२२ जुलाई २०१२
           
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सत्ता के विश्वास"

सत्ता के विश्वास

तारीख: 7/14/2012 4:47:55 PM

साहित्यिकी

सत्ता के विश्वास

डा. दयाकृष्ण विजय 'वर्गीय'

 

कोटि कुटीर अंधेरे डूबे मांगें आज उजास,

भ्रम ही सिद्ध हुए अब तक के सत्ता के विश्वास।

 

गये प्रतीक्षा करते - करते

वर्ष पैंसठ बीत,

धनिकों से ही लोकतंत्र ने

अब तक जोड़ी प्रीत;

दिया योजनाओं तक ने वंचित को वनवास।

भ्रम ही सिद्ध हुए अब तक के सत्ता विश्वास।

 

वचनों से तो कभी लगती

सत्ता हुई दरिद्र,

मसली किन्तु क्वारे हाथों

में जा सकी हरिद्र;

मीठे स्वप्न देखते मन के सपने हुए उदास।

भ्रम ही सिद्ध हुए अब तक के सत्ता के विश्वास।

बदला प्रथम योजनाओं के

चिन्तन का गन्तव्य,

जोड़ें डाल - पात को बिसरा

धरती से मन्तव्य,

पीछे-पीछे दौड़ चलेगा अपने आप विकास।

भ्रम ही सिद्ध हुए अब तक के सत्ता के विश्वास।

* हरिद्र- पीला चंदन

 


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