आने वाली पीढ़ी को सहेजें
   दिनांक 23-अक्तूबर-2018

रेशिम बाग परिसर में पूज्य गुरुजी की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए श्रीमती एवं श्री कैलाश सत्यार्थी 
पिछले 20 वर्षों में ही दुनिया में बाल मजदूरों की संख्या 26 करोड़ से घटकर 15 करोड़ रह गई है। लेकिन मुझे अफसोस है कि आज भी भारत में हमारी बेटियों को जानवरों से भी कम कीमत पर खरीदा-बेचा जा रहा है। मैंने ऐसी कई बेटियों को गुलामी से मुक्त कराया है, जो छूटने के बाद भी अपने माता-पिता के गले से लिपटकर रोने का साहस नहीं जुटा पातीं। उन्हें लगता है कि बलात्कार और यौन शोषण से उनका शरीर और आत्मा मैले हो गए हैं। हमें गर्व है कि हम गौतम, कपिल, कणाद, अनुसूइया, सावित्री, सीता, लक्ष्मीबाई, बुद्ध, महावीर, गुरुनानक, छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, गांधी, भगत सिंह, सुभाष और अशफाकउल्ला की संतानें हैं। इसलिए भले ही भारत में सौ समस्याएं हैं, लेकिन भारत माता एक अरब समाधानों की जननी है।
संवेदनशीलता अथवा करुणा के बगैर किसी भी सभ्य समाज का निर्माण नहीं हो सकता। करुणारहित राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज बिना आत्मा के शरीर की तरह होते हैं। एक दूसरे की पीड़ा की अनुभूति और उसे दूर करने की इच्छाशक्ति और प्रयास के बगैर सुख और शान्ति कायम नहीं किए जा सकते।
भारत विविधताओं का देश है। मत-मजहबों, पूजा-पद्धतियों, खान-पान, भाषा, वेशभूषा, विचारधाराओं की विविधता एक गुलदस्ते में सजाए गए रंग-बिरंगे फूलों की तरह है। हमारे अलावा दुनिया मे कोई और देश ऐसा नहीं है। समावेशिता और सहिष्णुता भारतीय संस्कृति की आत्मा है। इसके बगैर विविधता में एकता नहीं रह सकती।
हम सब साथ-साथ चलें। सब प्रेम से मिलकर आपस में बातचीत करें। सब मिलकर विचार-विमर्श करें। हमारे पूर्वजों की तरह हम भी साथ मिल-बैठकर सबके लिए ज्ञान का सृजन करें। उपनिषद् तो यहां तक कहता है ‘‘ईशावास्यं इदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत।’’ यानी संसार में सभी जगह और हर चीज में ईश्वर का निवास है।
एक और महत्वपूर्ण तत्व है सुरक्षा। समाज में सुरक्षा की व्यवस्था, वातावरण और विश्वास के बगैर किसी भी राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं है। सीमाओं की सुरक्षा जितनी जरूरी है, उतनी ही आंतरिक सुरक्षा। यह सच है कि आज की दुनिया में सभी देश उद्योग, बाजार, तकनीक में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था, रोजगार सृजन और सामाजिक संतुलन के लिए स्वावलंबन या आत्मनिर्भरता बहुत जरूरी है। हमारा देश कृषि प्रधान और मझोले तथा कुटीर उद्योगों वाला देश है। हम विदेशी पूंजी निवेश और गिने-चुने उद्योगपतियों के और ज्यादा अमीर बन जाने से स्वावलंबी नहीं बन सकते। हमें किसानों, श्रमिकों और खुदरा व्यापारियों को सशक्त बनाना होगा।
 रेशिम बाग में डॉ हेडगेवार की प्रतिमा
राष्ट्र निर्माण का अगला तत्व स्वाभिमान है। सैकड़ों सालों की विदेशी गुलामी भारत की आत्मा को तो नहीं मार सकी, परंतु मन में हीनता और मानसिक दासता का भाव जरूर छोड़ गई। इसी हीनभावना के कारण अपनी भाषा, वेशभूषा, खान-पान, और शिक्षा के प्रति तिरस्कार बढ़ रहा है।
अपनी महान संस्कृति के प्रति स्वाभिमान पैदा करने के लिए हमें सांस्कृतिक मूल्यों की डोर को थामना होगा। मेरे विचार से भारत की सनातन संस्कृति के तीन प्रमुख दार्शनिक पहलू हैं। पहला, शाश्वतता, यानी न तो कभी पैदा होने और न कभी मरने का भाव। दूसरा सार्वभौमिकता, यानी हम किसी स्थान और समय की सीमा से खुद को नहीं बांधते। इसीलिए हजारों साल पहले हमारे ऋषि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश दे सके। तीसरा समग्रता, हम समाज को और संसार को टुकड़ों में बांटकर नहीं देखते।
इसीलिए हमारी संस्कृति एक ऐसी नदी की अविरल धारा की तरह है, जिसमें समय पर स्वत:स्फूर्त, झरने निकलते रहते हैं। हमारे अंदर आत्म सुधार करते रहने की अनोखी क्षमता है। मैं भारत की तरुणाई का आह्वान करता हूं। किसी के पिछलग्गू, याचक या आलोचक बने रहने की बजाय अपनी इस सांस्कृतिक ताकत को पहचानो। आओ, हम अभी से, संवेदनशील भारत, समावेशी भारत, सुरक्षित भारत, स्वावलंबी भारत और स्वाभिमानी भारत बनाने का संकल्प लें। इसकी शुरुआत हर बच्चे को स्वतंत्रता, सुरक्षा, शिक्षा, संस्कार और स्वास्थ्य सुनिश्चित करके की जाए।
मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के युवा मित्रों से प्रार्थना करता हूं कि वे भारत के वर्तमान और भविष्य को बचाने में अगुआई करें। गांव-गांव में फैली संघ की शाखाएं, बच्चों के लिए सुरक्षाचक्र बनकर यदि इस एक पीढ़ी को बचा लें, तो बाद में आगे आने वाली सभी पीढ़ियां खुद को बचा लेंगी।
 
(नोबेल पुरस्कार से सम्मानित बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक श्री कैलाश सत्यार्थी द्वारा संघ के विजयदशमी उत्सव में दिए गए उद्बोधन के अंश )