राह भविष्य के भारत की
   दिनांक 22-अक्तूबर-2018
 
विजयादशमी पर सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का उद्बोधन ठीक वैसा ही था जैसी कि इसकी पहचान है। सामयिक मुद्दों को समग्रता से समेटे, धुंधले-उलझाऊ मुद्दों पर पर्याप्त स्पष्ट-मुखर और एक महान प्रेरक आह्वान से गूंजता हुआ।
देश की सुरक्षा सिर्फ सीमाओं की रक्षा से नहीं होगी, इसके लिए आंतरिक स्थितियों और उपद्रवों का संज्ञान लेना जरूरी है- यह कितनी खरी बात है!
परिवार में संस्कार हों, समाज समरस हो, हम सबके चिंतन में समग्रता हो— इन बातों पर किसे आपत्ति हो सकती है? संघ जब इन मुद्दों पर अपनी बात कहता है तो जनता-जनार्दन के दिल में उतर जाता है। जिन्हें हर हाल में संघ की आलोचना करनी है, ऐसे आलोचकों को यदि रहने दें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कम समझने वालों, भ्रम अथवा शंका की दृष्टि से देखने वालों को खरापन और ऐसी स्पष्टता भाती है। क्योंकि इससे दिमाग पर छाई धुंध और नकारात्मकता हटती है, सोचने के लिए राष्ट्रीय दृष्टिकोण मिलता है।
ध्यान दीजिए, रेशिमबाग मैदान के वार्षिक उद्बोधन का एक अलग महत्व होने पर भी यह हाल में दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित व्याख्यानमाला से जुड़ती हुई बात है। तब ऐसा लगा कि संघ को न जानने वाले एक बड़े वर्ग ने अचानक ‘संघ की बात’ बड़े ध्यान से सुनी है।
दरअसल, मीडिया या सामाजिक विमर्श के अन्य मंचों पर, संघ का नाम आते ही कुछ लोग एक कुहासा-कोलाहल रचने का काम करते थे। किन्तु लगता है, संघ की स्पष्टता और इसे जनता द्वारा हाथोंहाथ लेने से खास खेमेबंदियों का यह पैंतरा पिटने लगा है। विज्ञान भवन के आयोजन के बाद मीडिया में लेखों की बड़ी शृंखला, पाठकों, दर्शकों की प्रतिक्रिया की उछाल बता रही थी कि राष्ट्रीय विचार की तरंगें विज्ञान भवन के दायरे से बाहर निकल रही हैं। विज्ञान भवन में जहां बात समाप्त हुई थी, इस विजयादशमी उद्बोधन ने राष्ट्रीय विमर्श के सूत्र ठीक उन्हीं जगहों पर जोड़े। निश्चित ही संघ की निर्भीक साफगोई राष्ट्रीय ‘कोलाहल’ को ‘स्वर’ देने का काम कर रही है।
यह संघ के प्रति बढ़ती जिज्ञासा का संकेतक ही है कि विजयादशमी उद्बोधन प्रारंभ होने से पूर्व समाचार चैनलों के मंच सजे थे। मीडिया विमर्श में शामिल (संघ को न समझने वाले) कुछ सज्जन ऐसे भी थे जिन्हें लगता था कि इस भाषण में केंद्र सरकार की बड़ी और अच्छी योजनाओं की नाम ले-लेकर प्रशंसा की जाएगी। ऐसे महानुभावों को इच्छित विषय नहीं मिले होंगे। नई ‘शिक्षा नीति’ में देरी के उलाहने से हैरानी भी हुई होगी। किन्तु सत्ता (जो भी हो) और सरोकार (जो शाश्वत हैं) के बीच संतुलन को संघ कैसे इंगित करता है, यह जानने वालों को इस उद्बोधन से जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ।
यही तो संघ है!
जिन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, ‘राजनीतिक स्वयंसेवक संघ’ लगता है, ऐसे लोग इस भाषण से जरूर चौंके होंगे, क्योंकि इस पूरे कार्यक्रम में यदि कुछ नदारद था तो वह थी राजनीति।
‘नोटा’ और निर्वाचन का जिक्र विज्ञान भवन के बाद यहां भी हुआ। ध्यान देने वाली बात है कि इन दोनों ही प्रश्नों को दलीय राजनीति से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। लोकतंत्र में जनता की राय की धार कुंद करने वाले ‘बटन’ की खोट सामने रखना बहुत जरूरी बात थी। यह बात जनता के बीच गहराई तक पहुंचे, इसके लिए ऐसे ऊंचे मंचों का चयन जरूरी था। ‘नोटा’ के पक्ष में हवा बनाए जाने और इसके नकारात्मक पहलू की यह जानकारी न होने से लोकतंत्र कमजोर होता है और पैंतरेबाज राजनीति मजबूत होती है। सो, नोटा या निर्वाचन, दलीय राजनीति नहीं, मतदाता की शक्ति को उभारने वाले मुद्दे हैं। बहरहाल, सामयिक सवालों को बिन्दुवार उठाता, समस्याओं के अंतर्निहित कारण बताता और समाज को राष्ट्रहित में समाधान के लिए प्रेरित करता यह उद्बोधन भविष्य के भारत की राह प्रशस्त करेगा, इसमें कुछ संदेह नहीं। यदि कुछ लोगों को भविष्य के भारत में ‘राजनीति’ से इतर कुछ नहीं दिखता तो यह सोच-समझ उनकी है।