"हमारी पहचान हिन्दू है जो हमें सबका आदर करना सिखाती है"
   दिनांक 18-अक्तूबर-2018
रा. स्व. संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने 18 अक्तूबर को नागपुर स्थित रेशिमबाग में विजयादशमी उत्सव के निमित्त शस्त्र पूजन कार्यक्रम में भाग लिया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के नाते बचपन बचाओ आंदोलन के प्रणेता श्री कैलाश सत्यार्थी उपस्थित थे। अपने संबोधन में श्री भागवत ने देश के सामने मौजूद परिस्थितियों की चर्चा करते हुए संस्कारवान, सबल, सक्षम समाज के माध्यम से देश को सशक्त बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रस्तुत है श्री भागवत जी वक्तव्य का संपादित अंश
 
                  विजयदशमी समारोह को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत
यह वर्ष श्रीगुरुनानक देव जी के प्रकाश का 550वां वर्ष है। अपने भारतवर्ष की प्राचीन परम्परा से प्राप्त सत्य को भूलकर, आत्मविस्मृत होकर जब अपना सारा समाज दम्भ, मिथ्याचार, स्वार्थ तथा भेद की दलदल में आकण्ठ फंस गया था और दुर्बल, पराजित व विघटित होकर लगातार सीमा पार से आने वाले क्रूर विदेशी असहिष्णु आक्रामकों की बर्बर प्रताड़नाओं को झेलकर तार-तार हो रहा था, तब श्रीगुरुनानक देव जी ने अपने जीवन की ज्योति जलाकर समाज को अध्यात्म के युगानुकूल आचरण से आत्मोद्धार का नया मार्ग दिखाया। उन्हीं की परम्परा ने हमको देश की दीन-हीन अवस्था को दूर करने वाले दस गुरुआें की सुन्दर व तेजस्वी मालिका दी।
उसी सत्य व प्रेम पर स्थापित सर्वसमावेशी संस्कृति के, देश में विभिन्न महापुरुषों के द्वारा समय-समय पर पुरस्कृत व प्रवर्तित, देश-काल परिस्थिति के अनुरूप प्रबोधन के सातत्य का परिणाम है कि जिनके जन्म का यह 150वां वर्ष है, ऐसे महात्मा गांधी जी ने इस देश के स्वतंत्रता आन्दोलन को सत्य व अहिंसा पर आधारित राजनीतिक अधिष्ठान पर खड़ा किया। ऐसे सभी प्रयासों के कारण देश की सामान्य जनता स्वराज्य के लिए घर के बाहर आकर, मुखर होकर अंग्रेजी दमनचक्र के आगे नैतिक बल लेकर खड़ी हो गयी। सौ वर्ष पहले अमृतसर के जलियांवाला बाग में स्वराज्य के लिये तथा रॉलेट कानून के अन्याय व दमन के विरुद्ध संकल्पबद्ध, चारों ओर से घेरकर जनरल डायर के नेतृत्व में जिन्हें गोलीबारी का शिकार बनाया गया, उन हमारे सैकड़ों निहत्थे देश-बांधवों के त्याग, बलिदान व समर्पण का स्मरण भी इस नैतिक बल को हम में जागृत करता है।
इस वर्ष के इन औचित्यपूर्ण संस्मरणों का उल्लेख इसलिए आवश्यक है कि स्वतंत्रता के 71 वर्षों में हमारे देश ने उन्नति के कई आयामों में एक अच्छा स्तर प्राप्त कर लिया है,परन्तु सर्वांग परिपूर्ण राष्ट्रीय जीवन के और भी कई आयामों में अभी हमें बढ़ना है।
हमारे देश के विश्व में सुसंगठित, समर्थ व वैभव-सम्पन्न बन कर आगे आने से जिन शक्तियों के स्वार्थ-साधन का खेल समाप्त या अवरुद्ध हो जाता है, वे शक्तियां तरह-तरह के कुचक्र चलाकर देश की राह में रोड़े अटकाने से बाज नहीं आयी है। कई चुनौतियों को हमें अभी पार पाना है। हमारे पूर्वज महापुरुषों द्वारा स्वयं के जीवन के उदाहरण से, उपदेश से जो सत्यनिष्ठा, प्रेम, त्याग, पवित्रता व तपस के आदर्श समाज में स्थापित व आचरण में प्रवर्तित किये गये, उन्हीं पर चलकर हम इस कार्य को कर सकेंगे।
