#मी टू अभियान के जरिए बदनाम करने का बदनुमा खेल
   दिनांक 22-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                          - आशीष कुमार ‘अंशु’
इसमें दो मत नहीं है कि #मी टू अभियान ने उन लोगों में डर पैदा किया है, जो महिलाओं के साथ गलत व्यवहार करने की सोचते हैं। लेकिन गहाराई से देखने पर यह बात स्पष्ट है कि इसके पीछे कुछ निहित तत्व हैं, जो महिलाओं का इस्तेमाल कर अपने स्वार्थ की पूर्ति के इच्छुक हैं
 
मलिका दुआ (बाएं) के पिता विनोद दुआ
14 अक्तूबर रात दस बजे ‘द वायर’ पर एक स्पष्टीकरण आया, ‘‘हमने निष्ठा जैन का फेसबुक पोस्ट देखा, जहां उन्होंने द वायर के सलाहकार संपादक विनोद दुआ पर 1989 में यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया है। विनोद दुआ ने इन आरोपों से इंकार किया है। हालांकि यह आरोप विनोद दुआ के द वायर से जुड़ने के 26 साल पहले का है।’’ इस पोस्ट पर मोरारदन जे. गढ़वी की बेलाग टिप्पणी थी, ‘‘बेशर्म! द वायर के स्पष्टीकरण से लगता है कि वह दूसरों के दामन पर हमेशा दाग लगाने की साजिश करने वाले विनोद दुआ पर कुछ नहीं कहेगी।’’
सचाई यह है कि #मी टू के वामपंथी अभियान को विनोद दुआ पर निष्ठा जैन द्वारा हैशटैग #मी टू के साथ लगाए गए आरोप के बाद जबरदस्त झटका लगा। इस प्रकरण में निष्ठा जैन का प्रवेश ‘प्रगतिशील स्क्रिप्ट’ में नहीं था। जैसे ही निष्ठा जैन ने अपनी आपबीती फेसबुक पर साझा की, कई छद्म प्रगतिशील टीवी चैनल, अखबार और वेबसाइट के चेहरे पर पड़ा प्रगतिशीलता का मुखौटा उतर गया। ऐसे सभी ठिकानों पर विनोद दुआ की बेटी मलिका दुआ पापा के बचाव में मैदान में उतरी नजर आई। मलिका की बात करने से पहले निष्ठा जैन के आरोपों पर एक नजर।
निष्ठा जैन ने अपने आरोप में 1989 की घटनाओं का जिक्र किया है। उनकी फेसबुक पोस्ट के अनुसार जून, 1989 में जब वह नौकरी के लिए विनोद दुआ से मिलीं, तब उन्होंने उन्हें कोई अश्लील चुटकुला सुनाया। ऐसा चुटकुला जिस पर हंसा नहीं जा सकता था। इतना ही नहीं, जब जैन ने वेतन को लेकर अपनी अपेक्षा उन्हें बताई तो दुआ ने बेशर्मी से कहा, ‘‘तुम्हारी औकात क्या है?’’ यह सुनना निष्ठा के लिए चोट पहुंचाने वाला था। निष्ठा के अनुसार, यह सुनकर उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने इस घटना के बारे में अपने भाई और दोस्तों को भी बताया था। बाद के दिनों में एक जगह उनकी नौकरी लग गई और दुआ को इसकी जानकारी मिली। फेसबुक पोस्ट के अनुसार एक रात जब निष्ठा कार पार्किंग की तरफ जा रही थीं, तो विनोद दुआ पहले से वहां थे। उन्होंने कहा कि वह निष्ठा से बात करना चाहते हैं और उसे अपनी कार में आने को कहा। निष्ठा को लगा कि वे अपने व्यवहार के लिए माफी मांगना चाहते थे। दुआ की हरकतों की वजह से ही निष्ठा ने यह लिखा कि किसी तरह वह वहां से निकलने में कामयाब रहीं। निष्ठा के अनुसार इसके बाद अगली एक रात दुआ फिर र्पाकिंग में आए तो वह उन्हें देखकर लौट गर्इं। जिस तरह एम.जे. अकबर का पक्ष सुने बिना पूरा वामपंथी खेमा पिछले कुछ दिनों से उनके पीछे पड़ा था, अब विनोद दुआ का नाम सामने आने के बाद उसे दूसरा पक्ष सुनने की जरूरत महसूस हो रही है तो यह कैसे मान लिया जाए कि मामला उतना ही साफ है, जितना दिखाने का प्रयास किया जा रहा है? दुआ के पक्ष में अचानक सामने आई मलिका दुआ दो दिन पहले तक टीवी कलाकार आलोक नाथ पर लगे आरोप पर उनकी सफाई सुनने को तैयार नहीं थी। वह तो हैज टैक के साथ बाबूजी, माईएस लिख रही थी। लेकिन जब अपने बाबूजी पर आरोप लगा तो उनकी अश्लील भाषा में शालीनता आ गई। मलिका जिस यूट्यूब चैनल को अपनी सेवाएं दे रही हैं, उसका नाम ‘आॅल इंडिया बक*’ यानी एआईबी है। इसके नाम से ही इसकी सामग्री का अंदाजा लगाया जा सकता है। द्विअर्थी संवाद ही इसकी पहचान हैं। जब अक्षय कुमार ने एक कार्यक्रम में मलिका से उन्हीं की भाषा में संवाद किया तो विनोद दुआ के अंदर का ‘बाबूजी’ जाग गया। लगता है कि मलिका और विनोद में कोई अनकहा समझौता है, जो ऐसे मौकों पर दोनों एक-दूसरे के साथ खड़े हो जाते हैं।
