अपने ही देश में शरणार्थियों का जीवन जीने को मजबूर रेयांगों की कब होगी वापसी
   दिनांक 12-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                                         -विष्णुकांत 
22 साल से त्रिपुरा में शरणार्थी जीवन जी रहे मिजोरम की रियांग जनजातीय लोगों को उनके पैतृक स्थान पर बसाने के लिए पिछले दिनों दिल्ली में एक समझौता हुआ, पर उसको विफल करने के लिए अनेक संगठन आगे आ गए। ऐसे ही संगठनों ने देश के अनेक हिस्सों में वैमनस्यता फैलाई है। इस कारण एक बहुत बड़ा समाज विकास से अछूता है
तदाता पहचान पत्र के साथ एक रियांग शरणार्थी महिला  
आगजनी, हत्या और लूटमार के शिकार मिजोरम के ब्रू (रियांग) लोगों को 1997 में रातोंरात अपना घर छोड़कर पड़ोसी राज्य त्रिपुरा की जामपुई पहाडि़यों में शरण लेनी पड़ी थी। आदिम जनजातीय समुदाय के इन 32,000 से भी अधिक रियांग नागरिक जातीय हिंसा के शिकार होने के चलते अपने ही देश में शरणार्थी बने रहने को मजबूर हैं। त्रिपुरा के कंचनपुर के 6 शरणार्थी शिविरों में बसे इन लोगों के राशन-पानी की व्यवस्था त्रिपुरा सरकार के जिम्मे है जिसके लिए केंद्र सरकार उसे आर्थिक सहायता देती है। वनवासी कल्याण आश्रम भी इनकी चिकित्सा सेवा करने के साथ-साथ इनके बच्चों के लिए प्राथमिक पाठशालाएं चलाता रहा है।
इन लोगों की अपने गृह प्रदेश में वापसी के लिए कई प्रयास किए गए। पर सर्वोच्च न्यायालय एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देशों एवं भारत सरकार के समस्त प्रयासों के बावजूद अभी तक के सारे प्रयास विफल रहे हैं। इसी वर्ष 3 जून को इनकी वापसी के लिए मिजोरम और त्रिपुरा सरकार एवं रियांग शरणार्थियों के प्रतिनिधियों के बीच दिल्ली में एक त्रि-पक्षीय समझौता हुआ। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की उपस्थिति में हुए इस समझौते के अनुसार 1 से 30 अगस्त के बीच इन लोगों को वापस जाना था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। लगभग 300 परिवार ही वापस गए हैं। समझौते के तहत इनकी वापसी तय हुई तब आशा जगी थी कि ये लोग मिजोरम में अपनी मातृभूमि को लौट सकेंगे। लौटने वाले प्रत्येक परिवार को पुनर्वास पैकेज के रूप में 4,00000 रुपए देना तय हुआ, जो मिजोरम में वापसी के एक माह के अंदर परिवार के मुखिया के नाम स्थायी जमा खाते में जमा होंगे। वे लगातार तीन वर्ष तक मिजोरम में रहेंगे तो यह धनराशि परिवार को दे दी जाएगी। इसके अतिरिक्त प्रत्येक परिवार को आगामी दो वर्ष तक नकद सहायता के रूप में 5,000 रु. प्रतिमाह और मुफ्त राशन दिया जाएगा। यह नकद राशि सीधे उसके बैंक खाते में जमा की जाएगी। प्रत्येक परिवार को गृह निर्माण हेतु भी 1,50,000 रुपए तीन किस्तों में दिए जाएंगे। मिजोरम सरकार इन लोगों के शिविरों से मिजोरम जाने के लिए मुफ्त परिहन व्यवस्था करेगी। समझौते के अंतर्गत उपरोक्त हर चीज के लिए खर्चा केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा वहन करने की बात थी। यह पैकेज देश में इसी प्रकार के अन्य समझौतों के लिए एक आदर्श उदाहरण हो सकता था, पर ऐसा नहीं हुआ। दरअसल, समझौते पर हस्ताक्षर के समय से ही यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि क्या रियांग वास्तव में अपनी मातृभूमि लौट पाएंगे?
