राजमाता विजयाराजे सिंधिया जेल गईं पर इंदिरा के सामने नहीं झुकीं
   दिनांक 11-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                          प्रभात झा
हमेशा संगठन को महत्व देने वाली राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने एक बार जो जनसंघ की सदस्ता ली तो फिर हमेशा वह जनसंघ के विचार के साथ रहीं। आपातकाल के दौरान वह 19 महीने जेल में रहीं लेकिन इंदिरा गांधी के सामने झुकी नहीं। भय के कारण उनके पुत्र माधवराव सिंधिया देश छोड़कर चले गए और बाद में कांग्रेस में शामिल भी हो गए लेकिन राजमाता ने अंतिम समय तक अपने सिद्धांत और विचारधारा के प्रति जो समर्पण था उसे कभी छोड़ा नहीं
“राजमाता विजयाराजे सिंधिया“ सरलता सहजता और संवेदनशीलता की त्रिवेणी थी। भारतीय राजनीति में उन्होंने मध्यप्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री डी.पी. मिश्रा की सरकार को जब गिराया था और जनसंघ के विधायकों के समर्थन से गोविंद नारायण सिंह को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया था, तभी से लोग राजनीतिक तौर पर राजमाता की ताकत का एहसास करने लगे थे। उन्हें लोग राजमाता के नाम पर अवश्य जानते थे, पर जिस दिन उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस की सरकार पलटी थी और गठबंधन की सरकार बनाई थी, उसी समय लोगों ने कहना शुरू कर दिया था कि अब राजमाता विजयाराजे सिंधिया जनसंघ की सदस्यता ग्रहण कर लेंगी।
हुआ भी यही, और राजमाता ने जनसंघ की सदस्यता ग्रहण की। अटल जी और आडवाणी जी से चर्चा कर भारतीय जनसंघ की राजमाता से लोकमाता की और अग्रसर होने लगीं। उनका कुशाभाऊ ठाकरे से बहुत लगाव था। वे उन्हें पुत्रवत मानती थी। उन्होंने बिना कुशाभाऊ ठाकरे से पूछे कभी कोई राजनीतिक निर्णय नहीं लिया। कुशाभाऊ ठाकरे भी उनका बहुत सम्मान करते थे।
राजमाता विजयाराजे सिंधिया के पुत्र माधवराव सिंधिया और राजमाता के तत्कालीन सहयोगी महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा, दोनों ही जनसंघ से चुनाव लड़े़। राजमाता स्व. माधवराव सिंधिया को पहली बार सांसद का चुनाव भारतीय जनसंघ से लड़ाया और वे भारतीय जनसंघ के सांसद बने। इसी तरह महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा भी जनसंघ से ही निर्वाचित हुए, स्व. माधवराव सिंधिया सदैव अपनी माता जी के साथ रहे।
धीरे-धीरे राजमाता का जनसंघ की नेता के नाते पूरे देश में उनका अखंड दौरा प्रारम्भ हुआ। भारतीय जनसंघ को एक सशक्त महिला नेत्री मिली। राजमाता पूरी तरह अपने चुनाव चिन्ह “दीए“ को लेकर गांव-गांव पहुंचने लगी। भारतीय जनसंघ की वैचारिक पृष्ठभूमि तेजी से तैयार होने लगी। इस बीच देश में स्व. इंदिराजी ने आपातकाल लगा दी। इस दौरान “राजमाता“ को इंदिराजी ने बुलाया और कहा कि आप बीस सूत्रीय का समर्थन करें। इंदिराजी की इस बात पर राजमाता उनके सामने खड़ी हो गईं, उन्होंने इंदिरा जी से साफ तौर कहा कि “मै“ जीवन में कांग्रेस के बीस सूत्रीय का समर्थन नहीं करूंगी। आप चाहे जो करें। “मैं जनसंघ की विचारधारा को नहीं छोडूंगी।“ राजमाता ने आगे कहा कि मैं जेल जाना पंसद करूंगी-लेकिन आपातकाल जैसे काले कानून का कभी समर्थन नहीं करूंगी। विचारधारा के प्रति ऐसी प्रतिबदृता और समर्पण ही देश मैं और दल में उन्हें रातों रात ऊंचाई पर ले गयी। धीरे-धीरे उनका संपर्क अनेक वरिष्ठ लोगों से होने लगा।
