दशानन के प्रति लोगों की आस्था, नहीं फूंकते रावण का पुतला
   दिनांक 19-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                             - अनिता त्यागी
त्तर भारत में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का नाम बड़े ही आदर औरश्रद्धा के साथ लिया जाता है। यहां के जनमानस में लंकापति दशानन को आदरका पात्र नहीं माना जाता और बुराई के प्रतीक के रूप में देखते हैं। इसके बाद भी पश्चिम उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में रावण के प्रति लोगों में आस्था है और दशहरे पर उसका पुतला दहन भी नहीं किया जाता। इसमें रावण की जन्मस्थली बिसरख और लंकापति द्वारा बसाया गया रावण उर्फ बड़ागांव शामिल है। इन दोनों ही स्थानों पर रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता। इसके अलावा मेरठ के सरधना में भी रावण की पूजा करने वाले कई लोग है। वेस्ट यूपी रही है रावण की जन्म व कर्मस्थली राम और रावण का नाम भारतीय संस्कृति में रचा-बसा है। जहां राम को भगवान मानकर पूरे देश में पूजा की जाती है, वहीं रावण को भी देश के कई क्षेत्रों में आस्था का प्रतीक माना जाता है। दिल्ली-एनसीआर के क्षेत्र में रावण का खासा प्रभाव रहा है। गौतमबुद्ध नगर जनपद का बिसरख गांव को रावण की जन्मस्थली माना जाता है। वरिष्ठ इतिहासकार और एमएम काॅलेज मोदीनगर के इतिहास विभागाध्यक्ष डाॅ. कृष्णकांत शर्मा का कहना है कि बिसरख में रावण के पिता विश्रवा मुनि का आश्रम था और यही पर रावण का जन्म हुआ था। यह स्थान प्राचीन काल में विश्वेश्वरा कहलाता था, जो बाद में बिसरख के रूप में जाना गया। इस गांव में रावण को वेदों का प्रकांड विद्वान और महापंडित माना जाता है और उसका एक मंदिर भी स्थापित किया गया है। यहां पर दशहरे पर रावण का पुतला दहन नहीं होता। बिसरख में प्राचीन शिव मंदिर मौजूद है और खुदाई के दौरान भी प्राचीन शिवलिंग मिल चुके हैं। इस गांव में इतिहासकारों को प्राचीन सभ्यता के चित्रित धूसर मृदभांडों के अवशेष मिल चुके हैं। अब इतिहासकारों ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को बिसरख में खुदाई कराने के लिए प्रस्ताव भेजा है। गाजियाबाद के दूधेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास भी रावण से जुड़ा है। मंदिर के महंत नारायण गिरि का कहना है कि इस मंदिर में लंकेश्वर रावण प्रतिदिन अपने पिता विश्रवा मुनि के साथ भगवान शंकर का जलाभिषेक करने आता था। इस कारण इस मंदिर की मान्यता बहुत दूर-दूर तक है। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि को लाखों श्रद्धालु भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते हैं।
मयराष्ट्र अर्थात मेरठ है लंकापति की ससुराल
इतिहासकार डाॅ. अमित पाठक का कहना है कि मेरठ का प्राचीन नाम मयराष्ट्र या मय दानव का खेड़ा कहा जाता है, जो कालांतर में मेरठ हो गया। बताया जाता है कि दशानन रावण का विवाह मय दानव की पुत्री मंदोदरी से हुआ था। इस तरह से मेरठ से भी रावण का नाता स्पष्ट होता है। मेरठ शहर में स्थित पुरानीकोतवाली में मय दानव का महल बताया जाता है। यही से मंदोदरी प्रतिदिन सदर बाजार स्थित बिल्वेश्वर महादेव मंदिर में पूजा करने के लिए जाती थी। इस मंदिर के आसपास बिल्व पत्रों की बहुलता होने से ही इसका नाम बिल्वेश्वर महादेव मंदिर पड़ा। यह मंदिर आज भी मौजूद है। इतिहासकारों का कहना है कि मय दानव के पुरानी तहसील स्थित किले से एक रास्ता सीधा बिल्वेश्वर महादेव मंदिर पर जाता था। इसके अलावा मंदोदरी सूरजकंुड स्थित सरोवर में स्नान करने के लिए आती थी। सूरजकुंड आज भी मौजूद है और अपनी ऐतिहासिकता की कहानी खुद बयां करता है।

 
