आवाज बुलंद करने का समय
   दिनांक 15-अक्तूबर-2018
पहाड़ी ढलानों वाले चीड़ के जंगलों में भी आग इतनी तेजी से नहीं फैलती जितनी कि अशरीरी विश्व के 'वर्चुअल' वन में। छोटे से हैशटैग की सुलगती तीली कब, कहां, कितने विकराल अग्निकांड को जन्म देगी, कहा नहीं जा सकता। हाल में पुरुषों द्वारा उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की मुखर होती आवाजें, 'मी टू' (# MeToo) अभियान की दिन पर दिन तेज होती लपटें इस बात का उदाहरण हैं। मीडिया के ऊंचे और असरदार आरोपों के नीचे हैं.. रजतपट के उजले चेहरे यकायक काले पड़ गए हैं.. जिनकी कभी तूती बोलती थी उनकी इज्जत की कुर्की सोशल मीडिया के साइबर चौक पर हो रही है!
'मी टू' की आंधी में केंद्र के एक नेता का त्यागपत्र मांगे जाने पर उत्तर प्रदेश सरकार की मंत्री रीता बहुगुणा जोशी द्वारा की टिप्पणी खासी संतुलित और इस संदर्भ में गौर करने लायक है। वे कहती हैं, ''सवाल इस्तीफे का नहीं, आरोप साबित होने का है। महिलाओं को आरोप लगाने का अधिकार है तो पुरुष को पक्ष रखने का अधिकार है।'' रीता पूर्व में उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रही हैं। मुद्दे पर राजनीतिक सतर्कता के बावजूद उनकी महिला सुलभ संवेदनशीलता पर प्रश्न नहीं किया जा सकता। किन्तु सधी होने पर भी यह टिप्पणी पूरी धुंध नहीं छांटती। यहां राजनीतिक पक्षधरता के आरोप जड़ने की गुंजाइश है। परंतु ऐसी गुंजाइश कहां नहीं है? जब 'मी टू' जैसा चकमक हैशटैग नहीं था, बलात्कार के सुलगते मामले और राजनैतिक रसूख तले दबी सिसकियां तो तब भी थीं!
इंटरनेट पर उत्पीड़न, बलात्कार की खबरों की जरा खंगाल करेंगे तो रसूखदारों की मनमानी के कई और किस्से उघड़ पड़ेंगे। ऐसी तमाम रिपोर्टें मिल जाएंगी जो ऐसे मामलों के खास दल या विचारधारा से जुड़े होने पर आरोपियों के 'संदेहास्पद' तरीके से बच निकलने पर सवाल उठाती हैं।
बहुत लोगों को इस बात पर हैरानी हो सकती है, परंतु यह तथ्य है कि राजनीति के 'बाहें चढ़ाते' युवराज भी बलात्कार के आरोप से अछूते नहीं रहे। उन्हीं की पार्टी के अहम (और बुजुर्ग) रणनीतिकार भी यह दाग झेल चुके हैं। तथ्य यह भी है कि केंद्र में कांग्रेस की अगुआई वाली सरकार रहते दोनों ही मामलों में याचिकाकर्ताओं ने मामले 'वापस' ले लिए! ऐसे महत्वपूर्ण मामलों पर क्या मीडिया में पर्याप्त चर्चा हुई? आने वाली पीढि़यां जरूर यह सवाल पूछेंगी। गौर करने वाली बात यह भी कि ताजा आरोपों की चमक ने उन मामलों को खासतौर पर दबा दिया है जो हाल तक चर्चा में थे। केरल का नन बलात्कार कांड याद है? पिछले माह पूरे चर्च प्रतिष्ठान में खलबली मचा देने वाले इस प्रकरण में कोट्टायम पुलिस के जांच अधिकारी ने पाया कि बिशप मुलक्कल ने अपराध किया। मामले में आवाज उठाने वाली ननों को भी उपेक्षा, असहयोग और प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा। उस चर्च प्रशासन की असंवेदनशीलता पर तब भी पर्याप्त चर्चा नहीं हुई जिसने आरोपी बिशप की सेवाएं केवल 'अस्थाई' तौर पर समाप्त कीं। हैरानी की बात है कि कल आकाओं के विरुद्ध आरोपों पर अगर कुछ खास राजनैतिक दल मुंह सिले बैठे थे तो आज 'मी टू' के लिए मुखर प्रगतिशील चेहरे केरल नन बलात्कार मामले में चुप्पी की चादर ताने सोए रहे।
अच्छा लगे या बुरा, कड़वा-तीखा जो भी है, घटनाक्रम यही है। समाज इस पूरे मामले में तटस्थ नहीं रह सकता। लोग ताबड़तोड़ आक्रोश जता रहे हैं किन्तु इसके बरक्स यह भी सच है कि पहर बदलते-बदलते सामने आने वाले नए खुलासों, स्वीकारोक्तियों या प्रतिक्रियाओं की संख्या इतनी ज्यादा है कि किसी मामले में पक्ष या प्रतिपक्ष बनने से पहले अच्छे-अच्छे विचारशील भी चकरा जाएं। इस उलझन का कारण खुलासों से जुड़े कुछ ऐसे सवाल हैं जो सोशल मीडिया या इससे इतर मुख्यधारा के मीडिया और लोगों की परस्पर चर्चाओं में उठाए जा रहे हैं। सवाल नामी लोगों की छवि और साख से जुड़े हैं। सवाल आरोपों के समय चयन से जुड़े हैं। सवाल इस चिंता से भी जुड़े हैं कि इतना समय बीतने पर आरोपों की जांच कैसे हो सकेगी और पीडि़तों को न्याय कैसे मिल सकेगा? आरोपों की ही तरह, विवेकशीलता के तराजू पर सवालों का भी बराबर महत्व है। क्योंकि एक विमर्शकारी, संवेदनशील, न्याय-उत्सुक समाज के तौर पर कोई न तो आरोपों से कन्नी काट सकता है और न ही उसके प्रति उत्तर में खड़े होने वाले सवालों से।
—क्योंकि विवेकी समाज बलात्कार और बलात्कार में अंतर नहीं करता।
—क्योंकि संवेदनशील समाज में यौन उत्पीड़न के मामलों में सामाजिक प्रतिक्रिया का तीखापन नन अथवा अभिनेत्री होने के अंतर से तय नहीं होता।
यह चुनिंदा चुप्पियों को तोड़ने, दबा दिए गए मामलों को फिर चर्चा में लाने और पीडि़तों को इंसाफ दिलाने के लिए आवाज बुलंद करने का समय है।