कश्मीर जाएं तो भद्रकाली जरूर जाएं
   दिनांक 19-अक्तूबर-2018
 
संपूर्ण जम्मू—कश्मीर में अनेकानेक विशाल और पुरातन मंदिर-तीर्थस्थल विद्यमान हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश के महात्म्य के बारे में भारत के अन्य भागों के लोगों को कम ही पता है और जिनको पता है वे यहां की स्थिति के चलते यहां आने से कतराते हैं।
बहरहाल इन्हीं पुरातन तीर्थस्थलों में उत्तर कश्मीर में ऐसा ही एक देवस्थान कुपवाड़ा जिले के हंदवाड़ा में है। श्रीनगर से लगभग 90 किमी.दूर सुंदर देवदार के वनों से आच्छादित माता भद्रकाली का यह धर्मस्थल पुरातन काल से ही कश्मीरी हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। इस स्थल के बारे में मान्यता है कि यह इच्छापूर्ति पीठ है, जहां आने वाले श्रद्धालुओं के सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। 1990 के पहले हर वर्ष राम नवमी और महानवमी पर बड़े हर्षोल्लास के साथ घाटी के हिन्दू इस पुण्यधाम की यात्रा कर माता भद्रकाली का दर्शन करते थे और मेले जैसा माहौल होता था। लेकिन जैसे—जैसे आतंकी पंजों में कश्मीर जकड़ता गया, भक्तों का आना यहां बिल्कुल बन्द हो गया और यह स्थल निर्जन होता चला गया। खैर अब स्थिति में कुछ सुधार आया है लेकिन जैसा होना चाहिए वैसा नहीं है।
कैसे पहुंचे मंदिर तक
श्रीनगर से मंदिर तक आसानी से सड़क मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है। हालांकि मंदिर तक जाने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट न के बराबर है और कमोवेश सुरक्षित भी नहीं। इसलिए खुद की सवारी ही उचित है यहां जाने के लिए। कोशिश करें कि कश्मीर के किसी जान-पहचान से ही टैक्सी बुक कराएं। चूंकि इलाका अत्यधिक संवेदनशील है, इसलिए सड़क मार्ग से लेकर मंदिर तक जगह—जगह सुरक्षा में तैनात सेना के जवान दिख जाएंगे। मंदिर परिसर भी सेना की छावनी में तब्दील है। सो लिहाजा सुरक्षा चाक-चौबंद है, ताकि अराजक तत्व किसी तरह की अराजक गतिविधि को अंजाम देने से डरें।
बहरहाल आप जब श्रीनगर से सड़क मार्ग से हंदवाड़ा की ओर चलेंगे तो रास्ते में पटृटन और बारामूला के मुहाने पर पांडव कालीन मन्दिरों के ध्वंशावशेष दिख जाएंगे, जो जीर्णशीर्ण होने के बाद भी अपने अनूठे स्थापत्य के चलते आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं। इनमें से शुग्ंधेश और गौरी शंकर मंदिर प्रमुख हैं। कोई भी धार्मिक भक्त इन विलुप्त होती धरोहरों को देखकर सहज ही अनुमान लगा सकता है कि देश के इस हिस्से का अतीत कितना समृद्ध रहा होगा। हालांकि ये भग्नावशेष अपने ऊपर हुए क्रूर अत्याचार को भी बयां करते हैं। पुरातत्व विभाग की उदाशीनता जहां स्पष्ट दिखाई देती है वहीं यह धार्मिक स्थान आज के समय अराजक तत्वों का केन्द्र बनते जा रहे हैं।
 
प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण क्षेत्र
जैसे-जैसे आप कश्मीर की ओर बढ़ेंगे, प्रकृति अपने सुन्दरतम रूप में सामने आती जाएगी। हवाओं में ताज़गी, फ़िज़ाओं में खुशबू और जिधर भी नज़र दौड़ेगी हरियाली ही हरियाली नजर आएगी। ऐसा लगेगा जैसे प्रकृति बाहें फैलाये आपका स्वागत कर रही है। आप भी बाहें फैलाकर सबकुछ समेट लेना चाहोगे। ऐसा महसूस होगा, जैसे कुछ पिघल रहा है। तन-मन पर पड़ा बोझ उतर गया हो। अचानक हल्कापन महसूस होने लगा है। देवदार, कली, बुदुल के विशालकाय गगनचुम्बी वृक्षों से आच्छादित यह पूरा इलाका मन को असीम शांति प्रदान करेगा। कल्पना लोक से भी कहीं खूबसूरत, स्वर्ग जैसा। शायद इसी खूबसूरती की वजह से इसे "धरती का स्वर्ग" कहा जाता है। यहां की प्राकृतिक सुषमा को शब्दों में उकेरना कठिन है। यहां की मंद—मंद हवा जब तन को छूकर गुज़रती है तो अलग एहसास देकर जाती है।
 
नवमी को एकत्र होते हैं कश्मीरी हिन्दू
विजयादशमी से एक दिन पहले यानी नवमी को यहां मेले जैसा माहौल होता है। इसलिए जम्मू—कश्मीर में जगह—जगह बसे कश्मीरी हिन्दू माता के दर्शन करने के लिए आते हैं। माता भद्रकाली देवदार के वृक्षों के बीच टीन के बने भवन में विराजित हैं। लाल चुन्नी ओढ़े, गले मे स्वर्ण जड़ित आभूषण, हाथों में खड्ग, माथे पर मुकुट की शोभा ऐसी की एक बार देखने के बाद मन बार-बार दर्शन के लिए लालायित होता है, निहारने को जी करता है। ऐसा लगता है कि मां अभी कुछ बोलने ही वाली हैं। अद्भुत शांति मिलती है दर्शन करके।