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भारतीय स्वाभिमान और शौर्य का उदघोष
२६ अगस्त २०१२
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बनो भगीरथ "
बनो भगीरथ
तारीख: 8/20/2012 11:47:44 AM
साहित्यिकी
बनो
भगीरथ
आचार्य
देवेन्द्र
'
देव
'
रखे
हाथ
पर
हाथ
सखे
!
क्या
सोच
रहे
हो
उठो
और
कोई
अभिनव
संकल्प
जगाओ।
जो
झिझोड़
कर
रख
दे
अलसाये
जन
-
मानस
,
हुंकारों
के
ऐसे
कोई
गीत
सुनाओ।।
आजादी
आए
यों
पैंसठ
वर्ष
बीत
गए
,
पर
न
वास्तविक
उसका
कोई
सुख
मिल
पाया।
भोली
-
भाली
जनता
के
सीधे
प्रश्नों
को
,
नेताओं
ने
कुटिल
उत्तरों
में
उलझाया।।
कष्ट
-
निवारण
हेतु
धूर्त
कुछ
धुरंधरों
ने
,
निज
कुलनामी
अभिमंत्रित
ताबीज
दे
दिए।
निष्क्रियता
से
भाव
-
भूमि
बंजर
कर
दी
,
फिर
,
बोने
को
कुछ
आशाओं
के
बीज
दे
दिए।।
तुम
उनके
तिलस्म
के
सब
तंत्रों
को
तोड़ो
विद्रोहों
की
क्रांतिधर्मिणी
फसल
उगाओ।।
बहती
गंगा
में
जो
धोते
हाथ
कभी
थे
आज
उसी
में
घुसे
डुबकियां
लगा
रहे
हैं।
घोल
दिए
जल
-
धारा
में
मन
के
सब
कल्मश
तन
,
उनके
देखो
कैसे
जगमगा
रहे
हैं।
असंभाव्य
है
स्वाभिमान
के
वंशधरों
को
जो
उसकी
दो
बूंदें
भी
अधरों
तक
लाएं।
दूषित
कल्माओं
के
आगे
झुकने
से
तो
उनको
बेहतर
लगता
है
प्यासे
मर
जाएं।।
प्यास
बुझाने
को
मानी
इस
चातक
दल
की
,
बनो
भगीरथ
,
नयी
गंग
धरती
पर
लाओ।।
माना
अंग्रेजों
का
राज्य
गया
है
,
लेकिन
राज्य
-
नीति
से
अभी
नहीं
अंग्रेज
गए
हैं।
कूटनीतियों
-
वश
जाने
से
पहले
ही
वे
अपनी
दत्तक
सन्तति
यहां
सहेज
गए
हैं।
उलझा
जन
-
सामान्य
उन्हीं
के
चक्रव्यूह
में
किंकर्तव्यविमूढ़
हो
रहा
है
उसका
मन।
कुरुक्षेत्र
में
पार्थ
-
सरीखा
शीश
झुकाकर
खोल
-
खाल
वह
बैठ
गया
तूणीर
,
शरासन।
यदि
सचमुच
तुम
नाश
चाहते
हो
कुरुओं
का
केशव बन फिर पाञ्चजन्य के स्वर धधकाओ।।
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