वामपंथी बुद्धिजीवियों का नाम आते ही ठंडा पड़ा #meetoo अभियान
   दिनांक 30-अक्तूबर-2018
 - आशीष कुमार 'अंशु'   
#meetoo अभियान ने महिलाओं को कितना सशक्त किया इसका मूल्याकंन होना शेष है, लेकिन इसने तथाकथित नारीवादियों, आंदोलनकारियों और वामपंथियों के एकपक्षीय चेहरे पर लगे दाग उजागर कर दिए हैं
विदेश राज्यमंत्री एम.जे. अकबर की मंत्रिमंडल से विदाई के बाद से मी टू अभियान में नरमी आई है। दिल्ली में तो कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि बलात्कार के आरोपी बिशप फ्रेंको मुरक्कल के मामले से ध्यान हटाने के लिए मी टू अभियान शुरू किया गया। यह भी देखा गया कि जब इस अभियान के सूत्रधारों के नाते-रिश्तेदार इसमें फंसने लगे तो वे इस अभियान से ही कन्नी काटने लगे। जब इसकी चपेट में वामपंथी पत्रकार विनोद दुआ आए तो यह अभियान लगभग ठंडा हो गया।
अब एक बार फिर से बिशप मुरक्कल की बात। उसके विरुद्ध गवाही देने वाले पादरी कोरियाकोस की पिछले दिनों हत्या हो गई। यह प्रकरण बहुत कुछ संकेत करता है। पिछले दिनों मेघालय की एक खासी युवती ने कैथोलिक चर्च के दो पादरियों ब्रदर फ्रांसिस गाले और ब्रदर मस्कट पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। मी टू अभियान के अंतर्गत उसने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह सब पादरियों ने उस वक्त किया जब उसकी उम्र महज पांच साल की थी। अब वह 40 वर्ष की है। उसके साथ यौन दुर्व्यवहार 12 साल की उम्र तक चलता रहा। उसने तीन बार आत्महत्या का भी प्रयास किया। सोशल मीडिया पर साझा की गई इस जानकारी के अनुसार ये पादरी बच्चियों को टॉफी देने के बहाने पास बुलाते और उनके साथ अभद्र हरकतें करते थे।
अब बात पत्रकार विनोद दुआ की। 'द वायर' नाम की एक वेबसाइट ने उनके लिए माफी मांगते हुए लिखा, ''मी टू : जन-गण-मन की बात के पिछले एपिसोड में विनोद दुआ द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोपों को गलत तरह से प्रस्तुत करने और उसका मखौल बनाने के लिए 'द वायर' के संपादक माफी मांगते हैं।''
वायर वेबसाइट उस अफवाह तंत्र का हिस्सा है, जिसे मोदी सरकार के विरुद्ध देश के वामपंथी मीडिया गिरोह ने खड़ा किया है। विनोद दुआ उस तंत्र के एक छोटे से पुर्जे का नाम है। एम.जे. अकबर मामले में यह गिरोह मीडिया के स्तर पर ही उन्हें दोषी ठहराने के लिए पीत पत्रकारिता करने लगा था। मी टू के मामलों पर न्यायालय क्या कहता है, इसे सुनने तक का संयम किसी मीडिया घराने के पास नहीं रहा। इसका साफ मतलब था कि वामपंथी गिरोह अपनी योजना में सफल था लेकिन इसकी सफलता उनकी नजर में थी, जिनके खुद के पति या पिता इस मामले में आरोपी नहीं थे।
क्या इस देश में महिला अधिकारों की लड़ाई सिर्फ पड़ोस के शैतान को खत्म करने के लिए लड़ी जाएगी? फिर घर के शैतान को कौन खत्म करेगा? कौन उनसे लड़ेगा? कायदे से कोई भी लड़ाई घर से शुरू होनी चाहिए, लेकिन इस बात से नंदिता दास और मलिका दुआ को कोई मतलब नहीं है।
पत्रकार विनोद दुआ तब तक खुद भी मी टू के कट्टर समर्थकों में से थे जब तक फिल्म निर्माता निष्ठा जैन ने उनका नाम नहीं लिया था। नाम लेने के बावजूद वायर ने विनोद दुआ को बचाने का पूरा इंतजाम करते हुए एक घरेलू किस्म की जांच समिति भी बना ली थी जहां से उनका साफ-सुथरा बच निकलना लगभग तय था। इसी बीच द वायर पर आने वाले 'जन गण मन की बात' के 318वें एपिसोड में विनोद दुआ ने अपना बड़बोलापन जाहिर करते हुए बताया, ''मुझ पर भी कीचड़ उछाला गया है। कीचड़ यौन शोषण का तो नहीं है, लेकिन परेशान करने का है। तीस साल पहले, किसी महिला को लगा कि मैंने कुछ ऐसा किया, जिससे उन्हें परेशानी हुई। अभी यह ऐसा कीचड़ है, जो किसी पादरी के चोगे पर भी लग सकता है, जज, वकील, पुजारी, डॉक्टर, किसी शरीफ आदमी के चोगे पर भी लग सकता है।''