सैन्य शक्ति का हो सम्मान
किसी भी देश के लिए उस देश की सीमाओं की सुरक्षा तथा आंतरिक सुरक्षा की स्थिति पर विचार सर्वोपरि होता है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के ताने-बाने को ठीक से समझकर अपने देश की सुरक्षा-चिन्ताओं से उनको अवगत कराना व उनका सहयोग समर्थन प्राप्त करने का सफल प्रयास हुआ है। सेना, शासन व प्रशासन ने पड़ोसी देशों सहित सब देशों से शांतिपूर्ण व सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाने की अपनी इच्छा, वाणी व कृति को कायम रखते हुए, देश के सुरक्षा संदर्भ में जहां आवश्यक हो, वहां दृढ़ता से खड़े व अड़े रहना तथा साहसपूर्ण पहल करके अपने सामर्थ्य का विवेकी उपयोग करने का रुख स्पष्ट दिखाया है। इस दृष्टि से अपनी सेना तथा रक्षक बलों का नीति धैर्य बढ़ाना, उनको साधन-सम्पन्न बनाना, नयी तकनीक उपलब्ध कराना आदि चीजें शुरू हुई हैं और उनकी गति बढ़ रही है। दुनिया के देशों में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ने का यह भी एक कारण है।
साथ ही सुरक्षा बलों, रक्षक बलों तथा उनके परिवारों के योगक्षेम की व्यवस्था पर और ध्यान देना आवश्यक है। सैनिक अधिकारी व नागरिक प्रशासकीय अधिकारी, गृह मंत्रालय, सुरक्षा मंत्रालय, वित्त मंत्रालय आदि अनेक विभागों में इन योजनाओं पर विचार व अमल होना प्रशासकीय दृष्टि से अनिवार्य है। यह अपेक्षा उतनी ही समाज से भी है। अभी पश्चिम सीमा पार के देश में हुए सत्ता परिवर्तन से हमारी सीमा पर तथा पंजाब, जम्मू व कश्मीर जैसे राज्यों में चली उसकी प्रकट अथवा परोक्ष उकसाने वाली गतिविधियों में कोई कमी आने की न अपेक्षा थी, न वैसा हुआ है।
सीमाएं हों सुरक्षित
अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्य में तटवर्ती सीमा की सुरक्षा एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बना है। मुख्यभूमि से लगे तटीय क्षेत्र में कम-अधिक दूरी पर भारत के सैकड़ों द्वीप हैं। अन्दमान निकोबार द्वीप समूह सहित ये सभी द्वीप सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थानों पर स्थित हैं। उनकी निगरानी व्यवस्था तथा सुरक्षा की दृष्टि से वहां की व्यवस्था का सबलीकरण यह अतिशीघ्रता से ध्यान देकर पूर्ण करने का विषय है। सागरी सीमा व द्वीपों पर निगरानी रखने वाली नौसेना तथा अन्य बलों में आपसी तालमेल, सहयोग व साधन संपन्नता पर शीघ्र अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। भू तथा सागरी सीमावर्ती क्षेत्र में रहने वाले अपने बंधु कई सीमा विशिष्ट परिस्थितियों का सामना करते हुए भी धैर्यपूर्वक रहते आये हैं। उनकी वहां व्यवस्था ठीक रहे तो आतंकी घुसपैठ, तस्करी आदि समस्याओं को कम करने में वे सहायक भी हो सकते हैं। उनको समय पर उचित राहत मिले, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की व्यवस्था उन तक पहुंचती रहे तथा उनमें साहस, संस्कार व देशभक्ति की उत्कटता बनी रहे, इसके लिए शासन व समाज दोनों के प्रयास अधिक बढ़ाने की आवश्यकता है। सुरक्षा उत्पादों के मामले में देश की संपूर्ण आत्मनिर्भरता को-अन्य देशों के साथ आपसी आदान-प्रदान की उचित मात्रा रखते हुए भी-साधे बिना हम देश की सुरक्षा के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकते। इस दिशा में प्रयास बढ़ाना होगा।
 
