कब ली जाएगी जम्मू—कश्मीर के वाल्मीकि और वंचित लोगों की सुध
   दिनांक 26-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                                         डॉ. प्रवेश कुमार
जम्मू कश्मीर को धारा 370 के तहत मिले विशेष दर्जे के कारण वाल्मीकि समाज को स्थायी निवासी नहीं माना गया है. धारा 35 B सिविल सेवा रेग्युलेशन अधिनियम ( Civil service regulation act Jammu Kashmir ) के तहत वाल्मीकि समाज का व्यक्ति केवल सफाई कार्य करने के लिए बाध्य है. वह कोई और नौकरी नहीं कर सकता है. इसी प्रकार धारा 35 A है. इसमें स्थायी निवासी कौन है को परिभाषित किया गया है
जम्मू कश्मीर मुख्यता पांच क्षेत्रों, जम्मू, कश्मीर , लद्दाख, गिलगित और बालटिस्तान को मिलाकर बनता है। भारत के विभाजन और फिर क़बायली आक्रमण के बाद हमने गिलगित और बालटिस्तान को खो दिया. आज हमारे पास जम्मू, कश्मीर और लद्दाख ये तीन हिस्से ही रह गए हैं. जम्मू क्षेत्र जहां हिन्दू बहुल है, वहीं कश्मीरी पंडितों को जबरन कश्मीर छोड़ने पर मजबूर करने के कारण कश्मीर क्षेत्र अब मुस्लिम बहुल हो गया है. लद्दाख में हिन्दू बौद्ध मत को मानने वाले हैं, पर वहां कुछ छोटे हिस्सों में मुस्लिम भी हैं.
सांस्कृतिक रूप से कश्मीर को सदैव भारत का अधिक समृद्ध हिस्सा माना गया था. शैव दर्शन की बात करें तो यह प्रमुख केंद्र रहा है. संत अभिनवगुप्त की कर्मस्थली यही कश्मीर रहा है. वहीं तिब्बत में कुशक बकुला रिमपोच्छे और उनके योगदान को कौन भूल सकता है. बौद्धमत को एक भिन्न धारा देने का कार्य कुशक बकुला जी ने किया था. ये जम्मू कश्मीर ही था जहां सूफी मत का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार हुआ था. कुछ इतिहासकर तो ये भी मानते हैं कि मुस्लिमों के पैगम्बर मोहम्मद साहब अपने अंतिम समय में कश्मीर आने की इच्छा ही करते रहे. कुछ मानते हैं कि वो आए भी थे. वहीं ईसाई धर्मावलम्बी भी मानते हैं कि क्राइस्ट भी कश्मीर आए थे. श्रीनगर की हज़रत बल मस्जिद में माना जाता है कि वहां हज़रत मुहम्मद की दाढ़ी का एक बाल रखा हुआ है. श्रीनगर में ही शंकराचार्य पर्वत है, जहां विख्यात हिंदू धर्म सुधारक और अद्वैत वेदान्त के प्रतिपादक आदि शंकराचार्य सर्वज्ञानपीठ के आसन पर विराजमान हुए थे.
इतिहासकार मानते हैं कि श्रीनगर मौर्य सम्राट अशोक के द्वारा बसाया गया था. श्रीनगर से थोड़ी ही दूरी पर प्राचीन मार्तण्ड (सूर्य ) मंदिर है. वहीं कुछ ही दूरी पर अनंतनाग जिले में शिव को समर्पित अमरनाथ गुफा है. हर वर्ष हज़ारों की संख्या में तीर्थयात्री दर्शन के लिए वहां जाते हैं.
जम्मू कश्मीर के सामाजिक संरचना की बात की जाए तो यहां हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, सूफी आदि सभी हैं. जातियों में वाल्मीकि और वंचित समुदाय की अन्य जातियां भी हैं. मुस्लिम में गुजर, गद्दी, धोबी, भी बड़ी संख्या में हैं. मुस्लिमों में शिया-सुन्नी का भी बड़ा भेद है.
