विवेक तिवारी की हत्या पर सपा और कांग्रेस कर रहे ओछी राजनीति
   दिनांक 08-अक्तूबर-2018
                                                                                                                                                         - राकेश त्रिपाठी 
लखनऊ में एक निर्दोष की हत्या को राजनैतिक नफे-नुकसान की तराजू में तौलने वाले अखिलेश यादव और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर इसकी आड़ में कानून-व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। जबकि आंकड़े बताते हैं कि योगी सरकार द्वारा प्रदेश में बदमाशों के खिलाफ चलाया गया अभियान सफल रहा है
 
मृतक विेवेक तिवारी की धर्मपत्नी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भेंट करती हुर्इं 
लखनऊ में विवेक तिवारी की हत्या के बाद आरोपित सिपाही सींखचों के पीछे हैं, उन्हें बर्खास्त कर दिया गया है। इस मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पुलिस महानिदेशक को फोन कर अपनी नाराजगी जताई है। फिलहाल घटना की जांच का जिम्मा पुलिस के बड़े अफसरों को दिया गया है। सरकार पीडि़त परिवार की हरसंभव मदद कर रही है। लेकिन दुर्भाग्य से इस घटना का इस्तेमाल अब सियासी बवंडर खड़ा करने में किया जा रहा है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों मौके का फायदा उठाने में लगी हैं, बगैर ये सोचे-समझे कि एक निर्दोष की हत्या को राजनैतिक नफे-नुकसान की तराजू में तौलने वाला उनका रुख राजनीति के गिरते स्तर की ओर इशारा करता है। अखिलेश यादव और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर इसे कानून-व्यवस्था पर उठा सवाल बता रहे हैं और सूबे में बदमाशों के मुठभेड़ों में मारे जाने से इस घटना की तुलना कर रहे हैं। हैरानी की बात है कि ये दुहाई वे लोग दे रहे हैं, जिनके राज में बदमाशों को खुली छूट होती थी और कभी अगर किसी ईमानदार पुलिस अफसर ने किसी बदमाश को पकड़ भी लिया तो उसका तुरंत स्थानांतरण कर ऐसी जगह भेज दिया जाता था, जिससे ईमानदार अफसर फिर किसी अभयदान पाए बदमाश को पकड़ने की हिम्मत न कर सके। समाजवादी पार्टी का झंडा लगाकर सरेआम गुंडागर्दी करने वालों की खबर जब समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव तक पहुंची, तो उन्होंने न सिर्फ इसकी शिकायत मुख्यमंत्री अखिलेश से की, बल्कि प्रदेशभर के कार्यकर्ताओं को बुलाकर फटकारा भी, कि सुधरे नहीं तो सूबे से साफ हो जाओगे।
प्रदेश में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते कानून-व्यवस्था की एक बानगी देखिए। शाहजहांपुर में खनन के एक मामले को उजागर करने की एवज में एक पत्रकार जगेंद्र सिंह को कुछ गुंडों ने जिंदा जला दिया था। उसके परिवार ने आरोप लगाया था कि सपा सरकार के मंत्री राममूर्ति वर्मा ने जगेंद्र को मरवाया, क्योंकि उनकी लिखी खबर मंत्री के हितों के आड़े आ रही थी। मामला खूब उछला, लेकिन अखिलेश यादव के कान पर जूं तक न रेंगी, और उन्होंने मंत्री पर कार्रवाई से इंकार कर दिया। इतना ही नहीं, उस समय के एक और बाहुबली मंत्री पारसनाथ यादव ने बयान दिया था कि पत्रकार की किस्मत में ऐसी ही मौत लिखी थी। जले पर नमक छिड़कने वाले ये जनाब भी उन्हीं अखिलेश यादव के चहेते मंत्री थे, जो आज कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
अब जिस पुलिस को अखिलेश गालियां दे रहे हैं, उसी पुलिस के एक अफसर पर इस मामले में आरोप लगा था कि पत्रकार जगेंद्र को जलाने में जिन चार सपाई गुंडों का हाथ था, उनके साथ वह पुलिस अफसर भी घटनास्थल पर मौजूद था। यह बात भी ध्यान देने वाली है कि अखिलेश के मुख्यमंत्री रहते पुलिस विभाग में अपराधियों की भर्ती और एक खास जाति को दारोगा और सिपाहियों की भर्तियों में प्राथमिकता देने का भी खूब आरोप लगा था। हालत यह हो गई थी कि मुलायम सिंह यादव को 2012 में सरकार बनने के कुछ महीने बाद ही कहना पड़ गया था कि सूबे में गुंडों का राज हो गया है। अखिलेश के चाचा रामगोपाल यादव ने तो यहां तक कह दिया था कि 'पार्टी के नेता और वर्कर जनता की बात नहीं सुन रहे हैं। अगर अब भी आप लोगों ने खुद को नहीं सुधारा तो जूते खाने पड़ सकते हैं।'
