परिवर्तन कैसा?
-सरोज व्यास
| तारीख: 10/22/2012 12:11:18 PM |
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आज स्त्री हर क्षेत्र की सीढ़ियां बड़ी तीव्रता के साथ चढ़ रही है। उसके परिवर्तित स्वरूप को देखकर हमें हर्ष भी हो रहा है और गर्व भी। आकांक्षाओं का खुला आकाश, उसके सुसंकल्पों के सामने सिमटती जा रही दसों दिशाएं, हवाओं से बातें करते उसके अटल इरादे, इन सभी को आज दुनिया बड़े आदर से देख रही है। रास्ते खुद 'रास्ता' देने लगे हैं, उसके हौसले को। ये गर्वीले चरण अब अतीत की बेड़ियों की सख्ती भूल रहे हैं, वे घाव भूल रहे हैं, जो उन्हें हर कदम पर दे दिये जाते थे। पुरुषत्व के नाम पर, ढाये गये अत्याचार आज किसी हद तक कम तो हुए हैं, लेकिन इतने भी कम नहीं कि उनको भुलाया जा सके। आज भी महिलाओं की मनोदशा समझने वाले पुरुष वर्ग का दायरा विशाल तो नहीं कहा जा सकता। गांवों, कस्बों, पहाड़ी अंचलों की स्त्रियां तो आज भी वही यातनाएं, वही पीड़ाएं चुपचाप भाग्य के नाम पर सहती आ रही हैं। जिसका एकमेव कारण, उनकी अज्ञानता ही कह सकते हैं। शिक्षा का अभाव उनके जीवन में जब तक रहेगा, आर्थिक असमर्थता जब तक कायम है, यह अंधेरा मिटने वाला नहीं। शहरों, महानगरों में शिक्षा को अपनी जीविका का आधार बनाने वाली युवतियों के जीवनस्तर को हम विकास के उजाले से ओतप्रोत देख सकते हैं। ऐसा नहीं है कि गांवों में कोई लड़की पढ़ती ही नहीं। पढ़ लेती है थोड़ा-बहुत, पर पूरी तरह अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाती। या तो उसकी शिक्षा में कई बाधाएं रहती हैं, या फिर वह घरेलू वातावरण, जो परंपरागत होने के अपने स्थाई 'स्वभाव' को बदल ही नहीं पाता। अधूरी शिक्षा, विवाह की जल्दी, उन्हें फिर उसी गर्त्त में पहुंचा देती है, जहां से वह निकलने का प्रयास कर रही होती हैं। फिर वही चक्र, पति, सास, ससुर, बच्चे, रिश्तेदार और समाज। इसी चक्रव्यूह में उलझी वह अपना मुखड़ा दर्पण में देखने तक का समय नहीं निकाल पाती।
लेकिन निकट भविष्य में ऐसे हालात नहीं रहने वाले। जिस तेजी से स्त्रियों के जीवन में परिवर्तन हो रहा है, वह उनको उनके लक्ष्य तक पहुंचाने में अवश्य सफल रहेगा। यह परिवर्तन हम आज देख ही रहे हैं। इतिहास की स्त्री और आज की आधुनिक स्त्री में जो फर्क दिख रहा है, उसे हम अनदेखा नहीं कर सकते। कहां तो अपना शील बचाने के लिए जीवन उत्सर्ग का ज्वलंत उदाहरण 'जौहर' और कहां आज के 'सेक्स रैकेट्स'? कहां बलिदान, त्याग का अति उच्च उदाहरण देती, अपने बेटे को कुर्बान करने वाली 'पन्ना धाय' और कहां आज बच्चों को अस्पतालों से चुराती महिलाएं? कहां युद्ध के मैदानों में अपने शौर्य के झंडे गाड़ने वालीं दुर्गावती, लक्ष्मीबाई और कहां आज आतंक के डर से कांपती बेबस स्त्रियां? कहां सिर से पांव तक आवरण से ढंकी, शर्मीली महिला और कहां कपड़ों को तीव्रता से उतार फेंकती युवतियां?
परिवर्तन हुआ है, मगर यही परिवर्तन स्त्रियों को फिर से उसी अंधेरे गर्त्त में न धकेल दे, इसकी आशंका अवश्य होने लगी है। आधुनिकता की चरम उत्कंठा, जल्दी से पैसा कमाकर, ऐशोआराम के जीवन की चाह स्त्री को स्त्रीत्व से दूर कर रही है। परिवार और बच्चों के लिए वांछनीय समर्पण स्त्री खोती जा रही है। स्त्री के चिन्तामुक्त जीवन की हर कोई कामना कर रहा है, लेकिन बेढंगे, अश्लील स्त्री जीवन की कामना एक स्वस्थ समाज कैसे करे? समाज की रीढ़ की हड्डी अगर खोखली होती जायेगी तो यह समाज किस आधार पर गर्व से तन कर खड़ा रह पायेगा? स्त्री के लिए सकारात्मक परिवर्तन की नितांत आवश्यकता है लेकिन ऐसे भोंड़े, खोखले आवरण की कदापि नहीं। स्त्री की गरिमा, स्त्री का सम्मान उसके अपने हाथ में है। यह समाज उस स्त्री को देखना पसंद करेगा, जिसने अपने व्यक्तित्व को ज्ञान से, धैर्य से, समर्पण से, सम्मान से, शील से संवारा है। जिसमें विज्ञान के बढ़ते ज्ञान की किरणें हों, जिसमें ममत्व का ठोस सहारा हो, जिसमें शालीनता हो, जिसमें सूरज से आंख मिलाने की हिम्मत हो। भारत की ऐसी नारी अपना 'स्व' अवश्य जानती है, ऐसा विश्वास है मुझे।