शक्ति उपासना का पर्व विजयादशमी
   दिनांक 17-अक्तूबर-2018
 
                                                                                                                                                      - सुरेन्द्र नाथ गुप्ता
विजयादशमी या दशहरा सम्पूर्ण भारत का उत्सव है यद्यपि इसको मनाने की परम्पराओं, मान्यताओं में अनेक स्थानीय विविधताएं सम्मिलित हैं, परन्तु त्योहार एक ही है
 
 विजयादशमी के अवसर पर प. बंगाल में दुर्गापूजा का 5 दिन का विशेष उत्सव नव शक्ति का संचार करता है
हिन्दू समाज उत्सवों और त्योहारों का समाज है, वर्ष भर जितने त्योहार हिन्दुओं में मनाए जाते हैं उतने संभवत: संसार के अन्य किसी भी समाज में नहीं मनाए जाते। यह तथ्य हिन्दू समाज की आमोद-विनोदप्रियता का परिचायक है। कुछ त्योहार जहां पारिवारिक उत्सव हैं तो कुछ पारिवारिक के साथ-साथ सामाजिक भी हैं।
हिन्दू सांस्कृतिक परम्परा में विजयादशमी एक प्रमुख त्योहार है जो आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। विजयादशमी का दिन नई यात्रा, नए उद्योग प्रारंभ करने, नई जमीन-जायदाद या नई वस्तुएं खरीदने और नई यात्रा, नये प्रयास प्रारंभ करने के लिए शुभ माना जाता है। प्राचीन भारत में अपने राज्य की सीमा का विस्तार प्रत्येक राजा का कर्तव्य माना जाता था अत: क्षत्रियों में विजयादशमी के दिन शस्त्रपूजन और सीमा उल्लंघन की परम्परा थी। आज भी अधिकांश क्षत्रिय परिवारों में इस परम्परा का सांकेतिक निर्वहन किया जाता है।
विजयादशमी के सम्बन्ध में दो मान्यताएं हैं। एक, इस दिन भगवान राम ने असुरों के राजा रावण का वध करके लंका पर विजय प्राप्त की थी और सीता को मुक्त कराया था। उसी उपलक्ष्य में विजयादशमी उत्सव मनाया जाता है, जिसमें अच्छाई की बुराई पर विजय के रूप में समाज में बुराई के प्रतीक रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है।
दूसरे, राम-रावण युद्ध केवल एक स्त्री की मुक्ति के लिए दो व्यक्तियों के अहं का युद्ध नहीं था वरन् इसके पीछे एक महान उद्देश्य था—समाज की विकृति को समाप्त करके संस्कृति को पुन: स्थापित करना। रावण ब्राह्मण था, वेद-शास्त्रों का ज्ञाता, प्रकांड पंडित था और शिव भक्त भी था। परन्तु वह आसुरी शक्तियों का प्रतिनिधि था।
उस समय भारत में दो व्यवस्थाएं चल रही थीं। एक दशरथी व्यवस्था, जो सर्वमान्य व धर्मसम्मत थी और दूसरी दशाननिक व्यवस्था, जो स्थापित नियमों के विरुद्ध बलपूर्वक चलाई जा रही थी। दशरथी व्यवस्था संयम, समर्पण, त्याग और परमार्थ पर आधारित थी, परंतु दशाननिक व्यवस्था स्वार्थ, शोषण, अपहरण और भोगवादी थी। उसका प्रभुत्व बहुत बढ़ गया था। रावण तप बल से दीर्घजीवी हो गया था और सभी प्रकार की भौतिक शक्तियां उसके नियंत्रण में थीं। कहते हैं कि सभी देव, नाग, किन्नर और महाकाल तक उसकी कैद में थे।
कर जोरे सुर दिसिप विनीता।
भृकुटी विलोकत सकल सभीता॥