                                                                           शस्त्र पूजन करते श्री भागवत 
आन्तरिक सुरक्षा
देश की सीमाओं की सुरक्षा के साथ ही देश में आंतरिक सुरक्षा का विषय भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उसके उपायों का एक पहलू केन्द्र व राज्य शासनों तथा प्रशासन के द्वारा कड़ाई के साथ कानून, संविधान तथा देश की सार्वभौम संप्रभुता को चुनौती देने वाली, हिंसक गतिविधियां करने वाली, देश के अन्दर तथा बाहर से प्रेरित अथवा प्रेषित गुटों का बंदोबस्त करना है। इसमें केन्द्र व राज्य सरकारों की तथा पुलिस व अर्धसैनिक बलों की कार्रवाई सफलतापूर्वक चली है। निरन्तर सजगता के साथ उसे जारी रखना पड़ेगा। परन्तु ऐसी हिंसक तथा सीधे तौर पर गैरकानूनी गतिविधियों में भाग लेने वाले लोग अपने ही समाज में से होते हैं, यह वस्तुस्थिति है। उसके मूल में अपने समाज में व्याप्त अज्ञान, विकास तथा सुविधाओं का अभाव, बेरोजगारी, अन्याय, शोषण, विषमता का व्यवहार तथा स्वतंत्र देश में आवश्यक विवेक व संवेदना का समाज बड़ी मात्रा में अभाव है। उसे दूर करने में शासन-प्रशासन की भूमिका अवश्य है। परन्तु उससे बड़ी समाज की भूमिका है। समाज में इन सब त्रुटियों को दूर कर उसके शिकार हुए समाज के अपने इन बंधुओं को स्रेह व सम्मान से गले लगाकर समाज में सद्भावपूर्ण व आत्मीय व्यवहार का प्रचलन बढ़ाना पड़ेगा। समाज जीवन के इस परिष्कार का प्रारम्भ पहले स्वयं के मन-मस्तिष्क के परिष्कार तथा अपने आचरण से करना होगा। समाज के सब प्रकार के वर्गों से आत्मीय व नित्य संपर्क स्थापित कर उनके सुख-दुख का भागी बनना पड़ेगा। पुलिस बल की व्यवस्था के सुधार की अनुशंसा भी पुलिस आयोग ने की है। अनेक वर्षों से लंबित उस अनुशंसा पर विचार व सुधार के प्रयास की आवश्यकता है।
अनुसूचित जाति व जनजाति वर्गों के लिए बनी हुई योजनाएं, उपयोजनाएंं व कई प्रकार के प्रावधान समय पर तथा ठीक से लागू करने के बारे में केन्द्र व राज्य शासनों को अधिक तत्परता व संवेदना का परिचय देने व अधिक पारदर्शिता बरतने की आवश्यकता है, ऐसा प्रतीत होता है।
चिंताजनक प्रवृत्तियां
देश को चलाने वाला व्यवस्था तंत्र तथा देश-समाज के द्वारा समाज के दुर्बल घटकों के साथ, उनके उन्नति के प्रयासों में तत्परता, संवेदनशील आत्मीयता तथा पारदर्शिता व आदर-सम्मान का व्यवहार बरतने में त्रुटियां रह जाने से अभाव, उपेक्षा व अन्याय की मार से जर्जर ऐसे वर्गों के मन में संशय, अलगाव, अविवेक, विद्रोह व द्वेष तथा हिंसा के बीज बोना व पनपाना आसानी से संभव हो जाता है। इसी का लाभ लेकर उनको अपने स्वार्थप्रेरित उद्देश्य के लिए, देशविरोधी कृत्यों के लिए, आपराधिक गतिविधियों के लिए गोला-बारूद के रूप में उपयोग करने की इच्छा रखने वाली शक्तियां उनमें अपने छल-कपट के खेल खेलती हैं। गत 4 वर्ष में समाज में घटी कुछ अवांछित घटनाएं, समाज के विभिन्न वर्गों में व्याप्त नई-पुरानी समस्याएं, विभिन्न नयी-पुरानी मांगें आदि को लेकर आन्दोलनों को एक विशिष्ट रूप देने का जो लगातार प्रयास