राजनीतिक तौर पर जम्मू कश्मीर एक पहचान के रूप महाराजा रणजीत सिंह जी के समय में ही आया. उसके बाद अंग्रेज़ों ने इसको जीत लिया. बाद में डोगरा हिन्दू राजा गुलाब सिंह ने अंग्रेज़ों से 75 लाख रुपए में इसे खरीद लिया था. इसमें उससे हिमाचल और पंजाब के कुछ क्षेत्रों को छोड़ जम्मू, कश्मीर, लद्दाख, गिलगित, बालटिस्तान आदि क्षेत्रों को दे दिया गया था.
देश और दुनिया में तमाम संस्थाएं और लोग मानवधिकारों के लिए काम कर रहे हैं. कथित वामपंथी और स्वयं को प्रोगरेसिव कहने वाले बुद्धिजीवी पूरे देश में मानव अधिकारों की वकालत करते हैं लेकिन जम्मू कश्मीर में रहने वाले वाल्मीकि जाति के लोगों की कोई बात नहीं होती. इनकी बात न समाज में पढ़ा-लिखा वर्ग करता और ना ही मीडिया घराने। दलित राजनीति करने वाले नेता और दलित संगठन कोई भी इनके बारे में नहीं बोलता है क्यों ?
वाल्मीकि समाज के नेता गुरु भट्टी जी कहते हैं, ‘ पूरे भारत में वंचित समुदाय के अधिकारों के बारे में तमाम बात हो रही हैं, परंतु क्या किसी को जम्मू कश्मीर के वाल्मिकियों बारे में कोई बात नहीं करता। इसका सबसे बड़ा कारण है जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा प्राप्त होना.
वाल्मीकि समाज के अधिकार और जम्मू कश्मीर पर जब विस्तार से देखते हैं तो उसके पीछे मजमून इस तरह का दिखता है. साल 1957 में जम्मू कश्मीर के सदरे रियासत ( प्रधानमंत्री ) ने पंजाब के वाल्मीकि समाज से कहा कि आप जम्मू कश्मीर में आ जाएं. यहां सफाई का काम करें. आपको वेतन, घर, नौकरी और आपके बच्चों को बेहतर शिक्षा देंगे. साथ ही आपको जम्मू कश्मीर का स्थायी निवासी भी बना दिया जाएगा. ऐसे आश्वासन पर लगभग वाल्मीकि समाज के 250 परिवार पंजाब छोड़कर जम्मू कश्मीर रियासत में आ गए. परंतु वादों के बिलकुल उलट जम्मू कश्मीर को धारा 370 के तहत मिले विशेष दर्जे के कारण वाल्मीकि समाज को स्थायी निवासी नहीं माना गया. सरकार ने इसमें ( धारा 370 में ) भी कुछ छूट देने कि बात की थी, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं.
जम्मू कश्मीर के वाल्मीकि समाज के लोगों से जब पुछा गया तो उनका कहना था, ‘ सफाई कर्मचारी के अलावा हम जम्मू कश्मीर राज्य में आने वाली अन्य किसी सरकारी नौकरी को नहीं प्राप्त कर सकते हैं. क्योंकि इन सब के लिए उनको वहां का स्थायी निवास प्रमाण पत्र चाहिए, जो उनके पास नहीं है. धारा 35 B सिविल सेवा रेग्युलेशन अधिनियम ( Civil service regulation act Jammu Kashmir ) के तहत वाल्मीकि समाज का व्यक्ति केवल सफाई कार्य करने के लिए बाध्य है. वह कोई और नौकरी नहीं कर सकता है.
इसी प्रकार धारा 35 A है. इसमें स्थायी निवासी कौन हैं को परिभाषित किया गया है. इसके अधार पर ही संपति का अधिकार, रोजगार का अधिकार, राज्य की सरकार में सम्मलित होने, पंचायत, विधानसभा, नगर पालिका आदि के चुनाव में शामिल होने या सरकार द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों में प्रवेश और छात्रवृति प्राप्त करने आदि जैसे हकों के बारे में बताया गया है.
जम्मू कश्मीर के दलितों का इन सभी अधिकारों से कोई संबंध नहीं है. वे आज भी लोकसभा चुनाव को छोड़ किसी और चुनाव में शामिल नहीं हो सकते हैं. न ही किसी उच्च पद को प्राप्त कर सकते हैं. इसी प्रकार जम्मू कश्मीर में रह रहे गोरखा और गुज्जर समाज के साथ भी तमाम तरह की असमानता और उत्पीड़न बदस्तूर जारी है.
(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सहायक प्रध्यापक हैं. )