सम्पूर्ण भारत में किसी में भी उसका विरोध करने की शक्ति नहीं थी। रावण भारतवर्ष के केवल दो राजाओं से पराजित हुआ था-एक पम्पापुर के वानरराज बाली और दूसरे महिष्मती राज्य (मध्य प्रदेश स्थित) के सहस्त्रबाहु अर्जुन। अत: रावण ने इन दोनों से ही मित्रता कर ली और फिर उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं रहा। प्रभु राम ने उस चुनौती को स्वीकार किया और 14 वर्ष के वनवास हेतु अयोध्या से उत्तर में हिमालय की ओर न जाकर दक्षिण की ओर प्रस्थान का निश्चय किया। अपार संसाधनों व हर प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित रावण जैसे शक्तिशाली राजा से युद्ध के लिए राम के पास न तो कोई संसाधन थे और न ही अयोध्या या किसी अन्य राज्य की सेना। गोस्वामी जी ने भी इसका संकेत किया है-
रावण रथी विरथ रघुवीरा।
देखी विभीषण भयहु अधीरा।।
उनके पास केवल एक महान उद्देश्य था—धर्म की स्थापना। रावण को चुनौती देने के लिए राम ने जन समर्थन को अपना हथियार बनाया। परन्तु दक्षिण भारत की जनता रावण के अत्याचारों से इतनी त्रस्त थी कि आत्मविश्वासहीन होकर निराशा के गर्त में डूब चुकी थी। रावण से मुक्ति का विचार भी उसके लिए अकल्पनीय था। पम्पापुर के बाली का वध करके राम ने जनता के मन में एक आशा की किरण जगाई और उनमें विश्वास उत्पन्न किया कि राम ही रावण को चुनौती दे सकते हैं। पुन: राम ने वनों में बचे-खुचे साधु-संन्यासियों के आश्रमों में जाकर उनका विश्वास प्राप्त किया और प्रतिज्ञा करके उन्हें जन-जागरण के कार्य के लिए प्रेरित किया।
निश्चर हीन करहुं महि।
भुज उठाय प्रण कीन्ह।।
उन दिनों दक्षिण भारत में शंकर की पूजा की प्रधानता थी और रावण भी शिव भक्त था अत: वहां के लोगों का मन जीतने के लिए राम ने भी शंकर की भक्ति पर जोर दिया और रामेश्वर सहित कई स्थानों पर शिवलिंगों की स्थापना की। तुलसी वैष्णव संत हैं। पर मानस में उन्होंने अनेक स्थानों पर शिव उपासना को राम उपासना का पूरक बताया है-
सिव द्रोही मम दास कहावा।
सो नर सपनेहु मोहि न भावा।।
जैसे-जैसे राम लंका की ओर बढ़ते गए, सारी जनता, वनवासी और गिरिवासी उनके साथ होते गए। लंका पर आक्रमण के लिए सेतुबंध का निर्माण राम ने इन्हीं वनवासी और गिरिवासी जैसे सामान्यजनों की सहायता से समुद्र में उस स्थान पर किया था, जहां से लंका की दूरी न्यूनतम थी और समुद्र भी बहुत कम गहरा था। उन दिनों बिना किसी उपकरण के सेतु के लिए ऐसे उपयुक्त स्थान को कैसे चिन्हित किया गया होगा, इसकी कल्पना तक कठिन है। परन्तु यह सेतु उस समय की भारतीय तकनीक व इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट नमूना है। कहते हैं कि रावण ने लंका में एक सुमेरु पर्वत (ऊंची मीनार) बना रखा था। उस पर खड़े होकर जब रावण ने राम की सेना को देखा तो वह पहली बार भयभीत हुआ था। इस प्रकार राम ने विशाल जनशक्ति के बल पर आधा युद्ध तो पहले ही जीत लिया था।

 
 कुल्लू दशहरा उत्सव में ग्राम देवताओं की झांकी
मुगलशासन के शीर्ष उत्कर्ष काल में इस्लामी अत्याचारों से चेतनाशून्य हो चुके हिन्दू समाज में नव चैतन्य का संचार करने के लिए ही गोस्वामी जी ने वाराणसी में बहुत व्यापक स्तर पर रामलीला का मंचन शुरू किया था, जिसका समापन विजयादशमी को होता था और जिसमें पूरा नगर ही रामलीला का मंच होता था। कोई मुहल्ला अयोध्या तो कोई जनकपुरी और कोई लंका। इस रामलीला में पूरे नगर का हिन्दू समाज सहभागी होता था। अधर्मी सत्ता के विरुद्ध जन संगठन का यह अनूठा प्रयास था। तभी से रामलीलाओं का मंचन और विजयादशमी को रावण के पुतले के दहन की परम्परा आज तक चली आ रही है।