हुआ, उससे यह बात सभी के ध्यान में आती है। आने वाले चुनाव को देखते हुए वोटों पर नजर रखकर, सामाजिक एकात्मता, कानून-संविधान-अनुशासन आदि की नितांत उपेक्षा करने वाली स्वार्थी, सत्तालोलुप राजनीति ऐसे हथकण्डों के पीछे स्पष्ट दिखती रही है। परन्तु इस बार इन सब निमित्तों को लेकर समाज में भटकाव, अलगाव, हिंसा, अत्यंत विषाक्त द्वेष का देश-विरोधी वातावरण खड़ा करने का प्रयास हो रहा है। भारत तेरे टुकड़े होंगे आदि घोषणाएं जिन समूहों से उठीं उन समूहों के कुछ प्रमुख चेहरे कहीं-कहीं इन घटनाओं में प्रमुखता से अपने भड़काऊ भाषणों के साथ सामने आये। दृढ़ता से वन प्रदेशों अथवा अन्य सुदूर क्षेत्रों में दबाये गये हिंसात्मक गतिविधियों के कर्ता-धर्ता व उनका पृष्ठपोषण करने वाले अब शहरी माओवाद के पुरोधा बनकर ऐसे आन्दोलनों में अग्रपंक्ति में दिखाई दिये। पहले छोटे-छोटे अनेक संगठनों के जाल फैलाकर तथा छात्रावासों आदि में लगातार संपर्क के माध्यम से एक वैचारिक अनुयायी वर्ग खड़ा किया जाता है। फिर उग्र व हिंसक कार्रवाइयों को छोटे-बड़े आन्दोलनों में शामिल कराकर, अराजकता का माहौल बनाकर उन अनुयायियों में प्रशासन व कानून का डर तथा नागरिक अनुशासन का डर समाप्त किया जाता है। दूसरी ओर समाज में आपस में व स्थापित व्यवस्था व नेतृत्व के बारे में तिरस्कार व द्वेष उत्पन्न किया जाता है। ऐसी अचानक उग्र रूप लेने वाली घटनाओं के माध्यम से समाज के सब अंगों में प्रस्थापित सभी विचारों का नेतृत्व, जो समाज व्यवस्था व नागरिक व्यवहार की भद्रता के अनुशासन से, कम अधिक मात्रा में ही सही, बंधा रहता है, अचानक ध्वस्त किया जाता है। नया अपरिचित, अनियंत्रित, केवल नक्सली नेतृत्व से ही बंधा हुआ अंधानुयायी व खुला पक्षपाती नेतृत्व स्थापित करना, यह इन शहरी माओवादियों की ही नव वामपंथी कार्यपद्घति है। अन्य माध्यम तथा बुद्धिजीवियों व अन्य संस्थाओं में पहले से तथा बाद तक स्थापित इनके हस्तक ऐसी घटनाओं में, इनसे संबद्ध भ्रमपूर्ण प्रचार अभियान में, बौद्घिक व अन्य सभी प्रकार के समर्थन आदि में सुरक्षित अंतर पर व तथाकथित कृत्रिम प्रतिष्ठा के खोल में रहकर संलग्न रहते हैं। उनके प्रचार का विषैलापन अधिक प्रभावी करने के लिए उन्हें असत्य तथा भड़काऊ भाषा का उपयोग स्वछन्दतापूर्वक करना भी आता है। देश के शत्रुपक्ष से सहायता लेकर देशद्रोह करना तो अतिरिक्त कौशल माना जाता है। जिहादी व अन्य कट्टरपंथी तत्वों की कहीं न कहीं प्रत्यक्ष उपस्थिति भी इन सभी घटनाओं में समान रूप से दिखती है। इसलिए यह सारा घटनाक्रम केवल प्रतिपक्ष की सत्ता प्राप्ति की राजनीति मात्र न रहकर देशी-विदेशी भारत विरोधी ताकतों की सांठगांठ से धूर्ततापूर्वक चलाया गया कोई बड़ा षड्यंत्र है; जिसमेें राजनीतिक महत्वाकांक्षी व्यक्ति अथवा समूह जाने-अनजाने तथा अभाव व उपेक्षा में पिसने वाला समाज का दुर्बल वर्ग अनजाने व अनचाहे गोला-बारूद के रूप में उपयोग में लाये जाने के लिए खींचा जा रहा है, ऐसा स्पष्ट होता है। सारा विषाक्त व विद्वेषी वातावरण बनाकर देश की आंतरिक सुरक्षा का मुख्य आधार समाज के सामंजस्य को ही जर्जर बनाकर ढहा देने वाले बौद्धिक संघर्ष, जिसे राजनीति-शास्त्र की परम्परा में मंत्र युद्ध कहा गया, की सृष्टि की जा रही है।
