का ठिकाना भी बदलता रहता था। लेकिन दूसरी ओर पाकिस्तान के हालात भी दिन-प्रतिदिन खराब होते जा रहे थे। हिन्दुओं के घरों, दुकानों को निशाना बनाया जाने लगा। कुछ ही दिन में सैकड़ों लोगों का कत्लेआम कर दिया गया। उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक पूज्य गुरुजी ने पा
‘...जब नेहरू ने बुजुर्ग को जड़ दिया थप्पड़’

‘...जब नेहरू ने बुजुर्ग को जड़ दिया थप्पड़’

बंटवारे के समय मैं छह साल का था। छोटी उम्र होने के कारण ज्यादा याद नहीं लेकिन इतना जरूर याद है कि गांव में एक अज्ञात भय व्याप्त था। ज्यादातर लोग अपने घर में बंद रहते थे। हमारे मोहल्ले के चारों तरफ मकान थे लेकिन बीच में एक बहुत बड़ा मैदान था। उसमें हमारी गायें बंधी रहती थीं। एक तरफ से प्रवेश था। घर का प्रवेश द्वार बड़ा था। शाम होते ही वह दरवाजा बंद कर दिया जाता था। मुझे याद है हमारे घर की छत पर बड़े- बड़े कड़ाहों में तेल गरम करने की व्यवस्था की गई थी, ताकि मुसलमान अगर घर पर हमला करेंगे तो दरवाजे को तोड़ने में उन्ह
निवेश का राजमार्ग लाएगा रोजगार

निवेश का राजमार्ग लाएगा रोजगार

उत्तर प्रदेश में देश के शीर्ष उद्योगपति बड़ी पूंजी लगाकर कारोबार की शुरुआत करने जा रहे हैं। इससे राज्य के 2,00000 बेरोजगारों को रोजगार मिलने की संभावना है। उम्मीद है कि यह राज्य भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाएगा
विश्व की आर्थिक शक्ति के रूप में उभरेगा भारत !

विश्व की आर्थिक शक्ति के रूप में उभरेगा भारत !

विश्व की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था विकास के दम पर भारतीय अर्थव्यवस्था फ्रांस को सातवें स्थान पर छोड़ते हुए दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है।
जीएसटी से राजस्व में हुई बढ़ोतरी, हुए ढेरों फायदे

जीएसटी से राजस्व में हुई बढ़ोतरी, हुए ढेरों फायदे

केंद्र सरकार का कड़ा विरोध करने वाली राज्य सरकारें इस देश में मौजूद हैं। पर इन सरकारों के वित्त मंत्रियों ने जीएसटी काउंसिल के फैसलों से सहमति दर्शाई है। इससे साफ होता है कि जीएसटी का ट्रक ठीक दिशा में चल निकला है और कुछ रोड़ों-अड़चनों के बाद यह पूरी रफ्तार पकड़ लेगा।

'खबर का चयन सोझ समझकर करें'

भारतीय जनसंचार संस्थान आईआईएमसी के फाउंडेशन डे पर वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद महादेव दास नालापत ने अपने विचार रखे। वर्तमान में वह आईटीवी समूह के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं। उन्होंने फेक न्यूज झूठी खबरों को देश में नासूर की तरह बताया। उन्होंने पत्रकारों की भूमिका राष्ट्र के लिए कैसी होनी चाहिए इसे बड़े सुंदर तरीके से समझाया। उन्होंने कहा कि जिस तरह मानव शरीर में किडनी की बड़ी की भूमिका होती है। वह रक्त को साफ करती है और शरीर के अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालती है। उसी तरह पत्रकार की देश के लिए भी बड़ी जिम्मेदा
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‘देवदूत थे स्वयंसेवक’