बागपत में रावण ने बसाया था रावण उर्फ बड़ागांव
शहजाद राय प्राच्य शोध संस्थान बड़ौत के निदेशक एवं इतिहासकार अमित राय जैन और शोधकर्ता डाॅ. कुलदीप त्यागी का कहना है कि बागपत जनपद की धरती भी रावण की कर्मस्थली रही है। यहां की खेकड़ा तहसील में स्थित लंकेश्वर रावण ने एक गांव की स्थापना की थी। लंकापति के नाम पर ही इस गांव का नाम रावण उर्फ बड़ागांव पड़ा। सरकारी रिकाॅर्ड में भी गांव का नाम रावण उर्फ बड़ागांव लिखा हुआ है। किवदंती है कि हिमालय में तपस्या करते समय रावण ने देवी शक्ति को प्रसन्न किया और उनसे लंका में स्थापित होने की प्रार्थना की। जिस पर देवी ने शक्तिपुंज के रूप में चलने की बात कही और पृथ्वी से स्पर्श होते ही शक्तिपुंज उसी स्थान पर विराजमान हो जाएगा। हिमालय से लौटते समय रावण बागपत क्षेत्र से गुजरा तो बड़ागांव के पास आते ही उसे लघुशंका हुई और उसने एक ग्वाले को शक्तिपुंज संभालने को दिया। ग्वाले ने शक्तिपुंज को नीचे रख दिया। रावण के प्रयास करने पर भी शक्तिपुंज नहीं उठा तो दशानन ने यहां पर मंशादेवी मंदिर की स्थापना की और पास स्थित तालाब में स्नान करके पूजा की। तभी से उस तालाब का नाम भी रावण कुंड पड़ गया। मंशा देवी मंदिर और रावण कुंड आज भी विद्यमान है। इस गांव की ऐतिहासिकता का प्रमाण है कि यहां से कुषाण काल, गुप्त काल के पुरावशेष मिल चुके हैं। मंदिर में गुप्त काल की भगवान विष्णु की दशावतार की मूर्ति और मंदिर के प्राचीन खंभे मौजूद है। इस गांव में रावण का पुतला दहन नहीं
किया जाता है और रावण को महापंडित के रूप में श्रद्धा के साथ देखा जाता है। गांव के निवासियों का कहना है कि गांव की स्थापना से लेकर आज तक इस गांव में रावण का पुतला आज तक नहीं फूंका गया। गांव में बहुत वर्षों पहले रामलीला का आयोजन किया जाता था, उस समय भी रामलीला में रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता था।
 
मेरठ के सरधना में भी रावण की पूजा
बिसरख और रावण उर्फ बड़ागांव के अलावा मेरठ के सरधना क्षेत्र में भी रावण को महापंडित मानने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है। यहां के रहने वाले जितेंद्र पांचाल ने बाकायदा बिसरख जाकर वहां रावण के मंदिर में पूजा की और सरधना क्षेत्र में भी रावण का मंदिर बनाने की मुहिम चलाई। इस मुहिम का साथ देने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। दशहरे पर सरधना क्षेत्र में कई स्थानों पर रावण का पुतला नहीं फूंका जाता और लंकापति की पूजा की जाती है।
 
उत्तराखंड में बनाए गए रावण की प्रशंसा में लोकगीत
डाॅ. कृष्णकांत शर्मा का कहना है कि लंकापति रावण ने अपने भाईयों कुंभकरण और विभीषण के साथ हिमालय में अनेक वर्षों तक तपस्या की। इस कारण हिमालयक्षेत्र में रावण का बड़ा प्रभाव रहा है। तपस्या करके लौटते समय रावण अपने भाईयों के साथ उत्तराखंड और वेस्ट यूपी के जनपदों से निकल कर गया था। इन सबके कारण ही इन क्षेत्रों में रावण से जुड़े स्मृति चिन्ह मिलते हैं। यह पूरा क्षेत्र हिमालय-यमुनौत्री मार्ग पर स्थित होने के कारण स्वाभावित तौर पर प्रमाणित होता है कि रावण इस क्षेत्र से होकर अपनी लंका नगरी गया होगा। उत्तराखंड के गढ़वाल में बहुत सारे गांवों में रावण की प्रशंसा में लोकगीत बनाए गए हैं और लोग उन्हें गाते हैं। 