उन्होंने यह भी कहा, ''कीचड़ एक बार लग गया तो लग गया। जिस पर फेंका गया है, वह क्या कर सकता है, सिवाए इसके कि वह इनकार करे कि ऐसा नहीं हुआ है। मुझ पर जो आरोप लगे हैं, मैं उन्हें नकार रहा हूं, खारिज कर रहा हूं। यह बेबुनियाद है, काल्पनिक है, ऐसा कुछ नहीं हुआ।''
इन्हीं विनोद दुआ ने कुछ ही दिन पहले 'द वायर' पर ही मी टू अभियान को ठीक से समझाने का दावा करते हुए कहा था, ''दस साल पहले तनुश्री दत्ता ने बयान दर्ज कराया था, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया था। अभी तक जो वॉलीवुड के महान लोग हैं, वे चुप हैं। तमाम बड़े-बड़े लोग चुप हैं, क्योंकि हमारे यहां इस तरह का चरित्र ही नहीं है ... यह हॉलीवुड नहीं है, जहां लोग बोलते हैं। यह बॉलीवुड है, यहां चवन्नी-अठन्नी वाले लोग रहते हैं।'' लेकिन विनोद दुआ खुद को रुपया साबित नहीं कर पाए। अपने मामले में न सही 'द वायर' के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ भाटिया पर भारती शुक्ला और रीमा सान्याल के ट्विटर अकाउंट से जो आरोप लगे थे, उस पर भी दो शब्द उन्हें बोलने चाहिए।
एनडीटीवी ने मी टू अभियान को मुहिम की तरह लिया, लेेकिन जो लोग इस मुहिम में लगे थे, उनकी मी टू के संबंध में खुद की विश्वसनीयता संदिग्ध है। जब इस मामले पर रवीश कुमार के साथ ओम थानवी देखे गए तो समझ आ गया कि चैनल का इरादा क्या है। रवीश के सहोदर भाई पर बिहार में यौन उत्पीड़न का मामला चल रहा है। इस संबंध में रवीश ने गुजरात में बयान दिया था कि मेरे भाई को फंसाया जा रहा है। ओम थानवी जब 'जनसत्ता' के संपादक थे तब यौन अपराध के किस्सों को 'सहमति' बताया करते थे। इस पर एक बार उनके साथ कुछ लोगों की बहस भी हुई थी। यही नहीं, थानवी अपनेे मित्र खुर्शीद अनवर के कथित बलात्कार कांड पर भी पर्दा डालते रहे। रवीश उस वक्त भी चुप्पी साध लेते हैं जब उनके मित्र फिल्मकार महमूद फारुकी पर आरोप लगता है। जेएनयू का बलात्कार आरोपी अनमोल रत्न तो एनडीटीवी प्राइम टाइम में रवीश कुमार का अतिथि हुआ करता था। निशा बोरा नामक सामाजिक कार्यकर्ता ने वरिष्ठ कलाकार जतिन दास पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। बोरा ने अपने ट्वीट में कहा कि जतिन ने अपने खिड़की गांव, दिल्ली स्थित स्टूडियो में 2004 में उनका यौन उत्पीड़न किया था। बकौल बोरा, ''मैं जतिन से उनके स्टूडियो में खिड़की गांव में मिली थी। दूसरी बात जो मैं जानती हूं वह यह कि उन्होंने मुझे पकड़ने की कोशिश की थी। मैं घबराकर उनसे दूर हो गई। इसके बाद उन्होंने फिर ऐसा करने की कोशिश की। इस बार वे भद्दे तरीके से मुझे चूमने में कामयाब रहे।''
बोरा के अनुसार वे दास (76) से 2004 में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मिली थीं। उस समय बोरा की उम्र 28 साल थी। बोरा ने कहा, ''मैं आज भी उनकी दाढ़ी की चुभन महसूस करती हूं। मैं उन्हें (जतिन दास) धक्का देकर दूर हो गई। उस समय उन्होंने मुझसे कहा था कि आओ भी, अच्छा लगेगा।''
बोरा ने कहा कि वे जतिन की बेटी फिल्म निर्माता व अभिनेत्री नंदिता दास से छोटी थीं। बोरा (42) का कहना है कि यौन उत्पीड़न का शिकार हो चुकीं महिलाओं की कहानियों को सुनकर उनके छिपे हुए घाव उभरकर सामने आ गए।
बोरा को झूठा ठहरा देना नंदिता और पिता जतिन के लिए आसान ही था, लेकिन अब जतिन पर आरोप लगाने वाली महिलाओं की संख्या चार हो गई है। गुरूशा कटोच, मालविका कुंडू, पत्रकार अनुश्री मजूमदार ने भी जतिन पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं।
वामपंथी लेखक और पत्रकार सी.पी. सुरेन्द्रन पर भी अब तक 11 महिलाओं ने आरोप लगाए हैं, लेकिन #मी टू पर हल्ला मचाने वाले वामपंथी पत्रकार इस पर चुप हैं। अच्छी बात यह है कि अब ऐसे पत्रकारों और लेखकों का असली चेहरा देश के सामने आ रहा है।