‘देवदूत थे स्वयंसेवक’
बंटवारे की त्रासदी सात दशक बाद भी भूले नहीं भूलती। जब हिन्दू मां-बहनों पर खुलेआम आततायी मुसलमानों द्वारा अत्याचार किया जा रहा था, घर-दुकान, व्यवसाय को तहस-नहस करके परिवार के परिवार मौत के घाट उतार दिए जा रहे थे। यहां तक कि गर्भवती महिलाओं तक को मुसलमानों ने नहीं छोड़ा। उनके गर्भ पर वार करके पेट से बच्चा निकालकर सूली पर टांग कर उसकी हत्या की गई। ऐसी निर्दयता भला जीते-जी कौन भूल सकता है! 1940 में मैं संघ का स्वयंसेवक बन गया। 1947 में पंजाब एवं पास के क्षेत्रों के स्वयंसेवकों के लिए फगवाड़ा में संघ का शिविर लगा
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‘स्वयंसेवकों ने दिया सेना का साथ’

‘स्वयंसेवकों ने दिया सेना का साथ’
विभाजन के समय मेरी आयु 7 वर्ष की थी। मैं मीरपुर में रहता था। यह बड़ा ही समृद्ध और पढ़े-लिखे लोगों का इलाका था। 15 अगस्त, 1947 को जब विभाजन के कारण पाकिस्तान से हिन्दू भारत आ रहे थे, उस समय मीरपुर के लोगों को आशा थी कि जम्मू-कश्मीर राज्य के राजा हरि सिंह का क्षेत्र होने के कारण इसका भारत में ही विलय होगा। मुजफ्फराबाद या आस-पास के क्षेत्रों से जो पलायन हो रहा था, मीरपुर के हिन्दुओं ने उन्हें अपने में ही बसा लिया और वह 7-8 हजार लोग इन हिन्दू परिवारों में ही समा गए। इस प्रकार मीरपुर की आबादी जो कि 10-12 हजार थी व
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'जो कुछ हूं संघ की बदौलत हूं'

बंटवारे के दौर की रातों को पाकिस्तान से आना वाला कोई भी हिन्दू नहीं भूल सकता, हिन्दुओं के घरों को आग लगा दी जाती थी, बहन-बेटियों का अपहरण कर लिया जाता था। हत्याएं होती थीं।। मैं उस समय 8 वर्ष था। मेरे बड़े भाई एवं चाचा मुल्तान के पास स्थित डेरा इस्माइल खान में संघ की शाखा लगाया करते थे। पांच वर्ष का होने पर मैं भी शाखा में जाने लगा। मुझे याद है बंटवारे के समय जब ज्यादा माहौल खराब होने लगा तो हमारे चाचा जी स्वयंसेवकों के साथ छत पर पहरा दिया करते थे ताकि हिन्दू मोहल्ले में आततायी हमला न करने पाएं। क्योंकि हमार
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‘नहीं भूलते बंटवारे के दिन’

‘नहीं भूलते बंटवारे के दिन’
 बंटवारे के वक्त मैं नागपुर में संघ का तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा था। इस बीच पाकिस्तान की ओर से हिन्दुओं के पलायन की खबरें आनी शुरू हुर्इं। संघ अधिकारियों ने वर्ग को जल्दी समाप्त कर दिया ताकि सीमापार रहने वाले स्वयंसेवक अपने परिवार की मदद कर सकें। नागपुर से मैं फगवाड़ा आया, जहां संघ का शिविर लगा हुआ था और पूज्य गुरुजी वहां आए हुए थे। पाकिस्तान के हालात को देखकर शुरुआत में गुरुजी का आग्रह था कि लोग अपनी जमीन और घर न छोड़ें। लेकिन दिनोदिन स्थिति जब बहुत खराब होने लगी तो उन्होंने स्वयंसेवकों से
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‘रास्ते में बिछी थीं लाशें’

‘रास्ते में बिछी थीं लाशें’
बंटवारे के दिनों के बारे में जब भी सोचता हूं तो एक अजीब सी उलझन होने लगती है। उन दिनों पाकिस्तान में जहां भी हिन्दू रह रहे थे, वे सभी डरे हुए थे कि कब क्या हो जाए। मेरी माता जी का देहांत हो जाने के कारण मेरा लालन-पालन बुआ जी के पास हुआ। तब मेरी उम्र 8 वर्ष थी। अचानक एक दिन हमारे मुहल्ले में भी हालात खराब हो गए। स्थिति इतनी ज्यादा खराब थी कि पलायन ही एक मात्र रास्ता सभी को सूझ रहा था क्योंकि आस-पास के हिन्दू परिवार जब शाम को एक स्थान पर एकत्र होते थे तो पाकिस्तान के विभिन्न स्थानों पर मुसलमानों द्वारा हिन्दु
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‘मुसलमानों ने बर्बरता की हदें पार कीं’

