१६ सितम्बर २०१२
           
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लघु कथा : बरक्कत -राकेश भ्रमर-"

लघु कथा : बरक्कत -राकेश भ्रमर-

तारीख: 9/8/2012 3:38:08 PM

 

मास्टर दीनानाथ इण्टर कॉलेज में प्राध्यापक थे। अंग्रेजी, विज्ञान और गणित के बहुत अच्छे और गुणी अध्यापक थे। उनके पढ़ाने की कला पूरे कालेज में प्रसिद्ध थी। कालेज में पढ़ाने के साथ-साथ वह प्राइवेट ट्यूशन भी कर लेते थे। बोर्ड की परीक्षा के दौरान ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों की संख्या अधिक हो जाती थी।

वह अपने घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे। इसके लिए शाम का समय नियत था। अत: बच्चों को ट्यूशन के बाद घर पहुंचने में अक्सर अन्धेरी रात का सामना करना पड़ता था। इस स्थिति में जब किसी लड़की का पिता उनसे अपने घर पर आकर पढ़ाने के लिए कहता, तो वह मान जाते और समय निकालकर लड़की को उसके घर आकर पढ़ा आते थे।

दीनानाथ सिद्धान्तवादी व्यक्ति थे, परन्तु उदार भी बहुत थे। किसी की भलाई के लिए वह अपने सिद्धान्त तोड़ने से नहीं हिचकते थे। प्रत्येक बच्चे को प्रतिदिन एक घण्टा पढ़ाने के लिए महीने का चार सौ रुपए लेते थे। परन्तु जब कोई गरीब आदमी अपनी मजबूरी का रोना रोता और वह वास्तव में समझते कि उस व्यक्ति की सचमुच मजबूरी है, चार सौ रुपए प्रतिमाह बच्चे के ट्यूशन पर खर्च कर पाना उसके लिए मुश्किल है, तो वह उससे केवल सौ रुपए लेते थे।

एक दिन किसी ने उन्हें टोक दिया, 'मास्टर साहब, यह कहां का न्याय है कि आप किसी बच्चे से चार सौ रुपए लेते हैं तो किसी से केवल सौ रुपए। आखिर क्यों? शिक्षा तो आप सबको बराबर देते हैं, फिर यह भेदभाव क्यों?'

वह मुस्कराये और बोले, 'देखो भाई, मेरी मेहनत की कीमत तो चार सौ रुपए ही है। यह कीमत मैं जिनसे लेता हूं, वह सम्पन्न हैं, सक्षम हैं और खुशी-खुशी इसे दे देते हैं। परन्तु कई व्यक्ति मेरी इस मजदूरी को नहीं दे सकते, क्योंकि वह निर्धन हैं। लेकिन उनके बच्चों की शिक्षा भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी अमीर और सक्षम व्यक्ति के बच्चे की। तब ऐसी स्थिति में क्या किया जाय? जीवन में हर समस्या का समाधान है। ऐसी स्थिति में मैं गरीब आदमी से केवल सौ रुपए लेता हूं, जिसे वह आसानी से दे सकता है। मैं चाहूं तो यह पैसे भी न लूं, परन्तु अगर मैं उससे कुछ नहीं लूंगा तो वह समझेगा कि मैं उसके बच्चे को ढंग से नहीं पढ़ा रहा हूं। अत: उसके विश्वास को बनाए रखने के लिए मेरा उससे कुछ न कुछ लेना आवश्यक है। लेकिन एक बात बताऊं, गरीब आदमी के बच्चे को पढ़ाने के लिए उसके गाढ़े पसीने की कमाई के सौ रुपए भी मेरे लिए चार सौ के बराबर हैं। यह सौ रुपए मुझे अमीर के चार सौ रुपए से ज्यादा बरक्कत देते हैं।'

उनके उत्तर में जीवन दर्शन के छिपे मर्म को वह व्यक्ति भली-भांति समझ गया। इसके आगे पूछने के लिए उसके पास कोई प्रश्न नहीं बचा था।

 

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