विजयादशमी के सम्बन्ध में दूसरी मान्यता देवी दुर्गा के प्राकट्य से सम्बन्धित है। एक बार दानवराज महिषासुर ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। उस संग्राम में जब देवतागण असुरों की संगठित शक्ति के समक्ष कमजोर पड़ने लगे तो देवगुरु बृहस्पति के सुझाव पर देवताओं ने अपनी-अपनी शक्ति का एक-एक अंश एकत्र किया। देवताओं की उस संगठित शक्ति से सिंहवाहिनी देवी दुर्गा प्रगट हुर्इं और उस संगठित देव शक्ति ने 9 दिन तक युद्ध करके दसवें दिन महिषासुर का संहार किया। तभी से दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाने लगा और नवरात्री में दुर्गा पूजा उत्सव के रूप में उनकी आराधना की जाती है। दुर्गा पूजा बंगाल प्रांत का सबसे बड़ा पांच दिवसीय उत्सव है, जिसमे बड़े-बड़े पंडालों में दुर्गा की मूर्तियां स्थापित करके पूजा की जाती है और विजयादशमी के दिन बैंड-बाजों के साथ नाचते-गाते हुए स्त्री-पुरुषों के झुण्ड उन मूर्तियों को किसी नदी, समुद्र या बड़े जलाशयों में विसर्जित करते हैं।
केरल व कर्नाटक प्रांत के कुछ स्थानों पर विजयादशमी को सरस्वती पूजा और विद्यारम्भ दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन बच्चों को नृत्य, संगीत, कला या किसी भी अन्य कौशल की शिक्षा के लिए औपचारिक रूप से प्रविष्ट किया जाता है। इसके लिए पिता या कोई अन्य बुजुर्ग बच्चे से थाली में रेत या चावल को समतल बिछाकर एक मंत्र लिखवाकर विद्यारम्भ कराते हैं। कुछ स्थानों पर अष्टमी, नवमी, दशमी-तीन दिन की सरस्वती पूजा का आयोजन होता है, जिसमें लोग पुस्तकों की पूजा करतें हैं।
मैसूर का दशहरा अत्यन्त प्रसिद्ध है, जिसे देखने लोग दूर-दूर से आते हैं। यह उत्सव मैसूर राजघराने के साथ-साथ कर्नाटक राज्य का राजकीय उत्सव भी है, जो प्रथम नवरात्र से शुरू होकर विजयादशमी तक चलता है। उत्सव के दसों दिन राजमहल को बिजली की रोशनी से सजाया जाता है और गीत-संगीत-नृत्य के कार्यक्रम एवं कुश्ती, मल्लयुद्ध आदि अनेक शारीरिक प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। विजयादशमी के दिन मैसूर के राजमहल से शोभायात्रा निकलती है जिसमें एक सजे हुए हाथी पर 750 किलोग्राम सोने के सिंहासन पर देवी चामुंडेश्वरी (दुर्गा) विराजती हैं। शोभायात्रा की अगुआई मैसूर के राजा स्वयं करते हैं और उसमें अनेक सजे हुए हाथी, ऊंट, घोड़ों पर सशस्त्र सवार अनेक झांकियों और बैंड-बाजों के साथ सम्मिलित होते हैं। शोभायात्रा का समापन बन्निमंडप पर बन्नी (शम्मी) वृक्ष की पूजा के साथ किया जाता है। मान्यता है कि पांडवों ने वनवास के 13वें वर्ष अज्ञातवास के लिए अपने शस्त्र शमी वृक्ष के ऊपर छुपाकर राजा विराट के यहां एक वर्ष व्यतीत किया और अज्ञातवास समाप्त होने पर विजयादशमी के दिन उन शस्त्रों को पुन: धारण किया था। तभी से विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष और शस्त्र पूजा की परम्परा चली आ रही है। 
मैसूर दशहरा उत्सव में शोभायात्रा में सम्मिलित लोक कलाकार