इसके निरस्तीकरण के लिए शासन-प्रशासन को सजग होकर देखना होगा कि समाज में ऐसी घटनाएं न घट पायें जिनका लाभ उपद्रवी शक्तियां ले पाएं तथा उपद्रवी कार्रवाई कर पायें। जनहित की योजनाओं का तत्पर क्रियान्वयन करते हुए समाज की अंतिम पंक्ति तक उन योजनाओं कोे पहुंचाना पड़ेगा। कानून-व्यवस्था का पालन करवाने के लिए दक्ष होकर काम करना पड़ेगा। परन्तु इस परिस्थिति का संपूर्ण व अचूक उपाय तभी हो सकता है जब समाज के सभी वर्गों में, बुद्धि व भावना सहित आचरण में, आपस में सद्भावना व अपनेपन का व्यवहार हो। पंथ-सम्प्रदाय, जाति-उपजाति, भाषा, प्रान्त आदि की विविधता को हम एकता की दृष्टि से देखें। वर्ग विशेष की समस्या व परिस्थिति को अपना दायित्व मानकर सारा समाज मिल-बैठकर उसका न्याय हो व सद्भावनापूर्ण हल ढूंढे। इसलिए आपस में निरंतर आत्मीय संवाद हो सके ऐसा वातावरण अपने संपर्क व संबंधों को बढ़ाकर उत्पन्न करें। अपने जीवन व्यवहार में नागरिक अनुशासन व कानून व्यवस्था की मर्यादा का आचरण करें। इस सम्बन्ध में हमारे राजनेताओं सहित समाज के प्रत्येक व्यक्ति को पू़ डॉ़ बाबासाहेब आम्बेडकर का (25 नवम्बर 1949 का) वह प्रसिद्ध भाषण नित्य स्मरण में रखना चाहिए जिसमें वे परामर्श देते हैं कि न्याय, समता व स्वातंत्र्य की दिशा में देश का बढ़ना, राजनीतिक व आर्थिक प्रजातंत्र के साथ सामाजिक प्रजातंत्र की ओर बढ़ना, समाज में बंधुभाव के व्यापक प्रसार के बिना संभव नहीं। बिना उसके इन प्रजातांत्रिक मूल्यों की व अपनी स्वतंत्रता की भी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। परतंत्रता में हमने अपनी मांगों की आवाज उठाने के लिए जो पद्धतियां अपनायीं वे स्वातंत्र्य की स्थिति में छोड़ देनी पड़ेगी। हमें लोकतंत्र के अनुशासन में बैठ सकने वाली पूर्णत: संवैधानिक पद्धतियों का ही अवलम्बन करना पड़ेगा।
परिवार में संस्कार आवश्यक
देश की राजनीति, कार्यपालिका, न्यायपालिका, स्थानीय प्रशासन, संगठन, संस्थाएं, विशेष व्यक्ति व जनता, इन सबकी इसके बारे में पक्की सहमति तथा समाज की एकात्मता की भावना ही देश में स्थिरता, विकास व सुरक्षा की गारण्टी है। यह संस्कार नई पीढ़ी को भी शैशवकाल से ही घर में, शिक्षा में तथा समाज के क्रियाकलापों में से प्राप्त होने चाहिए। घर से नई पीढ़ी में मनुष्य के मनुष्यत्व व सत्चारित्र्य के नींव रूप सुसंस्कारों का मिलना आज के समय में बहुत अधिक महत्व का हो गया है। समाज के वातावरण तथा शिक्षा के पाठ्यक्रमों में आजकल इन बातों का अभाव सा हो गया है। शिक्षा की नयी नीति प्रत्यक्ष लागू होने की प्रतीक्षा में समय हाथ से निकलता जा रहा है। यद्यपि इन दोनों परिवर्तनों के लिए अनेक व्यक्ति व संगठनों के प्रयास शासकीय व सामाजिक, दोनों स्तरों पर बढ़ रहे हैं तथापि हमारे हाथ में सर्वथा हमारा अपना घर व हमारा अपना परिवार तो है ही। उसमें हमारी स्वाभाविक आत्मीयता, पारिवारिक व सामाजिक दायित्वबोध, स्वविवेक का निर्माण आदि संस्कारों को अंकित करने वाला अनौपचारिक शुचितामय प्रसन्न वातावरण अपने उदाहरण सहित देते रहने का नई पीढ़ी के प्रति अपना दायित्व ठीक से निभाना होगा। बदला हुआ समय, उसमें प्रसार माध्यमों का व्यापक प्रसार व प्रभाव, नई तकनीकी के माध्यम से व्यक्ति को अधिक आत्मकेन्द्रित बनाने वाले तथा व्यक्ति की विवेक बुद्धि को समझे बिना विश्व की सारी सही-गलत सूचनाओं व ज्ञान को उससे साक्षात् कराने वाले साधन में बहुत सावधानी बरतने की आवश्यकता विश्व में सभी को प्रतीत हो रही है। ऐसे समय में परिवार की स्वपरंपरा के सुसंस्कार मिलते रहें।
