१९ मे २०१३
           
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सुदर्शन अर्थात् 'सु-दर्शन'"

सुदर्शन अर्थात् 'सु-दर्शन'

तारीख: 9/22/2012 2:39:33 PM

शारीरिक क्षमता और बौद्धिक सम्पदा का अनूठा संगम

सुदर्शन अर्थात् 'सु-दर्शन'

संघ की सबसे छोटी सांगठनिक इकाई 'गट' से अपना संघ जीवन प्रारंभ करने वाले दिवंगत सुदर्शन जीने अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख एवं शारीरिक प्रमुख के रूप में कार्य करते हुए अपनी सभी क्षमताओं का परिचय दिया। संघ का वैचारिक आधार दिग्विजयी हिन्दुत्व, पश्चिम का भौतिकवादी विचार दर्शन और विश्व को दिशा देने में भारत आज भी सक्षम इत्यादि विषयों पर गहरी पकड़ वाले सुदर्शन जी का एक-एक वाक्य तर्कसंगत और व्यावहारिक होता था। भारतीय तत्व ज्ञान के वे धनी थे।

 

  नरेन्द्र सहगल

पांचवें सरसंघचालक ने वाशिंगटन तक छोड़ा

आध्यात्मिक ज्ञान का सुदर्शन चक्र

भारत की सार्वभौम उज्ज्वल संस्कृति के निष्ठावान अध्येता दिवंगत सुदर्शन जी के चिंतन की धाक उस समय पूरे विश्व के विद्वानों पर जमी जब उन्होंने वाशिंगटन में आयोजित स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण के शताब्दी समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखे। उन्होंने पाश्चात्य जीवन दृष्टि के चार आधारभूत स्तंभों 1-अस्तित्व के लिए संघर्ष 2-सर्वशक्तिमान का अस्तित्व 3-प्रकृति का शोषण 4-वैयक्तिक अधिकार, को वर्तमान अशांति का कारण बताया। सुदर्शन जी ने सिंहगर्जना की 'हिन्दू जीवन दृष्टि इनमें से किसी भी सिद्धांत से सहमत नहीं है। हमारे अनुसार एक ही परम तत्व सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है-सर्वं खल्विदं ब्रह्म और इसलिए सर्वत्र सहयोग एवं सामंजस्य ही हो सकता है। आज संसार में जो भी संघर्ष हमें दिखता है उसका कारण है हमारा अज्ञान यानी माया (भौतिकवाद)। एक बार यह अज्ञान मिटा तो संघर्ष समाप्त हो जाएगा।

अपने इसी भाषण में सुदर्शन जी ने संसार में लगी सर्वोपरि बनने की दौड़ का हल भी हिन्दुत्व दर्शन को बताकर कहा 'हम केवल सर्वोत्तम के अस्तित्व के सिद्धांत से भी सहमत नहीं हैं। हम तो सभी के अस्तित्व की रक्षा चाहते हैं 'सर्वेभवन्तु सुखिन:।' भौतिकवादी कहते हैं कि जो कमाएगा सो खाएगा। हिन्दू कहते हैं कि जो जन्मा है सो खाएगा, जो खाएगा सो खिलाएगा। खुद कमाना और खुद ही खाना है प्रकृति। दूसरों से छीनना और खाना है विकृति। स्वयं कमाना और दूसरों को खिलाना है संस्कृति। किसी भी संस्कृति की ऊंचाई इस बात से मापी जाती है कि उसमें अपने दुर्बल, वृद्ध और अपंग सदस्यों को खिलाने की कितनी क्षमता है। समस्त यूरोपवासियों सहित पूरे विश्व को सुदर्शन जी द्वारा दिया गया यह संदेश स्वामी विवेकानंद द्वारा दिए गए उस भाषण की वर्तमान आवश्यकता थी जिसमें कहा गया था 'यूरोप में सर्वत्र सबल की विजय और दुर्बल की मृत्यु का सिद्धांत प्रचलित है। पर भारत वर्ष में हर सामाजिक नियम दुर्बल की रक्षा के लिए है।' संघ के पांचवें सरसंघचालक सुदर्शन जी पूरे विश्वास से कहा करते थे कि भारतीय तत्व ज्ञान ही संसार में सामंजस्य और अमन चैन की स्थापना का सशक्त आधार बन सकता है और बनेगा भी।

सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण के लिए आवश्यक है

भारतीय तत्व ज्ञान का आधार

प्रकृति के खुले विनाश की वजह से खतरे में पड़ चुकी सृष्टि को बचाने का एकमात्र मार्ग हिन्दुत्व ही है। इस सिद्धांत को समूचे विश्व के आगे रखते हुए राष्ट्र तपस्वी श्री सुदर्शन ने अपने वाशिंगटन में दिए भाषण में स्पष्ट कहा था 'हिन्दू विचार प्रकृति के शोषण का समर्थन नहीं करता अपितु दोहन करता है। हमको प्रकृति से केवल उतना ही लेने के लिए कहा गया है जितना हमारी उचित आवश्यकताओं के लिए जरूरी है। इसे हमने साध्य किया है। हम कहते हैं प्रकृति माता, धरती माता, गोमाता, गंगा माता और तुलसी माता। हम पीपल और वट को पूजते हैं, हम चीटियों, कौवों को खिलाते हैं और सांपों को भी दूध पिलाते हैं। प्रकृति की प्रत्येक वस्तु की हम पूजा करते हैं। हम उनका शोषण कदाचित नहीं करते जिनके प्रति हमें आदर और प्यार है। हमारे यही जीवनदर्शन हमें प्रकृति का शोषण करने से रोकते हैं।

सुदर्शन जी का प्रत्येक वाक्य तर्कसंगत और समयानुसार सटीक होता था। अपने इसी भाषण को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने पाश्चात्य जगत को दिशा देने का कर्तव्य निभाया। हिन्दू विशुद्ध वैयक्तिक अधिकारों में विश्वास नहीं करते। क्योंकि हिन्दू जीवन दृष्टि के अनुसार व्यक्ति एक बड़ी इकाई का अंग है। वह शेष जगत से अंगांगी भाव से जुड़ा है। जैसे हाथ, पैर, आंख, कान इत्यादि शरीर के अवयव हैं इसी प्रकार हम परिवार को शरीर मानें तो उसके सदस्य उसके अवयव हैं। इसी प्रकार परिवार समाज का, समाज मानव जाति का, मानव जाति प्रकृति का और प्रकृति परमात्मा का अंग है। इस प्रकार व्यक्ति से लेकर परमात्मा तक हम सब अंगांगी भाव से जुड़े हुए हैं। और जहां यह उच्च भाव है वहां अधिकारों का वर्चस्व नहीं होता।... यदि अधिकार की बात करनी ही है तो वह है कर्तव्य करने का अधिकार अर्थात् सब अपना-अपना कर्तव्य करें तो सब को शांति मिलेगी और इसी मार्ग से राष्ट्र और विश्व की प्रगति होगी। इस प्रकार की समग्र जीवन दृष्टि और भारत के जीवनोद्देश्य के स्पष्ट दर्शन के साथ सुदर्शन जी ने पश्चिम के समृद्ध भौतिकवाद का अवलोकन किया। उन्होंने स्वामी विवेकानंद द्वारा कहे गए शब्दों हमारे राष्ट्रजीवन का उद्देश्य है 'अध्यात्म और त्याग' को पुन: दोहराया। उनके इस वक्तव्य को वाशिंगटन सहित पूरे यूरोप में बहुत प्रशंसा मिली।

देश को चाहिए एक राष्ट्रीयता को मान्यता देने वाला

हिन्दुत्व आधारित स्वदेशी संविधान

अंग्रेज शासकों द्वारा थोपी गई राजनीतिक, आर्थिक और शैक्षणिक इत्यादि पाश्चात्य व्यवस्थाओं को सुदर्शन जी भारत की प्राय: सभी समस्याओं की जड़ मानते थे। पाञ्चजन्य के नवोदय अंक (26 जनवरी, 1992) में उन्होंने लिखा था, 'भारत ने स्वतंत्र होते ही यदि वह सब कुछ भूलना प्रारंभ कर दिया होता जो अंग्रेजों ने अपने साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उसे सिखाया था तो शायद आज उसकी यह दुर्दशा न होती। देश में उठ रहे अलगाववादी स्वर, आतंकवाद का बढ़ता दायरा, राजनेताओं की बढ़ती दिशाहीनता तथा उनके द्वारा तात्कालिक स्वार्थपूर्ति के लिए जाति, पंथ, भाषा की कोमल भावनाओं को उजाड़ने की दुष्प्रवृत्ति और देश का आर्थिक विकास दिवालिएपन के कगार पर पहुंच जाना, इन सबका उद्गम उन सारे मिथकों में खोजा जा सकता है जिन्हें अंग्रेजों ने योजनाबद्ध रीति से शिक्षित वर्ग के मस्तिष्क में बोने का प्रयास किया था।' भारतीयता से कट रहे भारतीय समाज की वर्तमान दशा से सुदर्शन जी बहुत चिंतित हो जाते थे।