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरा अत्यंत श्रद्धा और उल्लास मनाया जाता है जिसे देखने देश-विदेश से चार-पांच लाख लोग पहुंचते हैं। प्रदेश सरकार का यह अंतरराष्ट्रीय उत्सव है। विजयादशमी से शुरू होकर सात दिनों तक कुल्लू घाटी के ढलपुर मैदान में मेला लगता है, जिसके केंद्र में कुल्लू राजपरिवार की रघुनाथ जी की मूर्ति विराजमान होती है। उसके पास में घाटी के अन्य सभी ग्राम देवताओं को विराजित किया जाता है, जिन्हें ग्रामवासी पूर्ण श्रद्धा के साथ नाचते-गाते हुए पालकियों में लेकर आते हैं। मेले में स्थानीय सांस्कृतिक वेश-भूषा में नृत्य, संगीत और हस्त शिल्प, कला-कौशल का भरपूर प्रदर्शन एवं क्रय-विक्रय होता है। 17वीं सदी में कुल्लू एक समृद्ध राज्य था। यहां के राजा जगत सिंह (1637-72) को एक संत ने श्राप दिया था जिससे यह राज्य श्रीहीन हो गया था। राजा जगत सिंह के कहने पर दामोदर पंडित श्राप से मुक्ति हेतु रघुनाथ जी की यह मूर्ति अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर से चुरा कर लाये थे और जगत सिंह ने इस मूर्ति को राजसिंहासन पर स्थापित करके रघुनाथ जी को कुल्लू का राजा घोषित किया था। उन्होंने फिर उनके प्रतिनिधि के रूप में राज्य का संचालन किया था। तभी से इस मेले का आयोजन शुरू हुआ।
तमिलनाडु, कर्नाटक आंध्र व तेलंगाना में विजयादशमी पर गोलू प्रदर्शन की परम्परा है, जिसमें लोग अपने-अपने घरों में गोलू (गुड़ियों) द्वारा पौराणिक कथाओं का प्रदर्शन करते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और मित्रों-सम्बन्धियों को उन्हें देखने के लिए आमंत्रित करते हैं।
उत्तर भारत और नेपाल में लोग एक पात्र में नव धान्य (नौ प्रकार के अनाज) बोते हैं, नवरात्र के प्रत्येक दिन उन्हें पानी देते हैं और उनके अंकुरित होने को शुभ मानते हैं।
 
 दशानन का अंत: अधर्म के प्रतीक रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन विजयादशमी उत्सव का विशेष आकर्षण है
भारत सहित विश्व के अनेक देशों में फैले ‘इस्कान’ मतावलंबियों के लिए भी विजयादशमी का दिन विशेष महत्व का है, क्योंकि विजयादशमी के दिन ही कर्नाटक में उडुपी के एक ग्राम में द्वैत दर्शन के प्रवर्तक स्वामी माधवाचार्य का जन्म हुआ था और ‘इस्कान’ के संस्थापक श्री प्रभुपाद स्वामी इसी द्वैत मत की एक शाखा माधव-गौड़िया सम्प्रदाय के आचार्य थे। 1925 में विजयादशमी का दिन ही रा.स्व.संघ की स्थापना के लिए चुना गया था, क्योंकि इस पर्व में शक्ति की उपासना और जन शक्ति के संगठन का भाव निहित है। रा.स्व.संघ ने अपने संगठन के छह उत्सवों में विजयादशमी को भी सम्मिलित किया है। विजयादशमी को नागपुर में रा.स्व.संघ के मुख्यालय में प.पू. सरसंघचालक जी का उद्बोधन आगामी वर्ष का नीतिगत बीज वक्तव्य और स्वयंसेवकों के लिए दिशानिर्देश माना जाता है। इस प्रकार विजयादशमी या दशहरा सम्पूर्ण भारत का उत्सव है यद्यपि इसको मनाने की मान्यताओं-परम्पराओं में अनेक स्थानीय विविधताएं हैं, परन्तु त्योहार एक ही है और उसके मूल में निहित भाव भी एक सामान है-शक्ति उपासना, अच्छाई की बुराई पर विजय का जश्न, जन शक्ति के संगठन द्वारा आसुरी शक्तियों का विनाश और समाज में धर्मराज्य की स्थापना। भारत एक धर्मनिष्ठ राष्ट्र है और उसी धर्मनिष्ठा का प्रतीक है विजयदशमी उत्सव।
(लेखक शिक्षाविद् हैं)