ते एहि ताल चतुर रखवारे
| तारीख: 10/29/2012 11:32:24 AM |
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ते एहि ताल चतुर रखवारे
पिछले दिनों पूरे देश में दशहरे के पर्व के कारण श्रीरामलीला के मंचन की धूम रही। यद्यपि श्रीरामकथा के आदि कवि महर्षि वाल्मीकि हैं और उनके बाद व्यास-कालिदास-भास-भवभूति आदि संस्कृत के कवियों ने उसे अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया, किन्तु हिन्दी (अवधी) में गोस्वामी तुलसीदास जी के द्वारा प्रस्तुत श्रीरामचरितमानस के बाद एक सामान्य व्यक्ति के चित्त पर जो चित्र गहराई से अंकित है, वह तुलसी के द्वारा प्रस्तुत राम का ही है, उन्हीं की पंक्तियां दैनन्दिन व्यवहार की सूक्तियों में बदल गई हैं। तुलसीदास ने रामचरित को मानस के रूपक में निबद्ध करते हुए प्रारंभ में ही कहा है कि जो इस चरित्र का सावधानीपूर्वक गान करते हैं वे ही इस मानसरोवर के सचेत और पटु रक्षक हैं -
जे गावहिं एहि चरित संभारे,
ते एहि ताल चतुर रखवारे।।
श्रीरामचरित से भी महत्वपूर्ण हो जाती है श्रीरामकथा, जैसे श्रीराम से भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है श्रीराम का नाम - यह गोस्वामी जी की मान्यता है। रामचरित जब एक सही व्याख्याकार के द्वारा निरूपित किया जाता है तब वह किसी गौरवमय ऐतिहासिक अध्याय से बहुत आगे बढ़कर स्वाध्याय की संज्ञा पा जाता है, दृश्य ही नहीं वह दर्पण भी बन जाता है। इसी बिन्दु पर स्मृति में जागता है एक नाम जिसने अपनी अलौकिक प्रतिभा के द्वारा 'मानस' की अद्भुत व्याख्या करते हुए गोस्वामी जी की दृष्टि और दर्शन का सम्यक् निरूपण किया तथा उनकी 'पटु रक्षक' वाली उद्भावना का उदाहरण अपनी वाणी को बनाया। वह नाम है (स्व.) पण्डित रामकिंकर जी उपाध्याय का, संयोगवश नवम्बर के महीने की पहली तारीख़ उनकी जन्मतिथि है। पण्डित जी ने सामान्यत: प्रवचन ही दिये हैं, जो पुस्तकाकार प्रकाशित हो जाने के बाद अब प्रवचन-साहित्य की अमूल्य निधि हैं, किन्तु उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखी हैं जो अपनी विचार-सरणि तथा प्रभावोत्पादक भाव-व्यंजना के कारण उनके विपुल साहित्य के मध्य विशेष चर्चा का विषय बनी हैं। मानस चतु:शती के उपलक्ष्य में प्रकाशित 'मानस- मुक्तावली' के चार खण्ड, जिनमें मानस की चार सौ चौपाइयों की व्याख्या है और मानस तथा श्रीमद्भागवत की दृष्टियों की समन्वित प्रस्तुति 'तुलसी सिन्धु राघव माधुर्यमूर्ति माधव' सहृदय रामकथारसिकों और विश्रुत विद्वत्-वर्ग के मध्य पर्याप्त चर्चित-अर्चित रही हैं। आज उनका श्रद्धान्वित स्मरण करते हुए उनके एक प्रवचन का समापन -अंश और उन्हीं के द्वारा रचित कुछ कविता-पंक्तियां उद्धृत करता हूं । 'तुलसीदास मेरी दृष्टि में' के बीच पण्डित जी कहते हैं -' 'एक बार मुझसे किसी ने पूछा - महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की, उन्हें आदि कवि कहा जाता है पर गोस्वामी जी कहते हैं कि भगवान् शंकर ने रामायण की रचना की है। अब यदि वाल्मीकि आदि कवि हैं तो फिर भगवान् शंकर ने रामायण की रचना महर्षि वाल्मीकि से पहले की या बाद में? और यदि पहले की तो महर्षि आदि कवि कैसे कहे गये? मैंने उनसे यही कहा कि यदि बाल्मीकि आदि कवि हैं तो भगवान् शंकर अनादि कवि हैं। आदि व्यवहार का सत्य है, और अनादि शाश्वत सत्य है अत: दोनों का ही आनन्द लेने का प्रयास करना चाहिये।'
'तुलसी रघुनाथ गाथा' में पण्डित जी की काव्य-पंक्तियां गोस्वामी जी के प्रति उनके भावोद्वेलन की छन्दोबद्ध प्रस्तुति हैं -
जीवन जिया था पिया दुख के हलाहल को
आपने पिलाया प्रेम अमिय सुबानी से
चारों ओर छाई थी निराशा की अंधेरी रात
