१५ जुलाई २०१२
           
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परमतत्व की प्राप्ति आसान नहीं"

परमतत्व की प्राप्ति आसान नहीं

तारीख: 7/7/2012 2:42:19 PM

धर्म-दर्शन-अध्यात्म

परमतत्व की प्राप्ति आसान नहीं

 हृदयनारायण दीक्षित

वैज्ञानिकों की जिज्ञासा प्रशंसनीय है। जो ईश्वर बोध का विषय था वही अब शोध का विषय बन गया है। दावा है कि 'गॉड पार्टीकल' यानी ईश्वरीय  कण लगभग देख लिया गया है। दावे को सही मानें तो गॉड/ईश्वर कोई भौतिक संरचना है और इस संरचना का सबसे छोटा कण वैज्ञानिकों द्वारा देखा जा चुका है। लेकिन कथित गॉड पार्टीकल वास्तविक नाम नहीं है। शोधकर्त्ता अंग्रेज वैज्ञानिक हिग्स व भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्र नाथ बोस के नाम पर परीक्षण में देखे गए उपपरमाणु का नाम 'हिंग्स बोसान' रखा गया है। वैज्ञानिक दरअसल सृष्टि संरचना के मूल कारण के शोध में संलग्न हैं। वे मानते आए हैं कि सृष्टि भार वाले भौतिक परमाणुओं से बनी है। लेकिन इस सिद्धांत में झोल थी। प्रश्न था कि भारयुक्त परमाणुओं को जोड़ने का काम करने वाला कोई परमाणु या बल भी होना चाहिए। कह सकते हैं कि भारतीय चिन्तन का ईश्वर, ब्रह्म या विश्वकर्मा जैसा कोई बल/अणु/परमाणु/ उनकी जिज्ञासा था। सिद्धांत यह है कि भाररहित परमाणुओं को भार देने वाले उपपरमाणुओं का अपना भार नहीं होता। बिना भार वाले परमाणुओं से ब्रह्माण्ड नहीं बनता। भार शून्यता के चलते सभी पदार्थों के परमाणु गतिशील तो होंगे लेकिन जुड़ नहीं सकते। हिंग्स बोसोन सिद्धांत के अनुसार यहां खाली जगह में परमाणु को भार देने वाले कण मौजूद हैं। इनका कोई भार या द्रव्यमान नहीं होता। वैज्ञानिक इन्हें देख चुके हैं और इसी का नाम 'हिंग्स बोसोन' या 'गॉड पार्टीकल' बता रहे हैं।

द्रव्यविहीन चेतना

ऊर्जा का कोई भार नहीं होता। भार के कारण ही सृष्टि बनी। तब प्रश्न है कि भार कहां से आया? अब कुछेक 'भारविहीन' - ऊर्जा कण भी देखे गये हैं। समझने के लिए कह सकते हैं कि कुछेक कणों में चेतना ऊर्जा तो है लेकिन उनका शरीर नहीं। सभी प्राणियों में चेतना है, लेकिन अदृश्य है, शरीर दृश्य भाग है। 'द्रव्यविहीन चेतना' भारतीय वैदिक साहित्य की प्राचीन अनुभूति है। तुलसीदास के रामचरित मानस का ब्रह्म ध्यान देने योग्य है-