राजमाता जेल गईं, पर इंदिरा जी के सामने झुकी नहीं। इसी बीच आपातकाल के भय से स्व. माधवराव सिंधिया भारत छोड़कर चले गए, उन्होंनें "मां" की तरह हिम्मत नहीं दिखाई। लोगों का मानना है किं "वे" घबरा गए, यहीं पर राजमाता ने कहा कि मुझे ऐसा लगा रहा था 'भैया' माधवराव भी इंदिरा जी के आगे नहीं झुकेंगे पर ऐसा नहीं हुआ। पता नहीं स्व. माधवराव सिंधिया कहां चले गए, सन् 1977 में चुनाव हुए तो माधवराव जनसंघ के बजाए गुना से लोकसभा निर्दलीय लड़े। वहीं जब जनता पार्टी चली गई तो माधवराव सिंधिया कांग्रेस में शामिल हो गए, राजमाता को यह अच्छा नहीं लगा। उनका कहना था कि जिस इंदिरा जी ने उन्हें 19 महीने जेल की कालकोठरी में बिना वजह डाल दिया था, और मुझे यातनाएं दीं , ऐसे में उन्हें कांग्रेस में नहीं जाना चाहिए था।
सन् 1980 में राजमाता को जनता पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष चन्द्रशेखर ने आग्रह किया कि वे इंदिरा गंधी के विरूद्ध जनता पार्टी की ओर से रायबरेली से लोकसभा चुनाव लड़ें। राजमाता ने कहा कि जो पार्टी तय करे। राजमाता रायबरेली गईं और इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ी। वे पीछे नहीं हटीं। वे चुनाव हार गईं लेकिन उन्होंने संगठन के निर्णय को बिना किसी विरोध के स्वीकार किया।
जनता पार्टी की सरकार केन्द्र में बनी। उस समय तत्कालीन नेताओं को अनेक सरकारी पदों का आग्रह किया। पर राजमाता ने उसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने सदैव संगठन को ही महत्व दिया।
राजमाता धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद से जुड़ती चली गईं। एक ऐसा क्षण आया जब आपातकाल के दौरान राजमाता पर पांबदी लगा दी गई किे वह अपना पैसा भी बैंक से नहीं निकाल सकती हैं। राजमाता ने विश्व हिन्दू परिषद के तत्कालीन महासचिव अशोक सिंहल को विहिप के लिए एक लाख रूपये दान देने की घोषणा कर दी। वे जेल चली गईं। आपातकाल हटा राजमाता जेल से बाहर आईं तो उन्होंने अशोक सिंहल से कहा कि मुझे आपको एक लाख रूपये देने है। लेकिन मेरे खाते पर रोक लगी है। मैं खाता आॅपरेट नहीं कर सकती। अतः आप एक काम करें कि यह मेरी हीरे की अंगूठी है, इसे कहीं देकर एक लाख रूपये ले लें। यह बात में इसलिए कह रही हूं कि मैने आपको वचन दिया था। स्व. अशोक सिंहल ने उनके कहा कि राजमाता जी आपका इतना कहना ही हमें प्रेरणा देता है। इसी बीच श्रीमती यशोधराजे ने अम्मा महाराज से कहा कि अम्मा आप ये क्या कर रही हैं। यह तो आपकी अंगुली में महाराज साहब की निशानी है। आप चिंता नहीं करें हम विहिप को यह राशि दे देंगे। इस पर राजमाता ने य यशोधराजे जी से कहा की वचन की प्रतिबद्धता मेरे लिए पहले है, इसलिए मैं यह आग्रह कर रही हूं। राजमाता की इस घटना को जब हम याद करते हैं तो मन भाव विभोर हो जाता है। साथ ही लगता है कि उनकी अपने वचन के प्रति कितनी बडी प्रतिबद्धता थी। यह आज के कार्यकर्ताओं को भी विचार करना चाहिए। वचन की प्रतिबद्धता से व्याक्ति के चरित्र को समाज स्वीकरता है।