देश में पारिवारिक क्लेश, ऋणग्रस्तता, निकट के ही व्यक्तियों द्वारा बलात्कार-व्यभिचार, आत्महत्यायें तथा जातीय संघर्ष व भेदभाव की घटनाओं के समाचार निश्चित ही पीड़ादायक व चिंताजनक हैं। इन समस्याओं का समाधान भी अंततोगत्वा स्रेह व आत्मीयपूर्ण पारिवारिक वातावरण एवं सामाजिक सद्भाव निर्माण करने में ही है। इस दृष्टि से समाज के सुधी वर्ग एवं प्रबुद्धजन सहित संपूर्ण समाज को इस दिशा में कर्तव्यरत होना पड़ेगा।
चिन्तन में समग्रता
हमारी प्रत्येक कृति, उक्ति व मन से भी व्यक्ति, परिवार, समाज, मानवता व सृष्टि, सभी का सुपोषण हो, यह विशेषकर विविध अंगों में समाज का दिग्दर्शन करने वाले सभी को ध्यान में रखना चाहिए। विश्व में कहीं भी समाज का स्वस्थ व शांतिपूर्ण जीवन केवल विधिव्यवस्था व दंड के भय से न चला है, न चल सकता है। समाज के द्वारा कानून का पालन समाज के नीतिबोध का परिणाम है। समाज का नीतिबोध उसके परंपरागत मूल्यबोध से बनता है। समाज के आचरण के कारण बनने वाली प्रकृतिगत काम व अर्थ की प्रवृत्ति, उसको मर्यादित कर, उपयोगी व सुख के साथ संतोष व आनंद देने वाली नीति, नीतिबंधन के अनुशासन से समाज व परिवार एकात्म होकर चलते रहें, यह देखने वाली विधि तथा इन सबका निर्णायक मूल्यबोध यह सब जहां परस्परानुकूल सुसंगति से चलते हैं वहां वास्तविक व संपूर्ण न्याय होता है। समग्रतापूर्वक विचार तथा धैर्यपूर्ण मन बनाये बिना निर्णयों का समाज के आचरण में स्वीकार तथा उससे देश-काल परिस्थितिनुरूप समाज की नवरचना का निर्माण नहीं होगा।
आस्था पर आघात से असंतोष
हाल ही में शबरीमला देवस्थान के सम्बंध में निर्णय से उत्पन्न स्थिति भी यही दर्शाती है। सैकड़ों वर्षों से चलती आयी समाज में अपनी स्वीकार्यता बना चुकी परम्परा के स्वरूप व कारणों के मूल का विचार नहीं किया गया। धार्मिक परम्पराओं के प्रमुख लोगों का पक्ष, करोड़ों भक्तों की श्रद्धा को परामर्श में नहीं लिया। इन नियमों पर चलने वाले महिलाओं के भी बहुत बड़े वर्ग की बात नहीं सुनी गयी। कानूनी निर्णय से समाज में शांति, सुस्थिरता व समानता के स्थान पर अशांति, अस्थिरता व भेदों का सृजन हुआ। क्यों, हिन्दू समाज की आस्था पर ऐसे आघात लगातार व बिना संकोच किये जाते हैं, ऐसे प्रश्न समाज मन में उठते हैं व असंतोष की स्थिति बनती चली जाती है। यह स्थिति समाज जीवन के स्वास्थ्य व शांति के लिये कतई ठीक नहीं है।
स्वतंत्र देश-स्व आधारित तंत्र
भारत-जीवन के सभी अंगों के नवनिर्माण में भारत के मूल्यबोध के शाश्वत आधार पर पक्के रहकर ही प्रगति करनी पड़ेगी। अपने देश में जो है उसको देश-काल-परिस्थिति अनुरूप सुधार कर, परिवर्तित कर अथवा आवश्यक हो तो कुछ बातों को पूर्णत: त्यागकर भी युगानुकूल बनाने तथा विश्व में जो भद्र है, अच्छा है उसको देशानुकूल बनाने के निर्णय का आधार यही मूल्यबोध है। यही अपने देश का स्वभाव है। यही हिन्दुत्व है। अपने स्वभाव पर दृढ़ व स्थिर रहकर ही कोई देश उन्नत होता है। अंधानुकरण से नहीं।