भारत में रावण के नाम पर बसे हुए हैं 62 गांव
भारत सरकार की रिपोर्ट का अध्ययन करने से पता चलता है कि लंकापति रावण के नाम पर भारत में 62 गांव बसे हुए हैं। यह गांव उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, उत्तराखंड, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर राज्यों में स्थित है। सबसे ज्यादा गांव उत्तर प्रदेश में है। इनमें अंबेडकर नगर जनपद में रावण डीह, रामपुर में रावण, रावण घासी, रावण कन्नू, रावण लाला उर्फ बिशनपुरी, रावणीपट्टी उडा, बिजनौर में रावण, रावण दर्गा, रावण हैबत, रावण शिकारपुर, उन्नाव में रावण हर, खीरी में रावणही, सुल्तानपुर में रावणिया, बागपत में रावण उर्फ बड़ागांव, आजमगढ़ में रावणपुर, सीतापुर में रावणसी, मुरादाबाद में रावण बुजुर्ग, रावण खुर्द उर्फ बीबीपुर, बुलदंशहर में रावणी कटीरी बांगर, रावणी कटीरी खादर गांव है। उड़ीसा के नवरंगापुर जनपद में रावणागुड़ा, आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में रावणापैल्ली, तमिलनाडु के तिरूपुर में रावणापुरम, तिरूनेलवैली में रावणसमुद्रम, तिरूवन्नामलाई में रावणदावाडी आरएफ गांव है। इसी तरह से महाराष्ट्र के सतारा जनपद में रावणडी, पुणे और नांदेड़ में रावण गांव, जलगांव में रावणजी बीके, रावणजी केएच, गढ़चिरौली में रावणपल्ली, रावणवाड़ी, रावणजोरा, अहमदनगर जिले में रावणडी गांव स्थित है। कर्नाटक के मांडया जिले में रावणी, गुजरात के जूनागढ़ जिले में रावणी कूबा और रावणी मुड़िया, नवसारी जिले में रावणिया, बिहार के कैमूर जिले में रावण, लखीसराय जिले में रावण बरना, छत्तीगढ़ के रायपुर जिले में रावण नाम के दो गांव, रावण सीटी, रावण (रावड़), रावणभटा, रावण डिग्गी, रायगढ़ में रावण खोंडरा, उत्तराखंड के देहरादून जिले में रावणा, हरिद्वार जिले में रावण बंस, जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले में रावण पोरा, मध्य प्रदेश के सिहोर जिले में रावण खेड़ा, विदिशा में रावण, हरियाणा के कैथल जिले में रावण हेरा, राजस्थान के झालावाड़ में रावण गुरारी, उदयपुर और झुंझनूं जिलों में रावण नाम के दो गांव है। पंजाब के होशियारपुर और  कपूरथला जिलों में रावण नाम के दो गांव है।
 
रावण पर विस्तृत शोध करने वाले इतिहासकार डाॅ. देवेश चंद्र शर्मा का कहना है कि हिमालय में तपस्या करने के बाद लंकेश्वर रावण के लिए लंका जाने का वेस्ट यूपी से जाने वाला ही स्वाभाविक मार्ग था। ऐतिहासिक दृष्टि से रावण के मार्ग का अध्ययन करने से पता चलता है कि भारतीय संस्कृति से राम और रावण का अटूट संबंध रहा है। बिसरख में जन्म लेने के बाद पूरे संसार में अपनी शक्ति का डंका बजाने के बाद रावण ने सोने की लंका को अपनी राजधानी बनाया था। हिमालय से लंका जाने के मार्ग में जहां-जहां से भी लंकापति होकर गुजरा, वहां पर रावण से जुड़ी स्मृतियां आज भी मौजूद है। इनमें लंकापति को श्रद्धा से देखने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।