आपने जलाई ज्योति ज्ञान की सुबानी से,
नीति प्रीति स्वार्थ परमार्थ का समन्वय हो
ऐसी अनहोनी सिखलाई दिव्य वाणी से
ज्ञानी कहूं भक्त कहूं या कि कर्मयोगी कहूं
किंकर कृतार्थ हुआ आपकी सुबानी से।
गोस्वामी जी के 'मानस' से युग कृतार्थ हुआ तो पण्डित जी की मानस-व्याख्या से। रामबोला तुलसी और रामकिंकर युग-तुलसी को रामकथारसिकों का पुन: पुन: प्रणाम्।
अमृत-कलश की छलकन
'पाञ्चजन्य' के सुपरिचित लेखक, राष्ट्रवादी चेतना और चिन्तना के पर्याय श्री शिवकुमार गोयल जी ने 31 अक्टूबर, 2012 को कर्मशील जीवन के 74 वर्ष पूर्ण कर अब अमृत-जयन्ती वर्ष में प्रवेश कर लिया है। उनकी अविराम साहित्य-साधना को निरूपित करती हैं उनकी तीस से भी अधिक प्रकाशित पुस्तकें, कुछेक उनकी वैचारिक दृष्टि के सहज संवाहक हैं - हिमालय के प्रहरी, क्रान्तिकारी सावरकर, धर्मक्षेत्रे, विलक्षण विभूति लाल हरदेवसहाय, धर्मनिरपेक्षता के घातक परिणाम आदि। उनकी नव्यतम कृति है, 'चुनौतियों से घिरा भारत' (प्रकाशक- हिन्दी साहित्य सदन, 2 बी. डी. चैंबर्स 10/54 देशबन्धु गुप्ता रोड, करोलबाग, नई दिल्ली - 5, मूल्य - 100 रु. मात्र)। वरिष्ठ चिन्तक प्रो. देवेन्द्र स्वरूप का इस संकलन में समाहित लेखों के प्रति अभिमत है - 'इस संकलन का प्रत्येक लेख राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा के सामने खड़े खतरों एवं सामाजिक जीवन के नैतिक स्खलन के प्रति उनकी चिन्ता को ध्वनित करता है, उदात्त नैतिक मूल्यों के प्रति नई पीढ़ी के मन में आस्था जगाने के लिये परम्परा बोध का सहारा लेता है, इतिहास के प्रेरणादायी महापुरुषों एवं प्रसंगों का स्मरण दिलाता है, राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के सामने खड़ी समकालीन चुनौतियों का विश्लेषण करता है।.......... एक सजग एवम् अध्ययनशील पत्रकार के नाते उनका प्रत्येक लेख बहुत ही सरल और कथात्मक शैली में अतीत के आलोक में वर्तमान परिवेश को जीवन्त कर देता है और भविष्य की दिशा बताता है।'
भूमिका के रूप में पुस्तक को उपलब्ध श्री देवेन्द्रजी की इस सुचिन्तित समीक्षा के बाद तो सिर्फ़ इसके अध्ययन का आग्रह ही सहृदयों से किया जा सकता है और कुछ कहने को रह नहीं जाता। ......मैं जब कभी गोयल जी के विराट्- विभ्राट् कृतित्व और उनके धर्मप्रवण व्यक्तित्व के सन्दर्भ में विचार करता हूं तो ऐसा लगता है कि उनके रूप में समय के धन्वन्तरि के हाथ में एक अमृत-कलश है और राष्ट्रानुराग से आपूरित उनकी हर कृति जैसे उस अमृत-कुंभ की छलकन है जिसका सेवन चैतन्य देता है, नवोन्मेश देता है, सहज स्फूर्ति प्रदान करता है। हर प्रात: किसी समाचार पत्र में उनका स्तम्भ जागरण के शंखनाद की तरह निनादित होता है और जीवन के प्रति निष्ठा जगाता है, सकारात्मकता की तरंगों को उत्पन्न करता है। उनके जैसे व्यक्तित्वों का स्वस्थ रहते हुए शतायु होना, उससे भी आगे जाना समाज के लिये स्वस्तिप्रद है। 'पाञ्चजन्य' के वृहद् पाठक-परिवार की ओर से उन्हें अशेष शुभकामनाएं देते हुए प्रभु से प्रार्थना करता हूं कि शिवकुमार जो कार्तिकेय की तरह अप्रतिम और अप्रतिहत रहते हुए, दिव्यताओं का नेतृत्व करते हुए, अराष्ट्रीयता के तारकासुर पर शब्द-शर संधान करते हुए उसे पराभूत करें। पुन: देवेन्द्र जी के शब्दों में - यह लेखनी चलती रहे
अभिव्यक्ति मुद्राएं
जब मैं छोटा बच्चा था,
सपनों का गुलदस्ता था।
- डा. श्याम सखा श्याम
खुद पे क्योंकर कभी नहीं उठतीं,
कैसी बेशर्म उंगलियां हैं ये ?
बादशाहों के पास क्या होंगी
हम फकीरों की मस्तियां हैं ये।
- सत्य प्रकाश
सब की हां में हां न मिला,
इतनी तो खुद्दारी रख।
हाथ बंधे हों तो भी क्या,
दिल में तो चिनगारी रख।
- मुकुट सक्सेना