शासन की अच्छी नीतियों के परिणाम समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक अनुभव में आयें, इसलिए प्रशासन के द्वारा उनकी तत्परता, संवेदनशीलता, पारदर्शिता व संपूर्णता के साथ जो कार्यवाही होनी चाहिए, उस प्रमाण में वह अभी भी नहीं हो रही है। अंग्रेजों का परकीय राज्य व प्रशासन हमारे भूमि व राज्यों पर केवल सत्ता चलाने का काम करता था। अब स्वतंत्र भारत में हमारे अपने शासक हमारे अपने प्रशासन को प्रजापालक प्रशासन बनाएं, यह अपेक्षा है।
केवल राजनैतिक स्वतंत्रता अपने आपमें पूर्ण नहीं होती। राष्ट्र के जीवन-व्यवहार के सभी पहलुओं की पुनर्रचना उसी ‘स्व’ तथा स्वगौरव के आधार पर खड़ी करनी पड़ती है, जिसने हमें स्वतंत्रता के संघर्ष के लिए एक जन के नाते प्राणवान बनाकर प्रेरित किया। स्वतंत्र भारत की जनाकांक्षा हमारे संविधान की प्रस्तावना, मूल अधिकार, मार्गदर्शक तत्व, व मूलभूत कर्तव्य में परिभाषित हैं। उनके प्रकाश में हमें राष्ट्र के जीवन व्यवहार की, राष्ट्र के विकास की लक्ष्य दृष्टि, दिशा व तद्नुुरूप जीवन के अर्थायाम सहित सभी अंगों के विकास का अपना विशिष्ट भारतीय प्रतिमान खड़ा करना पड़ेगा। तब हमारे सारे प्रयास, नीतियां पूर्णत: क्रियान्वित व प्रतिफलित होती दिखेंगी।
श्रीराम जन्मभूमि
राष्ट्र के ‘स्व’ के गौरव के ही संदर्भ में अपने करोड़ों देशवासियों के साथ श्रीराम जन्मभूमि पर राष्ट्र के प्राणस्वरूप धमर् मर्यादा के विग्रहरूप श्रीरामचन्द्र का भव्य मंदिर बनाने के प्रयास में संघ सहयोगी है। सब प्रकार के साक्ष्य बता रहे हैं, वहां कभी मंदिर था, फिर भी मंदिर निर्माण के लिए जन्मभूमि का स्थान उपलब्ध होना बाकी है। न्यायिक प्रक्रिया में तरह-तरह की नई बातें उपस्थित कर निर्णय न होने देने का स्पष्ट खेल कतिपय शक्तियों द्वारा चल रहा है। मंदिर का बनना स्वगौरव की दृष्टि से आवश्यक है ही, इससे देश में सद्भावना व एकात्मता का वातावरण बनना प्रारम्भ होगा। देशहित की इस बात में कुछ कट्टरपंथी व सांप्रदायिक राजनीति को उभारकर अपना स्वार्थसाधन करनेवाली शक्तियां बाधाएं खड़ी कर रही हैं। ऐसे छलकपट के बावजूद शीघ्रतापूर्वक उस भूमि के स्वामित्व के संबंध में निर्णय हो तथा शासन के द्वारा उचित व आवश्यक कानून बनाकर भव्य मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया जाना चाहिये।
निर्वाचन का महत्व
देश का नेतृत्व कौन करे? जो नीतियां चली हैं, वे सही हैं अथवा गलत? इन सब बातों का निर्णय प्रजातंत्र की अपने देश की प्रजातंत्र व्यवस्था में पांच वर्ष में एक बार सामान्य मतदाता करें, यह कर्तव्य उसी का माना जाता है। वह पंचवर्षीय निर्वाचन अपने सामने है। एक प्रकार से इस अधिकार से हम भारत के लोग, सामान्य जनता ही भारत की परिस्थिति का निर्णय व नियंत्रण करने वाले हो जाते हैं। परन्तु हम यह भी जानते हैं कि उस एक दिन के मतदान से हम जो निर्णय करते हैं, उसके अच्छे-बुरे तात्कालिक परिणाम भोगना व दीर्घकालीन नफे-नुकसान को झेलने का काम आगे बहुत वर्षों तक अथवा जीवनभर रहता है। ऐसे में मतदाताओं को राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए स्वार्थ, संकुचित भावनाएं व अपने भाषा, प्रान्त, जाति आदि छोटे दायरों के अभिनिवेश से ऊपर उठकर विचार करना पड़ेगा। उम्मीदवार की प्रामाणिकता व क्षमता, दल के नीति की राष्ट्रहित व राष्ट्र की एकात्मता के साथ प्रतिबद्धता तथा इन दोनों के पहले के तथा वर्तमान के क्रियाकलापों के अनुभव; इनका स्वतंत्र बुद्धि से मतदाताओं को विचार करना पड़ेगा। 