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'इंजीनियर' बना किसान"

'इंजीनियर' बना किसान

तारीख: 10/13/2012 3:26:46 PM

'इंजीनियर' बना किसान

आज के अर्थवादी युग में लोग अच्छे और आरामदायक जीवन की आकांक्षा लिए शहर की ओर रुख कर रहे हैं। किन्तु बिहार में सीतामढ़ी जिले के परसौनी गांव निवासी श्री संजीव कुमार कुछ अलग ही सोच रखते हैं। वे पुणे से आइटी इंजीनियरिंग करने के बाद एक बड़े संस्थान में नौकरी कर रहे थे। पर इस दौरान इनका लगाव अपने गांव के प्रति कम नहीं हुआ। पिता की मृत्यु के बाद ये अपने आप को गांव आने से नहीं रोक पाये और गांव आ गए। उन्होंने गांव को हरा-भरा करने के लिए अभियान शुरू किया। वहीं जैविक खेती और खाद के फायदे देख उत्साहित हुए और वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादन करने लगे। इससे दर्जनों ग्रामीण बेरोजगारों को रोजगार मिल रहा है। इनके परिसर में दस मीटर लंबे, पांच मीटर चौड़े एवं चार फीट गहरे सीमेंट के बक्सानुमा 16 गड्ढे हैं। सभी में चालीस दिन पर ढाई क्विंटल जैविक खाद तैयार होती है। श्री कुमार जैविक खाद का उत्पादन कर हरित क्रांति का अलख जगा रहे हैं। वहीं अपने खेत में पुदीना, मेंथी, आतवार की खेती कर रहे हैं। वे जैविक खाद के  उत्पादन के लिए किसानों को प्रशिक्षित भी कर रहे हैं। इनके प्रयास से किसान जहां रासायनिक खाद के बदले वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग करने लगे हैं, वहीं परंपरागत फसल की जगह औषधीय पौधे की खेती कर रहे हैं। पसौनी के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी ने भी उनकी पहल को अनुकरणीय करार दिया है। आज श्री कुमार के कारण ही क्षेत्र के पढ़े-लिखे युवाओं में कृषि कार्य के प्रति उत्साह बढ़ा है।

उनकी आंखों में रोशनी नहीं है

पर शिक्षा की रोशनी फैला रहे हैं

गोपालगंज जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर पश्चिम कोन्हवां गांव के सकलदीप शर्मा आज समाज में उदाहरण बन चुके हैं। वे 1991 में जब दसवीं कक्षा के छात्र थे तो उन्हें पता चला कि उनके मस्तिष्क में ट्यूमर है। इसके कारण वे बोर्ड की परीक्षा नहीं दे पाये।  ऑपरेशन के दौरान उनकी आंखों की रोशनी चली गयी। उनके पिता सीमा सड़क संगठन में कार्यरत थे, लेकिन सेवानिवृत्ति के उपरांत वे घर चले आये। इससे सकलदीप को थोड़ी राहत मिली। पर यह सहारा भी ज्यादा दिन नहीं रहा और उनके पिता की मृत्यु हो गयी। लेकिन उन्होंने इन कठिनाइयों के सामने हार नहीं मानी बल्कि डटकर उनका सामना किया। गांव के गरीब बच्चों को सुबह-शाम पढ़ाने लगे। गांव के उत्क्रमित मध्य विद्यालय में शिक्षकों की कमी थी, तो उन्होंने 2007 में  बच्चों को नि:शुल्क गणित पढ़ाने का फैसला किया। अब इनके ऊपर मां और बहन की भी जिम्मेदारी थी। बाद में कोन्हवां मोड़ के विवेकानंद जूनियर हाई स्कूल में गणित तथा हिंदी पढ़ाने के लिए नियुक्त हुए। उन्होंने अपनी बहन की शादी सीवान के पुरौना में की। उनकी मां को माह में छह हजार रुपये पेंशन के रूप में मिलते हैं, जिससे दोनों मां-बेटे का काम चल जाता है। सकलदीप सुबह-शाम 60-60 बच्चों को नि:शुल्क गणित और हिंदी पढ़ाते हैं। वे खुद अपनी आंखों की रोशनी गंवाने के बावजूद गांव के बच्चों में शिक्षा की रोशनी फैला रहे हैं जो वाकई सराहनीय है।संजीव कुमार


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