राम मंदिर आंदोलन जब कारसेवकों पर ढाए गए थे जुल्म
   दिनांक 29-अक्तूबर-2018
अयोध्या राममंदिर आंदोलन ने देश की हवा, पानी, मिट्टी के तेवर को बदल दिया था। उसके पीछे श्रीराम के प्रति कोटि-कोटि भारतीयों की अनन्य भक्ति और श्रद्धा है
जिन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन अपनी आंखों से देखा, वे यह भूल नहीं सकते कि हिन्दू नामधारियों की सरकार में सिर्फ वोट और चुनावी जीत के लिए खेतों को श्मशान में और शहरों को वीराने में बदल दिया गया था। अर्थी ले जाने वाले रामनाम सत्य बोलें तो उन पर भी पाबंदी। सब्जी मंडी को ही जेल बना दिया—इतने लोग और व्यवस्था कम, तब विष्णुकांत शास्त्री ने कहा— देखो रामलला का खेल, सब्जी मंडी बन गई जेल। अशोक सिंहल पाञ्चजन्य का कार्ड बनवाकर अयोध्या गए, और वैसे ही श्रीश चंद्र दीक्षित। पर आज कोई बता दे कि अयोध्या आंदोलन का पहला हुतात्मा कौन था? कितने कारसेवक शहीद हुए? उनके नाम क्या हैं? यदि न बता पाए तो आश्चर्य नहीं, वे वोट नहीं, उनकी मूर्ति बनवाकर कोई राजनीतिक लाभ नहीं होने वाला, वे तो बस ‘थे’। गोधरा में 59 हिन्दू स्त्री, पुरुष, बच्चे जिन्दा जला दिए गए, उसे ‘ऐसा होना स्वाभाविक था’ बताने वालों ने कहा था ‘वे कारसेवक थे’, अयोध्या से लौट रहे थे। आज कारसेवक शब्द का उच्चारण भी शायद आप न सुन पाएं। राम जी से छल करके कोई सुख नहीं पा सकता। कुछ क्षण जरूर जातिवादी नेताओं की कृपा से अच्छे बीत जाएं। जिस मधुकर उपाध्याय, कमिश्नर (फैजाबाद) और सुभाष जोशी, एस.एस.पी. ने कारसेवकों पर औरंगजेबी जुल्म ढाए, गोलियां बरसार्इं, जिनको ‘न्याय’ दिलाने की कसमें खाई गर्इं, ‘अयोध्या के हत्यारों को माफ नहीं करेंगे’। उन्हें बाद में उत्तराखंड में पदोन्नतियां मिलीं।
अयोध्या राममंदिर आंदोलन ने देश की हवा, पानी, मिट्टी के तेवर को बदल दिया था। उसके पीछे श्रीराम के प्रति कोटि-कोटि भारतीयों की अनन्य भक्ति और श्रद्धा है। उसे जो चुनावी शतरंज का हिस्सा बनाए, उससे बढ़कर पातकी कोई हो नहीं सकता।
सत्ता कैसे व्यक्ति को बदलती है, इसे रामभक्त बखूबी जानते हैं। शपथ के लिए राष्ट्रपति भवन की सीढ़ियां चढ़ते लोग— और शपथ के बाद सीढ़ियां उतरते लोग कितने भिन्न हो जाते हैं— यह भी रामभक्त जानते हैं। रामद्रोहियों को जनता पटका-पटका कर दंड देती है। राम आंदोलन का पहला शहीद तथाकथित उच्च जाति का नहीं था, पर गोलियां चलाने वाला और तदन्तर उसे पदोन्नति देने वाला अवश्य ही उसी वर्ग से था। जो लोग समता, समरसता की बात करते हैं, वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि यदि जाति के जंगल में रहे तो हिन्दू को खो देंगे- यदि हिन्दू को थामा तो जाति स्वत: विलीन हो जाएगी। अयोध्या आंदोलन ने जाति को राम नाम में तिरोहित कर दिया था।
 
जो राजनीति के जादूगर हैं, वे समय के प्रहार को भूल जाते हैं। जाति, धन और ‘मेरे से तुम्हारी नजदीकी’ इतना भर योग्यता की कसौटी बन जाता है। उन्हें अयोध्या, काशी, मथुरा यानी राम, शिव और कृष्ण के बारे में राममनोहर लोहिया का लंबा निबंध- ‘भारत के तीन स्वप्न’ पढ़ना चाहिए। राम, कृष्ण और शिव के बिना भारत के विकास का स्वप्न क्या संभव है? कोई तो वजह होगी कि भगवा वस्त्रधारी योगी की योग चर्चा केरल से त्रिपुरा और गुजरात से बंगाल तक होने लगी है। कोई तो वजह होगी कि श्रीराम का नाम पुन: अयोध्या की ओर चलने का आवाहन करता दिखता है। कोई तो वजह होगी कि हर संकट, हर विपत्ति, हर आसन्न पराजय पर विजय के लिए पुन: राम शरण में जाने की हूक उठती है। यही हूक, यही आवाहन, यही हृदय की न दबाई जा सकने वाली भावना अयोध्या है।
स्वप्न है अयोध्या जी देश की सर्वश्रेष्ठ, अंतरराष्ट्रीय नगरी के रूप में पुष्पित-पल्लवित हों। स्वप्न है सरयू जी पुन: देश के जन-जन को अपनी ओर खींचें और देश का हर बड़ा नगर सीधे-सीधे अयोध्या जी से जुड़े। स्वप्न है देश की सबसे तेज गाड़ियां, देश का श्रेष्ठतम अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, देश का महान-विराट राम कथा का सचित्र संकुल—अंगकोर वाट की भांति अयोध्याजी में दिखे। स्वप्न है देश के विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नारी-सम्मान एवं सशक्तिकरण की गूंज से अनुनादित वातावरण अयोध्या जी में बने। स्वप्न है भारत की संसद का एक विशाल, विराट संयुक्त अधिवेशन— अयोध्या जी में हो— भव्य राममंदिर निर्माण के उद्घाटन को भारत का प्रणाम निवेदित करते हुए ताकि अंग्रेजों की बनाई इमारत, अंग्रेजों के बनाए रीति-रिवाज- शिष्टाचार- प्रोटोकाल- नियम-कायदों के ढांचे से बाहर भारत के कोटि-कोटि जन का प्रणाम श्री राम के चरणों तक पहुंचे। यह हो, तो तुम्हारी सड़कें, पानी, राजमार्ग, ऊर्जा वगैरह, वगैरह... सब सार्थक हो उठेंगी। राष्ट्र चुनावी रणनीति और सड़क, पानी, बिजली से परे एक आत्मा के उन्मीलन का भी विषय होता है। उसे राष्ट्र का मन कहते हैं। जिसने मन को थाम लिया, उसने ब्रह्म को स्वयं में समा लिया। अयोध्या भारत है— यह कभी भूलना मत। और राम से द्रोह करने वालों को क्षमा करना मत। जा के प्रिय न राम वैदेही, तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जदपि परम सनेही। जो राम का नहीं, वह हमारे काम का नहीं। इसके बिना सब कुछ व्यर्थ है।
(लेख पाञ्चजन्य के आकाईव से लिया गया है लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद हैं)