100 प्रतिशत मतदान आवश्यक है। भारत का चुनाव आयोग भी विचारपूर्वक मतदान का आग्रह करता है। इस नागरिक कर्तव्य की अनुपालना संघ के स्वयंसेवक भी करते आये हैं व सदा की भांति इस बार भी करेंगे।
दलगत राजनीति, जाति-सम्प्रदायों के प्रभाव की राजनीति आदि से संघ अपने जन्म से सोच-समझकर अलग रहता आया है, रहेगा। परन्तु सम्पूर्ण देश में व्याप्त स्वयंसेवकों की संख्या नागरिक के नाते अपने कर्तव्यों को पूर्ण करे तथा समग्र व सम्यक् राष्ट्रहित के पक्ष में अपनी शक्ति को खड़ा करे, यह देशहित के लिए आवश्यक कार्य है।
सनातन मूल्यबोध है हिन्दुत्व
देशहित की मूलभूत आवश्यकता है कि भारत के ‘स्व’ की पहचान के सुस्पष्ट अधिष्ठान पर खड़ा हुआ सामर्थ्य संपन्न व गुणवत्ता वाला संगठित समाज इस देश में बने। वह हमारी पहचान हिन्दू पहचान है जो हमें सबका आदर, सबका स्वीकार, सबका मेलमिलाप व सबका भला करना सिखाती है। इसलिए संघ हिन्दू समाज को संगठित व अजेय बनाना चाहता है और इस कार्य को सम्पूर्ण करके रहेगा। अपने-अपने सम्प्रदाय, परंपरा व रहन-सहन को लेकर अपने आपको अलग मानने वाले अथवा हिन्दू शब्द से भयभीत होने वाले समाज के वर्गों को यह समझने की आवश्यकता है कि हिन्दुत्व तो इस देश के सनातन मूल्यबोध को ही कहते हैं। उसके इस सत्य व शाश्वत अंतरंग को कायम रखकर ही उसमें देश-काल-परिस्थति-अनुरूप स्वरूप व व्यवहार के परिवर्तन आये हैं व ये आगे भी आवश्यकतानुरूप हो सकते हैं। हिमालय से समुद्रपर्यन्त अखंड भारतभूमि के साथ हिन्दुत्व का तादात्म्य है। उस मूल्यबोध से अनुप्राणित भारत की एक संस्कृति के रंग में सभी भारतीय रंगें, यह संघ की इच्छा है। इस हिन्दू संस्कृति व समाज की सुरक्षा तथा संवर्धन के लिए प्रखर परिश्रम करने वाले, प्राणोत्सर्ग करने वाले महापुरुष हम सबके पूर्वज, हम सबके गौरव हैं। संपूर्ण विश्व को, उसकी विशिष्ट विविधताओं का स्वागत व स्वीकार करते हुए हृदय से अपनाने की क्षमता भारत में इस हिन्दुत्व के कारण है। इसलिए भारत हिन्दू राष्ट्र है। संगठित हिन्दू समाज ही देश की अखण्डता, एकात्मता व निरन्तर उन्नति का आधार है। सारी दुनिया में कट्टरपन, संकुचित स्वार्थ व आत्यंतिक जड़वादिता के कारण मर्यादारहित उपभोग वृत्ति तथा संवेदनहीनता को समाप्त करने का एकमात्र उपाय हिन्दुत्व के शाश्वत मूल्यबोध का स्वीकार ही है। हिन्दू संगठन का कार्य इसीलिए विश्व-हितैषी, भारत-कल्याणकारी एवं लोकमंगल का कार्य है।
आप सब स्वयंसेवकों के साथ इस पवित्र ईश्वरीय कार्य में सहयोगी व सहभागी बनते हुए भारतमाता को विश्वगुरु पद पर स्थापित करने हेतु भारत के भाग्यरथ को अग्रसर करें।
नहीं है अब समय कोई, गहन निद्रा में सोने का,
समय है एक होने का, न मतभेदों में खोने का।
बढ़े बल राष्ट्र का जिससे, वो करना मेल है अपना,
स्वयं अब जागकर हमको, जगाना देश है अपना॥