कांग्रेस का हाथ, किसके साथ!
| तारीख: 10/1/2012 9:49:22 AM |
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कांग्रेस का हाथ, किसके साथ!
लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का नारा याद है आपको? नारा था: कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ। कांग्रेस का हाथ आम आदमी के लिए तो क्रूर पंजा ही साबित हुआ है, पिछले आठ साल से बेलगाम बनी हुई महंगाई इसका प्रमाण है, पर आये दिन उजागर होने वाले घोटालों और देशविरोधी फैसलों से अब यह भी साफ होने लगा है कि आखिर सोनिया की कांग्रेस का हाथ है किसके साथ! एक लाख 76 हजार करोड़ रुपये के टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन में भी वह भ्रष्ट घोटालेबाजों के साथ था तो एक लाख 86 हजार करोड़ रुपये के घोटाले में भी वैसे ही किरदारों के साथ नजर आया। फर्क सिर्फ इतना है कि टू जी का ठीकरा द्रमुक के सिर फोड़ दिया गया था, लेकिन कोयले की कालिख सोनिया भक्त कांग्रेसियों के आंगन से होती हुई प्रधानमंत्री की दहलीज पर पहुंच गयी है। किसी भी जिम्मेदार और जवाबदेह सरकार को अपने इस आचरण पर शर्मिंदा होना चाहिए, पर कांग्रेस और शर्म तो दो परस्पर विरोधी चीजें हैं, सो, उलटे जनता की पीठ पर ही फिर कोड़ा फटकार दिया गया, डीजल पांच रुपये लीटर महंगा कर दिया गया, सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलेंडरों की संख्या साल में छह पर सीमित कर दी गयी। ये फैसले तो घोषित किये गये, पर प्रीमियम क्वालिटी के पेट्रोल-डीजल के दाम तो सरकार ने बिना घोषणा चोरी-छिपे ही बढ़ा दिये, वह भी मामूली नहीं, प्रीमियम पेट्रोल छह रुपए लीटर महंगा कर दिया और प्रीमियम डीजल 19 रुपये। अपने इन जन विरोधी फैसलों के बाद मनमोहन सरकार ने मल्टीब्रांड खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का फैसला भी सुना दिया, जिससे न सिर्फ घरेलू बाजार चौपट हो जायेंगे, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी फैलेगी, बल्कि देश की आर्थिक संप्रभुता भी खतरे में पड़ जायेगी। केंद्र में सत्तारूढ़ संप्रग से तृणमूल कांग्रेस की बगावत की कीमत पर भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का यह फैसला लेकर कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि उसका हाथ न इस देश के साथ है और न ही आम आदमी के साथ, उसका हाथ तो बस लूटतंत्र के साथ है--फिर चाहे वह स्वदेशी हो या विदेशी।
खायेंगे भी, गुर्रायेंगे भी
मायावती की बहुजन समाज पार्टी का चुनाव चिन्ह हाथी है, इसलिए राजनीति में खाने और दिखाने के दांत अलग-अलग होने का मुहावरा कुछ ज्यादा ही चल निकला है। पर यह चरितार्थ और भी कई राजनेताओं-दलों पर होता है। फिलहाल दो की ही बात करते हैं, करुणानिधि की द्रमुक और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी, एक कांग्रेस की अगुआई वाले संप्रग के अंदर है तो दूसरी सरकार को बाहर से समर्थन दे रही है। पिछले दिनों जब मनमोहन सिंह सरकार ने एक के बाद एक अनेक जन विरोधी फैसले किए तो विपक्षी दलों द्वारा आहूत भारत बंद में ये दोनों भी शामिल हो गये। जाहिर है, ये दल भी इन फैसलों को जन विरोधी मानते ही होंगे, लेकिन नाखून कटा कर शहीद बनने की यह कोशिश जल्द ही बेनकाब भी हो गयी। तृणमूल कांग्रेस के संप्रग से बाहर चले जाने से अल्पमत में आयी मनमोहन सरकार की बैसाखी बनने के लिए बसपा के साथ-साथ सपा भी उतावलेपन के साथ आगे आ गयी तो संप्रग समन्वय समिति की बैठक में द्रमुक ने भी फैसलों पर सहमति की मुहर लगा दी। है न कमाल की राजनीति? अंदरखाने माल भी खायेंगे और बाहर जनता को मूर्ख बनाने के लिए गुर्रायेंगे भी। कहना नहीं होगा कि ऐसे दोगले राजनेताओं-दलों को सबक सिखाने की जिम्मेदारी और जवाबदेही जनता की ही बनती है।
जिम्मेदारी से मुंह चुराते कप्तान
अपने जन विरोधी और देश विरोधी फैसलों को सही ठहराने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के नाम संदेश का विकल्प चुना। आमतौर पर जनता ही नहीं, मीडिया से भी बचने की कोशिश करने वाले प्रधानमंत्री के इस कदम का स्वागत भी किया जाता, अगर वह सच्चाई स्वीकार करने का साहस दिखा पाते। विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का भय दिखाते हुए प्रधानमंत्री ने देशवासियों से कहा कि अगर वह डीजल महंगा कर रसोई गैस की राशनिंग करते हुए मल्टीब्रांड रिटेल में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंजूरी नहीं देते तो 1991 सरीखे आर्थिक हालात पैदा हो जाते। यहां ध्यान दिला दें कि तब केंद्र में कांग्रेस के बाहरी समर्थन से बनी चंद्रशेखर सरकार थी और देश में भुगतान संतुलन सरीखा गंभीर आर्थिक संकट पैदा हो गया था; उसके बाद पी. वी. नरसिंह राव की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार आयी, जिसमें अप्रत्याशित रूप से मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बनाये गये। मनमोहन बतौर वित्त मंत्री खुद को देश की अर्थव्यवस्था का खेवनहार बताते नहीं थकते। पर अब जबकि पिछले आठ साल से वह ही प्रधानमंत्री हैं, तब 1991 सरीखे आर्थिक संकट की आहट के लिए किसी अन्य को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है? इस स्वाभाविक सवाल से अर्थशात्री प्रधानमंत्री देश के नाम संदेश में भी मुंह चुरा गये।