15 अक्तूबर को पत्रकार ओम थानवी ने फेसबुक पर लिखा,‘‘आहत और शिकायतजदा औरतों को मुकदमे से डराने-धमकाने निकले एमजे अकबर को चुनावी एजेंडा लगती है #मी टू की मुहिम। उन्होंने अपने साथ काम कर चुकीं पत्रकार प्रिया रमानी पर मुकदमा ठोक दिया है।’’ जबकि ये वही ओम थानवी हैं, जो खुर्शीद अनवर के मामले में बार-बार मीडिया ट्रायल का विरोध कर रहे थे और न्याय के लिए न्यायालय की बात बार-बार कह रहे थे।
केरल में 15 अक्तूबर को रोमन कैथोलिक बिशप फ्रेन्को मुरक्कल को जमानत मिली। उस पर एक नन से निरंतर बलात्कार का आरोप है। इस मामले को लेकर देशभर की ननों में आक्रोश पैदा हो रहा था। यही नहीं, किसी नई नन को बहला-फुसलाकर चर्च में लाना मुश्किल हो गया था। उधर एक बड़े वर्ग में यह चर्चा है कि चर्च की बलात्कारी प्रवृत्ति से समाज का ध्यान भटकाने के लिए इस अभियान में चर्च प्रेरित संस्थानों ने निवेश किया।
अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने अभी हाल सितंबर के अंतिम सप्ताह में फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर पर गंभीर आरोप लगाए। उसके बाद ही भारत में इस अभियान में तेजी आई। उसी दौरान 29 सितंबर, 2018 को डीएनए इंडिया न्यूज नाम के यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो मिला, जिसमें दत्ता ने कहा, ‘‘2009 में जीसस से मेरी आध्यात्मिक मुलाकात हुई और उन्होंने मुझे स्वस्थ किया।’’ उल्लेखनीय है कि तनुश्री की मदद से पूरे देश का ध्यान चर्च और बलात्कार के आरोपी बिशप से #मी टू की तरफ ले जाने में चर्च की प्रेरणा से काम करने वाले निवेशकों ने सफलता हासिल की है। जबकि दत्ता की अधिक जरूरत इस वक्त जीसस की उन बेटियों को है, जिनकी आवाज कोई नहीं सुन रहा। हुआ यह है कि अब कुछ आरोपों की परत उतर रही है और नए खुलासे हो रहे हैं। योग शिक्षिका इरा त्रिवेदी ने 2010 की घटना का जिक्र करते हुए लिखा था, ‘‘चेतन भगत ने उन्हें अपने कमरे में बुलाकर चूमने की कोशिश की थी।’’ अब ईरा के 2013 में लिखा हुआ एक ई मेल जारी करते हुए चेतन ने लिखा है, ‘‘कौन किसे चूमना चाहता था?’’ जिस मेल को चेतन ने साझा किया है वह 25 अक्तूबर, 2013 की है और ई मेल के अंत में ईरा ने लिखा है, ‘‘मिस यू, किस यू।’’
स्त्रियों की मर्यादा और चरित्र से खेलने वाले इस अभियान को लेकर सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का बयान उल्लेखनीय है। बकौल लता, ‘‘वास्तव में इस बात में मेरा विश्वास है कि कामकाजी महिलाओं को गरिमा, सम्मान और वह स्थान जिसकी वह हकदार हैं मिलना ही चाहिए। यदि कोई वह जगह देने से इंकार करे तो उसे सबक सिखाया जाना चाहिए।’’बहरहाल यह अभियान तभी सार्थक माना जाएगा जब यह सिर्फ पुरुषों को बदनाम करने के संघर्ष की जगह न्याय की लड़ाई बने। जिसका मुकाम सोशल मीडिया की चौपाल पर दो शब्द लिखकर मामले के निपटारे तक न हो, बल्कि यदि पुरुष दोषी हैं तो उन्हें उनके अपराध की सजा दिलाने तक का यह सफर बने। वर्ष 1997 की बात है जब एक 13 वर्षीया बलात्कार पीड़िता की कहानी को सुनकर सामाजिक कार्यकर्ता तराना बुरके निशब्द हो गर्इं। यहीं से अमेरिका में #मी टू अभियान के बीज पड़े। इस घटना के 10 साल के बाद तराना बुरके ने एक गैर सरकारी संगठन बनाया। उन्हें इसका ख्याल इसलिए आया, क्योंकि जब वह पीड़िता बच्ची से मिली थीं, उस वक्त उन्होंने खुद को असहाय पाया था। वे बच्ची की मदद नहीं कर सकती थीं। यह 10 साल की प्रतिबद्धता थी जिसने बुरके को इतनी मजबूती से अपने अभियान के साथ खड़े रहने की प्रेरणा दी। #मी टू अभियान के अंतर्गत हैश टैग #मी टू लिखकर महिलाएं अपने साथ कार्यस्थल पर होने वाली यौन हिंसा पर केंद्रित पोस्ट आमतौर पर लिखती हैं। भारत में #मी टू लोकप्रिय बहुत हुआ लेकिन यहां अमेरिका की तरह इस हैश टैग पर जो लिखा जा रहा है, उसमें न्याय पाने की दृढ़ इच्छा से अधिक जिसके लिए लिखा जा रहा, उसका सामाजिक बहिष्कार और उसके अपमान की चाहत अधिक दिखती है। इसी चाहत के कारण कुछ लोग इस अभियान का विरोध कर रहे हैं।