पग बिनु चलई सुनै बिनु काना

कर बिनु कर्म करै विधि नाना।

तुलसी का ब्रह्म बिना पैरों के ही चलता है और वह बिना हाथ के ही अनेक काम करता है। वैज्ञानिकों का भाररहित कण भी ऐसा ही है। लेकिन भारतीय अनुभूति का ब्रह्म, ईश्वर या परमात्मा बड़ा प्यारा है। इसे किसी देवदूत या पैगम्बर की घोषणा के अनुसार नहीं माना गया। यहां ऋग्वेद से लेकर उपनिषद्, ब्राह्मण, आरण्यक, पुराण और रामायण, महाभारत होते हुए दयानंद, विवेकानंद तक अतिरिक्त जिज्ञासा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और असीम अनन्त के प्रति अतिरिक्त आस्था है। सत्य खोजी वैज्ञानिक दृष्टि है। सृष्टि रहस्यों के प्रति गजब की जिज्ञासा है। ऋग्वेद में विश्वकर्मा की स्तुति है, लेकिन जिज्ञासा है कि सृष्टि सृजन के पूर्व वे सृष्टि सृजन की सामग्री लाए कहां से? इसी तरह विश्वप्रतिष्ठ नासदीय सूक्त (ऋ0 10.129) में असत् और सत् के भी पूर्वकाल की जिज्ञासा है। अणु जैसे सूक्ष्म घटक की जानकारी उपनिषद् काल में भी थी। कठोपनिषद् में कहते हैं 'वह अणु से भी छोटा है और विराट से भी बड़ा है, वह शरीर में है लेकिन अशरीरी है। अर्थात् भाररहित है।'

वैज्ञानिकों को बधाई! वे सृष्टि संरचना के रहस्य जानने के लिए श्रमरत हैं। वैज्ञानिक प्रयोग से प्राप्त निष्कर्षों के अनुसार भाररहित उपपरमाणुओं व भारसहित परमाणुओं की टकराहट से पृथ्वी, चन्द्र, तारामण्डल आदि ग्रहों का निर्माण हुआ होगा। हालांकि यह निष्कर्ष अंतिम नहीं है लेकिन भाररहित परमाणुओं की चर्चा ध्यान देने योग्य है। बेशक भौतिकी के लिए यह एक नया पड़ाव है पर भारतीय अनुभूति में यहां कोई नई बात नहीं है। ऋग्वेद (10.72.6) में इन्हीं परमाणुओं को देव कहा गया है- 'हे देवो आपके नृत्य से उत्पन्न धूलि से पृथ्वी बनी।' ऋग्वेद में इसके पहले (10.72.2) कहते हैं 'परमसत्ता ने अव्यक्त को लोहार की धौंकनी की तरह पकाया।' इस पर आचार्य श्रीराम शर्मा की टिप्पणी है 'इसे वर्तमान विज्ञान विंगवैंग कहते हैं।' फिर बताते हैं कि 'असत् से सत् आया।' (वही 3) असत् भारहीन अदृश्य स्थिति है और सत् दृश्यमान अस्तित्व।

वैदिक चिंतन

भाररहित कण का प्रतीक भारतीय वैदिक चिन्तन में छाया हुआ है। आधुनिक वैज्ञानिक उसके दृश्यमान भाग को हिंग्स बोसोन कहते हैं, वैदिक ऋषि उसे सम्पूर्णता में ब्रह्म या ईश्वर कहते हैं। मुण्डकोपनिषद् (2.9) में कहते हैं 'वह परम आकाश में सब जगह उपस्थित है, कलाओं से रहित है, अवयवशून्य और निर्मल है। 'श्वेताश्वतर उपनिषद् (6.19) उसे 'निष्कलं (कला रहित) शान्तं, निरवद्यं, निरंजनम्' कहती है। मासलेस-भाररहित के लिए वैदिक ऋषियों के शब्द प्रयोग दिलचस्प है। ईशावास्योपनिषद् यजुर्वेद का चालीसवां अध्याय है। इसके आठवें मंत्र में उसे अकायं-काया रहित, अस्नविरम् - स्नायु रहित, शुद्ध बताते हैं। लेकिन मूलभूत प्रश्न यह है कि 'हिंग्स बोसोन' ही गॉड पार्टीकल क्यों है? हिंग्स बोसोन सिद्धांत भी मानता है कि इन कणों के अभाव में सृष्टि सृजन असंभव था। सृष्टि के हरेक पदार्थ के सृजन में इन्हीं कणों की भूमिका है। ईशावास्योपनिषद् के ऋषि ने सरस्वती सूखने के बहुत पहले ही घोषणा की थी 'ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किचं जगत्यां जगत्' - इस सर्वस्व जगत् में ईश्वर की ही उपस्थिति है। सब तरफ ईशावास्य ही है।

