कांग्रेस की खोखली जिद
   दिनांक १२-जनवरी-२०१८
यह लेख संविधान की मीन-मेख करने से संबंधित नहीं है। लेकिन, संदर्भ के तौर पर, इतना कहना आवश्यक है कि संविधान निर्माताओं ने संभवत: उन परिस्थितियों की कल्पना नहीं की होगी, जो परिस्थितियां पनपती गईं और जिनका संविधान के पास कोई उत्तर नहीं है। ऐसी परिस्थितियों की लंबी सूची हो सकती है। वर्तमान में अपेक्षाकृत ज्यादा प्रासंगिक कुछ परिस्थितियां इस प्रकार हं
लेख लिखे जाने से चंद घंटे पहले एक घोषित आतंकवादी को मृत्यु दंड मिलने को लेकर भारी नाटकीय स्थितियां बनी रहीं। सड़क पर भी, मीडिया में भी और अदालत में भी। लोकतंत्र है, लिहाजा किसी को भी कुछ भी कहने और करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। लेकिन जिसे देश की सबसे बड़ी अदालत ने सजा सुनाई हो, जो जनसंहार करने वाला आतंकवादी हो, उस पर नाटकबाजी लोकतंत्र की नहीं, लोकतंत्र की समाप्ति का लक्षण होनी चाहिए। वास्तव में ऐसे लक्षण पहले से दिख रहे हैं। लोकसभा का चुनाव अभी एक वर्ष पूर्व ही हुआ है। जनता के फैसले में, सरकार के गठन में, सरकार की नीतियों को लेकर कहीं कोई भ्रम नहीं था। लेकिन जिस तरह संसद ठप की गई और की जा रही है, उससे स्पष्ट है कि विपक्ष नहीं चाहता है कि सदनों में कोई कामकाज हो। अर्थात सरकार काम न कर सके। अर्थात विपक्ष नहीं मानता कि सरकार को कोई काम करने का कोई न्यायोचित अधिकार है, चाहे जनता का फैसला कुछ भी हो। इसका एक अर्थ होता है कि हो सकता है, किसी को लगता हो कि भारत पर राज करना उसका ही जन्मसिद्ध अधिकार है और मतदाताओं सहित संविधान और उसकी संस्थाएं इसमें सिर्फ मददगार की भूमिका निभाने के लिए होती हैं,और लिहाजा अगर वे अपनी इस भूमिका का ठीक सें निर्वाह न करें, तो उन्हें चलने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।
लोकसभा को न चलने देने की कांग्रेस की जिद खोखली और खतरनाक है। संसद एक संस्था है। कल्पना करें कि भविष्य में ऐसी ही स्थिति किसी और संस्था के साथ बनती है, तो क्या होगा। जैसे कोई राष्ट्रपति, जिसकी अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि होती ही है किसी बहुमत प्राप्त दल को सिर्फ इसलिए सरकार न बनाने दे कि उसे वह दल पसंद नहीं है, तो क्या होगा? यह कोरी कल्पना नहीं है। राज्यपालों के स्तर पर तो यह हरकत कई बार हो चुकी है और जिस गरिमा की अपेक्षा हम राष्ट्रपति से रखते हैं, उसी तरह की गरिमा की अपेक्षा राज्यसभा से भी की जाती है। वह संसद का ऊपरी सदन है, उसके बारे में कई अपेक्षाएं रखी गई थीं। क्या संविधान निर्माता यह जुगाड़ करके गए थे कि राज्यसभा में संख्याबल का उपयोग लोकसभा के बहुमत को वीटो करने में किया जाएगा, और इस तरह सरकार को बेबस किया जा सकेगा?
वास्तव में किसी को भी बेबस करना दीर्घकाल तक संभव नहीं होता। स्वतंत्रता का अतिकारी दुरुपयोग किया जाएगा, तो उसकी प्रतिक्रिया होगी, जो अंतत: स्वतंत्रता को ही नुकसान पहुंचाएगी। आप राज्यसभा की आड़ लेंगे, तो उसका कोई उपाय करने का विचार पैदा होगा। हर क्रिया की ही नहीं, हर हथकंडे की भी प्रतिक्रिया होती है।
लेकिन कांग्रेस की तृप्ति हंगामे में नहीं थी, सदन ठप करने में भी पूरी नहीं होनी थी, उसकी तृप्ति हंगामे से ठप होते सदन का सीधा प्रसारण दिखाने में थी। सीधे प्रसारण में अवरोध आने पर, हंगामा करने वालों पर कैमरा केन्द्रित न होने पर, रात भर रोने वाले अंदाज में रुंधे गले से ऐतराज भी जताया गया। तब इस बात को भुला दिया गया कि कैमरा केन्द्रित न करने के नुस्खे का आविष्कार कांग्रेस सरकार के ही समय, तत्कालीन सभापति मीरा कुमार ने लिखित दिशानिर्देश देकर किया था।
किसी ने लिखा है कि कांग्रेस ने वसुंधरा राजे और सुषमा स्वराज पर जिस आधार पर आरोप लगाया है, उस आधार पर तो याकूब मेमन को फांसी का विरोध करने वालों को, विशेषकर पत्र लिखने वालों को आतंकवादी और देशद्रोही घोषित कर देना चाहिए। लेकिन कांग्रेस ने तो इस तर्क के पहले, माने पिछले सत्र में भी संसद ठप की थी। तब क्या समस्या थी? अगर कोई दल संसद न चलने देने की जिद ठान लेगा और उसका बहाना खोजने का काम अगले दिन के लिए छोड़ देगा, तो इसका लोकतंत्र में कोई हल संभव नहीं है।
फिर क्या होगा? खतरा यह है कि गैर जिम्मेदारी पूर्ण व्यवहार प्रतिक्रिया को जन्म दे सकता है। संसद का संयुक्त सत्र बुलाने की बात, दबे शब्दों में ही सही, एक शीर्ष मंत्री भी कह चुके हैं। तब सत्र शुरू भी नहीं हुआ था। अर्थात कांग्रेस का व्यवहार का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। हो सकता है, भविष्य में संयुक्त सत्र ही नियमित तौर पर बुलाया जाने लगे और लोकसभा या राज्यसभा को ठप करके टीवी पर फोटो दिखवाने का अवसर कभी कभार ही मिले। अगर संयुक्त सत्र को भी ठप करने की प्रणाली ईजाद कर ली गई, तो उसका भी कोई इलाज खोजा जा सकता है। इससे किसका नुकसान होगा? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर आतंकवाद का समर्थन करने, या लोकतंत्र के नाम पर भारत को 'बनाना रिपब्लिक' समझने के परिणामस्पद निहिताथोंर् से इनकार नहीं किया जाना चाहिए।
ज्ञानेन्द्र बरतरिया