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भारतीय स्वाभिमान और शौर्य का उदघोष
१९ मे २०१३
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पाञ्चजन्य
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फिर मजहबी उन्माद"
फिर मजहबी उन्माद
तारीख: 10/27/2012 11:22:58 AM
मेरे
लिए
वर्तमान
ही
सब
कुछ
है।
भविष्य
की
चिन्ता
हमें
कायर
बना
देती
है
,
भूत
का
भार
हमारी
कमर
तोड़
देता
है।
-
प्रेमचन्द
(गोदान, पृ. 201)
फिर
मजहबी
उन्माद
उत्तर
प्रदेश
में
समाजवादी
पार्टी
का
शासन
मजहबी
उन्मादियों
व
हिन्दू
विरोधियों
के
लिए
मानो
खाद
-
पानी
का
काम
कर
रहा
है।
इससे
प्रोत्साहन
पाकर
वे
जहां
चाहे
वहां
अराजकता
फैलाने
को
तत्पर
दिखते
हैं।
अखिलेश
सरकार
के
7
माह
के
शासन
में
फैजाबाद
आठवां
स्थान
है
जहां
मजहबी
उन्मादियों
ने
उत्पात
मचाया
,
परिणामस्वरूप
वहां
हिंसा
में
दो
लोगों
की
मौत
हो
गई
,
करीब
दो
दर्जन
लोग
घायल
हो
गए
और
तीन
दर्जन
वाहन
फूंक
दिए
गए।
मां
दुर्गा
की
प्रतिमाओं
के
विसर्जन
कार्यक्रम
के
दौरान
व्यवधान
उत्पन्न
करने
और
जुलूस
में
शामिल
लड़कियों
-
महिलाओं
से
छेड़छाड़
से
शुरू
हुआ
उत्पात
5
स्थानों
पर
हिंसा
में
बदल
गया।
इससे
पहले
बरेली
,
गाजियाबाद
,
प्रतापगढ़
,
कोसी
कलां
और
असम
हिंसा
की
आड़
में
कानपुर
,
लखनऊ
व
प्रयाग
में
मजहबी
उन्मादियों
ने
हिंसा
का
तांडव
रचा
था।
इन
दंगों
में
प्रदेश
में
अब
तक
एक
दर्जन
से
ज्यादा
मौतें
हो
चुकी
हैं।
लेकिन
सरकार
इन
तत्वों
पर
अंकुश
लगाने
में
पूरी
तरह
विफल
रही
है।
ये
एक
के
बाद
दूसरे
स्थान
पर
हिंसा
की
आग
फैलाते
नजर
आते
हैं
और
प्रदेश
में
साम्प्रदायिक
हिंसा
का
ग्राफ
बढ़ता
जा
रहा
है
,
मानो
इन
अराजक
व
मजहबी
उन्मादी
तत्वों
को
इसकी
खुली
छूट
दे
दी
गई
हो।
नवरात्र
महोत्सव
से
पहले
अयोध्या
में
मां
देवकाली
की
प्रतिमा
खंडित
किए
जाने
से
ये
संकेत
मिल
गए
थे
कि
मजहबी
उन्मादी
फिर
से
सामाजिक
सौहार्द
को
बिगाड़ने
का
मंसूबा
पाले
हुए
हैं।
फैजाबाद
की
घटनाओं
ने
इसकी
पुष्टि
कर
दी।
समाजवादी
पार्टी
ने
जिस
मुस्लिमपरस्त
राजनीति
की
नाव
पर
बैठकर
विधानसभा
चुनावों
की
वैतरणी
पार
की
,
उससे
स्पष्ट
संकेत
मिल
गए
थे
कि
राज्य
में
अब
खुलकर
हिन्दू
विरोधी
वातावरण
बनेगा
और
मजहबी
उन्मादियों
के
हौसले
बढ़ेंगे
,
लेकिन
फिर
भी
एक
उम्मीद
थी
कि
शायद
अखिलेश
यादव
के
युवा
हाथों
में
शासन
आने
से
मुलायम
सिंह
यादव
की
मुस्लिम
तुष्टीकरण
की
मुहिम
कुछ
धीमी
होगी
और
राज्य
के
विकास
व
सामाजिक
सौहार्द
को
वरीयता
दी
जाएगी।
परंतु
अब
लगता
है
कि
कट्टर
मुस्लिम
ताकतें
सपा
सरकार
से
अपने
वोट
की
पूरी
कीमत
वसूल
रही
हैं
और
अखिलेश
सरकार
उनके
सामने
बेबस
नजर
आ
रही
है
,
उन
पर
उसका
कोई
नियंत्रण
नहीं
दिखता।
सरकार में अपना वर्चस्व दिखाने की इमाम अहमद बुखारी व आजम खां की प्रतिद्वंद्विता ने इस सरकार की कमजोरी पहले ही उजागर कर दी है। अब इसी कमजोरी की आड़ में मजहबी उन्मादी न केवल हिन्दू पर्व-त्योहारों पर सौहार्द को बिगाड़ने में लगे हैं, बल्कि हिन्दू आस्था से भी खिलवाड़ का षड्यंत्र रचा जा रहा है। अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि के साथ लगी भूमि पर मस्जिद बनाने की साजिश इस सरकार की मुस्लिमपरस्त राजनीति को ही हवा देने का परिणाम है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति पलोक बसु के माध्यम से इसकी रूपरेखा तैयार किया जाना यह साफ कर देता है, लेकिन अयोध्या का संत समाज जिस तरह इस षड्यंत्र के विरोध में उठ खड़ा हुआ है और विश्व हिन्दू परिषद के संरक्षक श्री अशोक सिंहल ने जिस तरह कठोर चेतावनी दी है, उससे इस सरकार को चेत जाना चाहिए कि यदि वह हिन्दू आस्थाओं से खिलवाड़ करके मुस्लिम तुष्टीकरण के रास्ते पर चलकर मजहबी उन्मादियों को खुली छूट देगी तो अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारेगी।
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