हिन्दू भयजनित सहनशीलता त्यागें
   दिनांक 04-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                       - कॉनराड एल्स्ट
हिन्दू समाज की महान परंपरा एवं समूची मानवता के लिए उसके ऐतिहासिक योगदान के बारे में साधारण हिन्दू ही नहीं, समाज के अधिकांश विद्वान भी अपरिचित हैं। इसी कारण तथाकथित बुद्धिजीवियों एवं हिंदू समाज के शत्रुओं को इसके बारे में नाना प्रकार के भ्रम फैलाने का खुला मैदान मिला हुआ है। ऐसे लोग कभी रामराज्य को दलित विरोधी बताते हैं, तो कभी महात्मा गांधी जैसे धार्मिक व्यक्ति को पंथनिरपेक्ष और कभी आंबेडकर जैसे हिंदू सुधारक को हिंदू विरोधी। इस प्रकार के कुप्रचार से ये लोग हिंदू समाज के विभिन्न मतों को एक साथ आने से रोकते हैं। इस दुष्प्रचार का उचित जवाब देना आज अत्यंत आवश्यक है, परंतु मीडिया एवं पैसा इनके हाथ में होने के कारण इनका स्वर इतना तेज है कि आज हिंदू अपना परिचय हिंदू के नाते देने से घबरा रहे हैं। रा.स्व.संघ हिन्दू संगठन के लिए बहुत बड़ा कार्य कर रहा है। भारत के संविधान में भी कुछ ऐसी धारणाएं हैं, जो हिन्दुओं के साथ भेदभाव करती हैं। मुझ जैसे विदेशी को बाहर के लोगों को यह समझाने में बहुत कठिनाई होती है कि हिन्दुस्थान में बहुसंख्यक समाज को शिक्षण एवं सेवा संस्थाओं के संचालन के उतने अधिकर नहीं हैं, जितने अल्पसंख्यकों को हैं। दुनिया में यह अनोखी एवं अद्भुत घटना है, पर हिन्दू इसे सहन किए जा रहे हैं। संविधान की धारा 30, 44 एवं 370 बदली जानी चाहिए, क्योंकि ये धाराएं भेदमूलक हैं।
(प्रकाशित तिथि 2 अप्रैल, 1995)