हिंग्स बोसोन कणों को ही 'गॉड पार्टीकल' कहना उचित नहीं है। इस जगत् का हरेक अणु परमाणु 'गॉड पार्टीकल'- ब्रह्म कण ही है। उस भाररहित (मास लेस) निर्मल, प्रशान्त, निष्कल, निरंजन का ही दृश्यमान चेहरा है यह जगत्। विज्ञान की सीमा है। लेकिन परमसत्ता/ईश्वर अनन्त और असीम है। ईशावास्योपनिषद् (मंत्र 5) में कहते हैं-तद् दूरे, तद्वन्तिके, तदन्तस्य सर्वस्य तदु सर्वस्याय वाह्यत: - वह अति दूर होता है लेकिन समीप होता है। वह हमारे भीतर है और सबको बाहर से भी घेरता है। 'गॉड का पार्टीकल'- ईश्वर का कण खोजने की जिज्ञासा प्रशंसनीय है लेकिन सच बात दूसरी है। ईश्वर पदार्थ नहीं है। इसलिए उसका कण कैसे होगा? हरेक कण, अणु, परमाणु और छन्द वाणी स्पंदन, स्थिरता और गतिशीलता में उसी की सर्वशक्तिमान समुपस्थिति है।

विज्ञान की सीमा

विज्ञान की सीमा है। वह पदार्थ का विवेचन करता है। वह पदार्थ गति और ऊर्जा के रिश्ते खोजता है। वह ज्ञात से अज्ञात में प्रवेश करता है। अज्ञात को ज्ञात की परिधि में लाता है। बेशक सृष्टि रहस्य खोजे जा सकते हैं लेकिन सृष्टि में ही अन्तर्भूत सृष्टा का रहस्य अज्ञात की परिधि में नहीं, अज्ञेय के विस्तार में होता है। विश्वविख्यात चीनी दार्शनिक लाउत्सु ने 'ताओ तेह चिंग' लिखी थी। बताया है 'अंधकार से प्रकाश आया। अरूप से रूप व्यवस्था आई।' यहां ऋग्वेद का दोहराव है। वह ब्रह्म या ईश्वर की जगह ताओ का प्रयोग करता है। लिखा है कि 'ज्ञान या तर्क से उसका बोध नहीं होता। उसमें चाहे जितना जोड़ो, घटाओ, फर्क नहीं पड़ता। 'वृहदारण्यक उपनिषद्' में हजारों बरस पहले कहा गया था 'वह पूर्ण है, यह पूर्ण है। पूर्ण में पूर्ण घटाओ तो पूर्ण ही बचता है।' मुण्डकोपनिषद (2.2.10) में कहते हैं 'वहां न सूर्य हैं न चांद, न तारे, न अग्नि, न विद्युत। केवल उसकी आभा से ही यह सब प्रकाशमान है।' सारे प्रकाश उसी की दीप्ति हैं। वृहदारण्यक (1.5.2) में कहते हैं 'संचरन च, असंचरन च - वह गतिशील है, स्थिर भी है।' तैत्तिरीय उपनिषद् (2.6) में कहते हैं, 'वह निरुक्त है, अनिरुक्त है, निलयन है, अनिलयन है, विज्ञान है, अविज्ञान है।' केनोपनिषद् का ऋषि इसीलिए एक उदात्त घोषणा करता है, नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च - मैं यह नहीं मानता कि मैं उसे ठीक से जानता हूं, न यह मानता हूं कि मैं उसे नहीं जानता।' वैज्ञानिकों की यात्रा का स्वागत है। उनके निष्कर्ष भारतीय प्राचीन ज्ञान को सही ठहरा रहे हैं। लेकिन परम तत्व की प्राप्ति आसान नहीं। परमतत्व पाना ही है तो यन्त्रवत्-मशीनी होकर नहीं मन्त्रवत् स्तोता होकर प्रयत्नशील होना चाहिए।


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