 
त्रिपुरा स्थित कंचनपुर के एक शरणार्थी शिविर में एक रियांग परिवार 
उल्लेखनीय है कि मिजोरम में इसी वर्ष के अंत में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। समझौते के अनुसार चुनाव आयोग के निर्देश पर शरणार्थी शिविरों में ही निर्वाचन संबंधी फॉर्म 6, 7, 8 भरवाकर मतदाता सूचियों में संशोधन का कार्य शुरू हुआ, जो त्रिपुरा राज्य के मामित जिले के निर्वाचन कर्मचारियों ने किया। उसी समय से इस जिले की यंग मिजो एसोसिएशन (वाईएमए) ने इस प्रक्रिया का विरोध करना शुरू कर दिया। ये भरे हुए फॉर्म 18 अगस्त को मामित जिला मुख्यालय लाए गए और 19 अगस्त से इनकी जांच का काम शुरू हुआ। लेकिन 23 और 24 अगस्त की रात को मामित जिला निर्वाचन अधिकारी कार्यालय में रखे गए समस्त फॉर्म लूट लिए गए। इस क्षेत्र में 15 सितंबर से धारा 144 लगी हुई थी और ईवीएम/वीवीपेट की सुरक्षा को खतरा होने की खुफिया रपट होने के बावजूद इस लूट को अंजाम दिया गया। 24 अगस्त को अनजान लोगों के विरुद्ध इस घटना की एफआईआर दर्ज कराई गई। 1 सितंबर तक इस अपराध के आरोप में 11 लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनमें से कुछ लोग जिला निर्वाचन कार्यालय के कर्मचारी बताए जाते हैं। हालांकि अभी तक कोई साक्ष्य या बरामदगी नहीं हुई है।
मीडिया रपटों के अनुसार यंग मिजो एसोसिएशन द्वारा आंदोलन चलाकर मामित के उपायुक्त-जिलाधिकारी को हटाने की मांग की जा रही थी। समाचार पत्र बताते हैं कि उपायुक्त ने यह कहते हुए इस पर कोई भी टिपण्णी करने से इनकार कर दिया कि वे निर्देशानुसार केवल अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं और चुनाव आयोग/ केंद्र/ राज्य सरकार के निर्देशों का पालन कर रहे हैं। बताया जाता है कि 17 सितंबर को उपायुक्त को मामित मुख्यालय छोड़कर आइजॉल पहुंचने का निर्देश मिला। बताया जाता है कि वे उसी शाम 6.30 बजे आइजॉल के लिए अपने सरकारी वाहन में तीन सुरक्षाकर्मियों के साथ निकले। पर वाईएमए की धमकियों के कारण रात में उन्हें न केवल अपना मार्ग बदलना पड़ा बल्कि रास्ते में पड़ने वाले इंडियन रिजर्व बटालियन के मुख्यालय में शरण लेनी पड़ी। दूसरे दिन 18 सितंबर को वे दिन में 10-11 बजे आइजॉल स्थित अपने घर पहुंच पाए। यह सब भारत जैसे एक प्रगतिशील समाज, लोकतांत्रिक देश में हो रहा है। पर सेकुलर मीडिया में कोई हो-हल्ला नहीं, कोई मोमबत्ती जलाकर मार्च नहीं कर रहा। शायद इसमें किसी को देश में लोकतंत्र या पंथनिरपेक्षता के लिए खतरा दिखाई नहीं दे रहा।
क्या केवल इसलिए कि ये लोग किसी वोट बैंक का हिस्सा नहीं हैं? रियांगों के साथ जो हो रहा है, उससे देश की छवि धूमिल तो हो ही रही है, वहीं दूसरी ओर सभ्य, सुसंस्कृत और शिक्षित माने-जाने वाले मिजो लोगों के मान-सम्मान पर भी प्रश्नचिह्न लग रहा है। वहां के लोगों, विशेषकर बुजुर्गों और युवकों को इस पर विचार करना चाहिए।
उम्मीद की जानी चाहिए कि रियांग शरणार्थियों के साथ न्याय होगा और वे अपने घर लौट सकेंगे। इसी में देश और समाज की भलाई है।