पाश्चात्य व्यवस्थाओं को सुरक्षित रखने वाले भारतीय संविधान पर उनका गहरा अध्ययन एवं रुचि थी। उनके अपने शब्दों 'इस संविधान के निर्माण में मौलिक चिंतन का अभाव रहा है...यह अंग्रेजों द्वारा निर्मित 1935 के गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट' का ही एक परिवर्तित संस्करण है जिसमें कुछ बातें अमरीका, फ्रांस आदि देशों से ली गई हैं। भारत की वास्तविकताएं, यहां की समाज रचना के मूल तत्व, इस देश की परंपराएं और यहां की आवश्यकताएं आदि का विचार करते हुए अपना संविधान नहीं बनाया गया। इसलिए उसमें सर्वसाधारण की जनाकांक्षाएं प्रतिफलित नहीं होती।' सुदर्शन जी के अनुसार 'भारत की परंपरागत एक राष्ट्रीयता को नकार कर हमने खुद अपने हाथों से विघटन के बीज बोए हैं.. संविधान में उस सांस्कृतिक एकता की भावना के संपोषण की व्यवस्था हो जो हमारे देश की एकता का आधार रही है और जिसके बिना कोई भी संविधान परिणामकारी नहीं हो सकता।' अपने भाषणों में अनेक देशों के उदाहरण देते हुए सुदर्शन जी भारत के संविधान को यहां के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (हिन्दुत्व) के आधार पर पुन:निर्मित करने पर बल दिया करते थे। सुदर्शन जी के इन मौलिक विचारों को अनेक संघ विरोधियों का भी समर्थन मिलता था। वे कहते थे संविधान में समयोचित बदलाव हों।

अलगाववाद, जातिगत भेदभाव और सामाजिक कुप्रथाओं का

एकमात्र हल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद

समस्त हिन्दू समाज को जाति, पंथ, भाषा, मजहब की संकीर्णता से निकालकर एक समरस, संगठित और शक्तिशाली समाज के रूप में खड़ा करने के लिए जीवन-पर्यंत प्रयासशील रहे सुदर्शन जी ने मुम्बई से प्रकाशित निर्भय पथिक के डा.हेडगेवार विशेषांक (जनवरी 1989) में लिखा था, 'इस देश का हिन्दू समाज हजारों वर्षों तक समृद्धि एवं वैभव का जीवन जीने के बाद ईसा की नवमी और दशमी शताब्दियों में ऐसी रुढ़िग्रस्त अवस्था में पहुंच गया जहां गुण-कर्म पर आधारित वर्ण एवं जाति व्यवस्था को ऊंच-नीच का पर्याय मानकर हमारे ही लोगों ने राष्ट्र के उत्थान में बाधाएं खड़ी कर दीं। परिणामत: हिन्दू समाज अनेक प्रकार से विभक्त हो गया और राष्ट्र को निरंतर आठ सौ वर्षों तक परकीयों की दासता सहनी पड़ी।'

अक्तूबर, 2003 को नागपुर में अपने विजयादशमी उद्बोधन में सुदर्शन जी ने कथित दलित समस्या पर कहा, 'अपने ही समाज के एक वर्ग को दलित जैसे घृणित शब्द से संबोधित करना कहां तक उचित है? वास्तव में जो लोग विकास के निम्न स्तर पर हैं उनमें ऊपर उठने का आत्मविश्वास जगाना पहली आवश्यकता है। हमारी सोच यह है कि यह कार्य समाज को स्वयं करना होता है और यह कार्य तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित नेता लोग नहीं कर सकते। इस कार्य को सामाजिक एवं धार्मिक नेतृत्व को अपने हाथ में लेना चाहिए।' हिन्दू धर्मग्रंथों की गहरी जानकारी रखने वाले सुदर्शन जी कुरान और बाइबिल जैसे पवित्र ग्रंथों का अध्ययन भी करते थे। ज्ञान के इसी भंडार के आधार पर उन्होंने प्रयत्नपूर्वक मुस्लिम एवं ईसाई समाज में से राष्ट्रवादी नेतृत्व तलाशने का राष्ट्रीय कार्य प्रारंभ किया। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में अनेक मुसलमान एवं ईसाई नेताओं को प्रभावित करके उन्होंने भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के धरातल को सशक्त बनाने का अभियान छेड़ दिया था। वे इस्लाम के भारतीयकरण और स्वदेशी चर्च के पक्षधर थे। अपनी इस समन्वयकारी सोच के भवन का शिलान्यास करके सुदर्शन जी ब्रह्मलीन हो गए हैं। इसी सोच पर आधारित उज्ज्वल राष्ट्र जीवन का भव्य भवन खड़ा करने के काम में हम सब जुटे रहें, यही उनके प्रति हमारी वास्तविक श्रद्धांजलि होगी।


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