‘मुसलमानों ने बर्बरता की हदें पार कीं’
बात उन दिनों की है जब मेरे बड़े भाईसाहब सेना मुख्यालय से जुड़े एक सरकारी दफ्तर में काम करते थे। कुछ दिन बाद उनका स्थानांतरण लाहौर हो गया। उस समय मैं मैट्रिक पास कर चुका था। तो भाईसाहब ने कहा कि गांव से लाहौर चले आओ तो यहां नौकरी मिल जाएगी। मुझे याद है कि मैं 8 जुलाई,1946 को लाहौर पहुंच गया। भाई की मदद से दो-तीन दिन बाद ही नौकरी मिल गयी। कुछ दिन कार्य करने के बाद 1 अक्तूबर,1946 को मुझे एक विदेशी कंपनी में बाबू की नौकरी मिल गई। मैंने कंपनी के पास में ही एक किराए का कमरा लिया। इसी के पास संघ की शाखा लगती थी। उस
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‘स्वयंसेवकों ने मदद की तो आया जीवन में स्थायित्व’

‘स्वयंसेवकों ने मदद की तो आया जीवन में स्थायित्व’
मेरा गांव गदाई, डेरा गाजी खान से दो मील दूर था। गदाई में 1942 में संघ की शाखा शुरू हुई थी। नोनीत राय जी हमारे मुख्य शिक्षक थे। वे डेरा गाजीखान से रोजाना आते और शाखा लगाते। वही हम स्वयंसेवकों को जगाते भी थे। उनकी मेहनत और संघ के प्रति निष्ठा देखकर अनेक लोग स्वयंसेवक बने। उनमें मैं भी एक था। जब हम लोग शाखा लगाते तो उस समय मुसलमानों की भीड़ इकट्ठी हो जाती थी। बाद में कई बार यही भीड़ हिंसा पर उतारू हो गई। इसके बावजूद शाखा चलती रही। शाखा से गांव के हिंदुओं को एक नई ऊर्जा मिलती थी और वही ऊर्जा उन्हें बंटवारे के बाद
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'रेडियो की एक घोषणा और माहौल बिल्कुल बदल गया'

देश विभाजन के समय मैं लगभग 10 साल का था। मेरा परिवार मुल्तान जिले की एक तहसील शूजाबाद में रहता था। मैंने कई ऐसी ह्दय-विदारक घटनाएं देखीं, जो अभी भी मुझे डरा देती हैं। शूजाबाद नगर के चारों ओर पक्की दीवारें थीं और आने-जाने के लिए चार दरवाजे। हिंदू परिवार नगर के अंदर रहते थे और मुस्लिम परिवार नगर से बाहर गांवों में। विभाजन से पूर्व बड़ों से ऐसा सुनने में आता था कि पाकिस्तान कभी नहीं बनेगा, विभाजन असंभव है तथा हम सभी यहीं रहेंगे। यानी लोगों में एक आत्मविश्वास था कि यह देश, शहर, घर आदि छोड़कर कहीं जाने वाले नहीं ह
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‘विलक्षण वीरता से भरे स्वयंसेवक’

‘विलक्षण वीरता से भरे स्वयंसेवक’
मुझे याद है 15 अगस्त,1947 का वह दिन, जब लाहौर सहित पूरे पश्चिम पंजाब और सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले हिन्दू-सिखों के घर धू-धू कर जल रहे थे। हजारों के काफिले में लोग सुरक्षित स्थान की तलाश में भारत की ओर भाग रहे थे। स्थान-स्थान पर अपहरण, लूटपाट और हत्याएं की जा रही थीं। रेलगाड़ियां चल तो रही थीं लेकिन भीड़ इतनी ज्यादा थी कि लोग डिब्बों की छतों पर बच्चों समेत बैठने को मजबूर थे। छतों पर बैठे कितने ही पटरियों के पास छिपे पाकिस्तानी मुसलमानों की गोलियों का शिकार हो गए। मैं उस समय लाहौर में था और मैंने लोमहर्षक घ
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विकास पथ पर बढ़ रहा भारत