राजमाता के भाषण लिखने का मुझे सौभाग्य मिला। उनके निजी सचिव सरदार संभाजी राव आंग्रे मुझसे स्वदेश में आने पर विषय बता देते थे और हम भाषण तैयार कर देते थे। राजमाता सात्विक और आध्यात्मिक थी। मैंने राम जन्म भूमि आंदोलन में हमने राजमाता की निडरता, समर्पण और साहस को करीब से उस समय देखा जब मैं राम जन्मभूमि की रिर्पोटिंग करने अयोध्या गया था।
राजमाता की सैद्धांतिक प्रतिबद्धता का अनुपम उदाहरण उस समय आया, जब स्व. माधवराव सिंधिया जनसंघ छोड़कर कांग्रेस में चले गए। उन्हें बहुत दुख हुआ ऐसे अवसर पर उन्होंने कहा कि मेरा एक बेटा मुझे छोड़कर चला गया। लेकिन आज भाजपा के लाखों बेटे मेरे साथ हैं। उनके जीवन के एक नहीं अनेक उदाहरण ऐसे हैं, जो हमें सदैव प्रेरणा देते रहेंगे।
एक बार प्रख्यात वकील श्री राम जेठमलानी के मुकदमें में ग्वालियर हाईकोर्ट आए। उनके आगमन पर कांग्रेस के लोगों ने उन पर पथराव किया। जेठमलानी के सिर में चोट आयी। उस समय राम जेठमलानी भाजपा में थे। राजमाता को जब ज्ञात हुआ तो वे भाजपा का झंडा लेकर स्वयं ग्वालियर के इंदरगंज थाने में हजारों कार्यकर्ताओं के साथ पहुंची और रिपोर्ट दर्ज कराई। उन्होंने अपने ऊपर कभी भी राजघराने या राजशाही को हावी नहीं होने दिया। वे राजमाता होते हुए सदैव लोकमाता के मार्ग पर चलीं। यही कारण है कि देश ने उन्हें लोकमाता के रूप में स्वीकार किया।
राजमाताजी वात्सल्य की धनी थीं। वे ममतामयी थीं। उन्हें एक बार जनसंघ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की दृष्टि से सन् 1972 में स्वयं अटलजी और आडवाणी जी आए, राजमाता से दोनों नेताओं ने चर्चा की। राजमाता ने कहा कि मुझे एक दिन का समय चाहिए। राजमाता आध्यात्मिक भी थी। वे दतिया पीताम्बरा पीठ गईं, अपने गुरू जी से चर्चा की ओर लौटीं तो उन्होंनें अटल जी और आडवाणी जी से कहा कि वे भारतीय जनसंघ की सेवा एक कार्यकर्ता के रूप में सदैव करती रहेंगी। उन्हें पदों के प्रति कभी आकर्षण नहीं रहा।
राजमाता विजयाराजे सिंधिया भारतीय राजनीति में महिला के नाते देश में एक आदर्श कायम किया। उनकी राष्ट्रहित के प्रति जागरूकता ने ही उन्हें राजमाता से लोकमाता बनाया। भारतीय जनसंघ से भाजपा तक उनकी यात्रा में उनेक उतार-चढ़ाव आए, पर उन्होंने अपने सिद्धांत और विचारधारा के प्रति जो समर्पण था उसे कभी छोड़ा नहीं। भारतीय राजनीति में उनकी आदर्श भूमिका के कारण ही केन्द्र सरकार और मध्यप्रदेश की सरकार ने साथ ही भाजपा संगठन ने राजमाता विजयाराजे सिंधिया की जन्म शताब्दी मनाने का निर्णय किया। राजमाता के प्रति सरकार और संगठन का यह निर्णय स्वयं जाहिर करता है कि राजमाता का कृतत्व कितना महान था। महानता और उदारता ही उनकी पूंजी थी।
 
(लेखक राज्यसभा सांसद एवं भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)