आवरण पृष्ठ
हमारे बारे मे
प्रसार
संपर्क
लेखक
पुराने अंक
भारतीय स्वाभिमान और शौर्य का उदघोष
२२ जुलाई २०१२
Go
पाञ्चजन्य
Like Minded
» विशेष
» मंथन
» चर्चा सत्र
» संपादकीय
» बात बेलाग
» दृष्टिपात
Advertisment
सत्ता के विश्वास"
सत्ता के विश्वास
तारीख: 7/14/2012 4:47:55 PM
साहित्यिकी
सत्ता
के
विश्वास
डा
.
दयाकृष्ण
विजय
'
वर्गीय
'
कोटि
कुटीर
अंधेरे
डूबे
मांगें
आज
उजास
,
भ्रम
ही
सिद्ध
हुए
अब
तक
के
सत्ता
के
विश्वास।
गये
प्रतीक्षा
करते
-
करते
वर्ष
पैंसठ
बीत
,
धनिकों
से
ही
लोकतंत्र
ने
अब
तक
जोड़ी
प्रीत
;
दिया
योजनाओं
तक
ने
वंचित
को
वनवास।
भ्रम
ही
सिद्ध
हुए
अब
तक
के
सत्ता
विश्वास।
वचनों
से
तो
कभी
न
लगती
सत्ता
हुई
दरिद्र
,
मसली
किन्तु
न
क्वारे
हाथों
में
जा
सकी
हरिद्र
;
मीठे
स्वप्न
देखते
मन
के
सपने
हुए
उदास।
भ्रम
ही
सिद्ध
हुए
अब
तक
के
सत्ता
के
विश्वास।
बदला
प्रथम
योजनाओं
के
चिन्तन
का
गन्तव्य
,
जोड़ें
डाल
-
पात
को
बिसरा
धरती
से
मन्तव्य
,
पीछे
-
पीछे
दौड़
चलेगा
अपने
आप
विकास।
भ्रम
ही
सिद्ध
हुए
अब
तक
के
सत्ता
के
विश्वास।
*
हरिद्र
-
पीला
चंदन
प्रथम ५०० खबरे
Terms of use
Privacy Policy
Copyright
© by Panchjanya All Right Reserved.
Image Gallery