विकास पथ पर बढ़ रहा भारत

नोएडा में सैमसंग द्वारा दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल इकाई की स्थापना ‘मेक इन इंडिया’ के तहत सबसे बड़ी उपलब्धि है। 2014 में ‘मेक इन इंडिया’ की घोषणा के बाद अब तक लगभग 40 मोबाइल फोन कंपनियों ने भारत में अपने संयंत्र लगाए हैं

अ.भा. भारतीय साहित्य परिषद ने मनायी मुंशी प्रेमचंद जयन्ती

अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की शिमला इकाई ने कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयन्ती के उपलक्ष्य में 31 जुलाई को शिमला के रोटरी टाउन हॉल में उनकी कहानियों की वर्तमान में प्रासंगिकता विषय पर विचार गोष्ठी एवं कविता पाठ का आयोजन किया।

समाज के प्रति हो पीड़ा और संवेदना का भाव

गत दिनों चित्रकूट में वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को लेकर कार्य कर रहे दीनदयाल शोध संस्थान की ‘प्रबन्ध समिति एवं साधारण सभा’ की दो दिवसीय बैठक संपन्न हुई।

सुधीर फड़के जी के गीतों में जीवन का स्पर्श था

सुधीर फड़के जी ने जिस तरह अपना जीवन व्यतीत किया, जो तेजस्विता, भावनाओं की उत्कटता उन्होंने अपने जीवन में पाई, उसी की झलक उनके गीतों में मिलती है।

पत्रकारिता से गायब होती नैतिकता

 यह कटु सच है कि सेकुलर मीडिया गैर-जिम्मेदार संस्था बन चुका है, ऐसी स्थिति में जनता और सरकार को यह जिम्मेदारी संभालनी होगी और उन्हें सही रास्ते पर लाने के लिए दबाव बनाए रखना होगा ऐसे समय में जब तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया नए-नए बनावटी मुद्दे खड़े करने में पूरी ऊर्जा लगा रहा है, क्षेत्रीय समाचार पत्र और चैनल एक उम्मीद बनकर उभरे हैं। खासतौर पर भारतीय भाषाओं से जुड़ा मीडिया देश के मुद्दों की ज्यादा वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत कर रहा है। रांची के ‘मिशनरीज आॅफ चैरिटी’ में जब बच्चों को बेचे जाने का

रेलवे कर्मचारियों ने किया प्रदर्शन

पिछले दिनों उत्तर रेलवे कर्मचारी यूनियन ने उत्तर रेलवे के दिल्ली स्थित मुख्यालय बडौदा हाउस पर सैकड़ों की संख्या में रेलवे कर्मचारियों की विभिन्न समस्याओं एवं विभाग में अधिकारियों के भ्रष्टाचार को लेकर विरोध प्रदर्शन किया।

पत्रकार को जिम्मेदारी का अहसास हो

पिछले दिनों पुणे में विश्व संवाद केंद्र और डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी के संयुक्त तत्वावधान में आद्य पत्रकार देवर्षि नारद पत्रकार सम्मान समारोह का आयोजन किया गया।

11-12 अगस्त को भोपाल में यंग थिंकर्स कॉन्क्लेव का आयोजन

आज के भारत की सबसे बड़ी पूंजी और सबसे बड़ी ताकत युवा हैं और ये युवा अपने देश के लिए कुछ करना चाहते हैं। अपने हुनर और कौशल से देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहते हैं।

सांप छछुंदर के खेल में फंसी कांग्रेस!

कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है। राहुल गांधी के इस बयान के बाद कांग्रेस की स्थिति सांप और छछुंदर जैसी हो गई है न तो कांग्रेस इस बयान से पलट सकती है न बयान पर टिकी रह सकती है।गौर करने वाली बात है कि क्या अब कांग्रेस में सभी अपने नाम के आगे मोहम्मद या मुगल लिखना शुरू कर देंगे। राहुल गांधी के इस बयान के बाद बेहतर है कि कांग्रेस के लोग अपने नाम के आगे मोहम्मद लिखना शुरू कर दें।
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