‘अपने स्वत्व, मेधा व महापुरुषों पर गर्व करें’
   दिनांक 24-अक्तूबर-2018


कार्यक्रम को संबोधित करते डॉ. कृष्ण गोपाल। मंच पर (बाएं से) श्री प्रभात कुमार एवं डॉ.महेश शर्मा
पिछले दिनों नई दिल्ली में प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘रामायण की कहानी, विज्ञान की जुबानी’ पुस्तक का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ़ कृष्णगोपाल उपस्थित थे। इस अवसर पर उन्होंने कि यह पुस्तक स्वयं को स्वीकारने का प्रामाणिक दस्तावेज है। तर्कसंगत व वैज्ञानिक तथ्यों द्वारा हम अपने गौरवपूर्ण अतीत से भविष्य की पीढ़ी को लाभान्वित कर सकते हैं। लेकिन स्वतंत्रता से पूर्व अंग्रेजों ने जो लिखा वही हमारे भाग्य में आ गया। पराधीनता की अवधि में दस-बारह पीढ़ियां बीतने के बाद एक ऐसा समाज खड़ा हुआ जो स्वयं को ही नकारने लगा। यह पुस्तक हमें स्वयं को नकारने से बाहर निकालती है। महर्षि वाल्मीकि ने उस समय के इतिहास को श्लोकों में लिखा, विज्ञान आज हजारों साल पूर्व लिखी वाल्मीकि रामायण में बताई गई ग्रहों-नक्षत्रों की स्थिति को प्रमाणित करता है। रामायण में दिए हिमयुग के वर्णन को आधुनिक विज्ञान अब मान रहा है। वाल्मीकि रामायण में बताया गया रामसेतु तथा समुद्र में डूबी द्वारका को आज नासा भी स्वीकार रहा है। इसलिए हमें अपने साहित्य, स्वत्व, अपनी मेधा, प्रज्ञा तथा अपने महापुरुषों पर गर्व करना चाहिए। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित केन्द्रीय संस्कृति राज्य मंत्री डॉ़ महेश शर्मा ने कहा कि इस पुस्तक में दिए वैज्ञानिक तथ्यों को देखकर लगता है कि न्यायालयों में जो आज बहुत बड़े-बड़े फैसले रुके हुए हैं, उनके लिए अब किसी साक्ष्य या गवाही की जरूरत नहीं रह जाएगी। हमें ईश्वर, माता-पिता और गुरु के अस्तित्व पर सवाल नहीं उठाने चाहिए। देश का इतिहास कोई बदल नहीं सकता, हमारा गौरवमयी इतिहास है।
पुस्तक की लेखिका सरोज बाला ने बताया कि यह पुस्तक वाल्मीकि रामायण पर आधारित है। रामायण को भविष्य तक पहुंचाने के लिए वाल्मीकि ने लवकुश को रामायण कंठस्थ करवाई तथा लवकुश ने इसे स्थान-स्थान पर ऋषि-मुनियों तथा अश्वमेघ यज्ञ के समय श्रीराम के दरबार में अनेक राजाओं तक पहुंचाया। महर्षि वाल्मीकि ने इसे सीता के जीवन को ध्यान में रखकर लिखा था, इसलिए इसे सीतायन भी कहा जा सकता है।