बहरहाल, एक दूसरी बानगी देखिए। अखिलेश के मंत्री गायत्री प्रजापति पर जब एक महिला के बलात्कार और उसकी बेटी से बलात्कार की कोशिश करने का आरोप लगा, तो पहले तो उन्हें हटाने में अखिलेश ने आनाकानी की, लेकिन जब मामला बढ़ गया तो गायत्री प्रजापति को मंत्री पद से हटाना पड़ा। इतना ही नहीं कुछ दिनों बाद गायत्री प्रजापति को अखिलेश ने फिर से मंत्री बना दिया। उन्हीं अखिलेश को आज योगी राज में कानून-व्यवस्था 'लचर' दिखती है।
कुर्सी संभालने के बाद योगी सरकार के पहले 10 महीने में कुल 110 मुठभेड़ हुईं। इनमें 34 अपराधी मारे गए, 265 बदमाश घायल हुए और 2,744 कुख्यात अपराधी पकड़े गए। 4 पुलिस वाले इन मुठभेड़ों में शहीद हुए और 247 घायल हुए। ये आंकड़े राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हैं। अपने डेढ़ साल के कार्यकाल में योगी सरकार ने जहां 15 मामले सीबीआई को सौंपे, वहीं अखिलेश के कार्यकाल में पूरे पांच साल में 10 मामले सीबीआई के सुपुर्द किए गए थे। ये आंकड़े अपने आपमें इस बात का प्रमाण हैं कि कानून-व्यवस्था को कौन गंभीरता से ले रहा है।
पाञ्चजन्य से बात करते हुए उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह कहते हैं-'ये घटना बहुत दुखदायी है, और सीधे-सीधे खराब ट्रेनिंग से जुड़ी है। लेकिन बजाय इसकी जड़ में जाने के, विपक्षी पार्टियां इस पर राजनीति कर रही हैं और सड़क पर हुई एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना का राजनैतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रही हैं। जिस सिपाही ने हत्या की है, ये पता लगाना चाहिए कि उसकी भर्ती किस वर्ष में हुई थी और इसका पिछला रिकॉर्ड क्या है। पता लगाना चाहिए कि ये आरोपित सिपाही किस रिक्रूटमेंट बोर्ड के जरिये पुलिस विभाग में आया था। यह भी देखा जाना चाहिए कि कैसे ऐसी प्रवृत्ति के लोग विभाग में आ जाते हैं। विपक्षी नेताओं को इस घटना से पुलिस की छवि खराब करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बल्कि कॉन्स्टेबल और दारोगा स्तर पर सही ट्रेनिंग देने की कोशिश करनी चाहिए। साथ ही सत्तारूढ़ पार्टी को हर घटना के लिए जिम्मेदार मानना ठीक नहीं है।'
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह कहते हैं-'पिछली सरकार में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिपाहियों और उप निरीक्षकों की भर्ती एक खास जाति से ही की गई थी, जिसकी वजह से कई आपराधिक प्रवृत्ति के लोग वर्दी पा गए। उन्हीं की वजह से पुलिस विभाग में यह अराजकता फैली है। अखिलेश यादव सरकार के तहत पुलिस विभाग को जितना कमजोर किया गया, उतना शायद पिछले सौ साल में नहीं हुआ था। दुनिया के 34 विफल देशों में 15 देश इसलिए विफल रहे, क्योंकि उनकी पुलिस नाकारा हो गई थी। इतिहास में दर्ज होगा कि उत्तर प्रदेश पुलिस की भर्तियों में जो धांधली पिछली सरकार में हुई है, उसका खामियाजा जनता भुगतेगी। इसलिए जरूरत है पुलिस सुधार की, जिसकी जरूरत पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी काफी कुछ कहा है।' जाहिर है, लखनऊ का यह दुर्भाग्यपूर्ण कांड पुलिस के प्रशिक्षण पर तो सवाल उठाता ही है, लेकिन इस बात की ओर भी इशारा करता है कि चुनाव करीब देखकर आने वाले वक्त में राजनैतिक दल बहुत से ऐसे मुद्दे उठा सकते हैं, जो सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की ताकत रखते हैं। लोगों को ऐसी पार्टियों के मंसूबे समझने होंगे, सिर्फ तभी सही तस्वीर सामने आ पाएगी।