क्यों गर्म है पाकिस्तान और ईरान की सरहद पर माहौल
   दिनांक 01-नवंबर-2018
मुसलमान 1400 साल पुराने शिया और सुन्नी के संघर्ष में आज तक उलझे हुए हैं। मजहवी राजनीति से प्रेरित सत्ताओं का का संघर्ष इतना उलझा हुआ है कि कोई उससे एक तरफा बाहर नहीं आ सकता
ईरान में मिलिट्र परेड पर हमले से बचने की कोशिश करते ईरानी सैनिक और मौलवी  
ईरान-पाकिस्तान सरहद फिर गर्म है। पाकिस्तान में पनाह पाए सुन्नी आतंकी संगठन जैश-अल-अदल के जिहादियों ने ईरान के 14 सैनिकों (रिवोल्यूशनरी गार्ड्स) का अपहरण कर लिया है। रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ईरान का सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा संस्थान है, जिसके अंतर्गत वह खुफिया तंत्र भी आता है, जो सारी दुनिया में इस शिया सत्ता के हितों और इच्छाओं को ध्यान में रखते हुए खुफिया कार्रवाई करता है। इसके दायरे में सीरिया में चल रहा युद्ध भी है और ईराक में सक्रिय शिया मिलिशिया भी। ईरान ने पाकिस्तान पर दबाव बनाया है कि वह उसके सैनिकों को मुक्त करवाए, अन्यथा ईरान स्वयं पाकिस्तान के अंदर घुसकर इन आतंकियों पर कार्रवाई करेगा। पूर्व में ईरान के सैनिक पाकिस्तान की सीमा लांघ चुके हैं। जैश-अल-अदल ईरान में पहले कई हमले और अपहरण कर चुका है। मामला सदियों पुराने शिया-सुन्नी संघर्ष से जुड़ा है। इस शिया देश में सुन्नी प्रताडि़त हो रहे हैं, सुन्नियों-वहाबियों के राज में शियाओं का सांस लेना दूभर है। इस खींचतान में मानवता पिस रही है।
शिया जगत में सुन्नी
ईरान में 9 प्रतिशत आबादी सुन्नी है। यहां बहाई, यहूदी, पारसी और ईसाइयों की भी छोटी आबादी है, जिनकी तुलना में सुन्नियों की कानूनी स्थिति बेहतर है। पर उनकी शिकायत है कि राजधानी तेहरान में, जहां उनकी आबादी 10 लाख के लगभग है, एक भी सुन्नी मस्जिद नहीं है। पूरे ईरान में नयी सुन्नी मस्जिद बनाने और सुन्नी विद्यालय प्रारम्भ करने पर रोक है। शिया से सुन्नी मत में कन्वर्ट होने पर गिरफ्तारी और कारावास हो सकता है। सुन्नी उपासना स्थलों पर छापे, उन्हें ध्वस्त किया जाना, ईद उल अदहा मनाने पर रोक जैसे मामले सामने आते रहते हैं। सरकारी नौकरियों और शिक्षा से उन्हें दूर रखे जाने के भी आरोप हैं। इंटरनेट पर सलाफी/ वहाबी इस्लाम के प्रचार को ईरानी सरकार खतरा मानकर चल रही है। उसे भय है कि इस्लामी रिपब्लिक ऑफ ईरान से नाखुश युवा वहाबी विचार से प्रभावित हो सकते हैं। ईरान की अरब, कुर्दिश और बलूच आबादी में भी विरोध के तीखे स्वर सुनाई दे रहे हैं। ये ईरान के प्रभावी सुन्नी समूह हैं और सुन्नी मत के प्रसार को लेकर इनकी शासन-प्रशासन से तकरार होती रहती है। ईरान सार्वजनिक रूप से फांसी देने के लिए बदनाम रहा है, जिसकी अनेक वजहों में से एक 'अल्लाह और मुल्क के खिलाफ साजिश' भी हो सकती है। सुन्नियों की शिकायत है कि 'इकबाल ए जुर्म' करवाने के लिए यातना का सहारा लिया जाता है। कई सुन्नियों को मत का प्रचार करते पाए जाने पर 'धरती को भ्रष्ट करने' का आरोप लगाया गया है, जिसकी सजा मौत है।
सुन्नी दुनिया में शिया
पाकिस्तान, बांग्लादेश, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर जैसे सुन्नी देशों की कतार बहुत लंबी है, जहां शियाओं की हालत बेहद खराब है। सऊदी अरब में शिया दोयम दर्जे के नागरिक हैं। पूर्वी प्रांत अल कतीफ के आवामियां शहर में सुरक्षा बलों और यहां के शियाओं के बीच खूनी झड़पें विश्व मीडिया में सुर्खियां बना चुकी हैं। झगड़ा सड़क को चौड़ा करने के लिए ऐतिहासिक शिया स्थल को ध्वस्त करने से शुरू हुआ था। सड़क पर चलते लोगों को सुरक्षा बलों ने अपनी गोलियों का निशाना बनाया, घर और दुकान जलाए गए। सऊदी प्रशासन का मानना है कि उसकी शिया आबादी ईरान समर्थक है, जो सउदी हितों के खिलाफ है। सऊदी अरब में शियाओं के साथ भेदभाव का पुराना इतिहास है। यहां शिया मत का प्रचार खतरनाक काम है। शिया मस्जिद बनाने के लिए इजाजत मिलना बहुत कठिन होता है। सेना और प्रशासन के उच्च पदों पर शियाओं का पहुंचना लगभग असंभव है। शिया छात्रों को सुरक्षा अकादमियों में प्राय: प्रवेश ही नहीं मिलता। पुलिस, न्याय विभाग की नौकरियां भी उनकी पहुंच से दूर हैं। स्कूली पाठ्यक्रम में जितनी निंदा यहूदियों की होती है, उतनी ही कड़वाहट शिया विश्वासों और परंपराओं के लिए भी होती है। शिया इबादत को 'शिर्क' और 'जहन्नुम में ले जाने वाली' बताया जाता है। शिया त्योहारों को सार्वजानिक रूप से मनाने पर रोक है। सऊदी सरकार कई बार शियाओं के हज पर भी रोक लगा चुकी है। अगस्त 2017 में, 14 शियाओं को विरोध प्रदर्शन करने और 'पुलिस पर हमला' करने के अपराध में मौत की सजा सुनाई गई। शीर्ष न्यायालय में इन अभियुक्तों ने बयान दिया कि उन्हें यातना देकर बयान दर्ज करवाए गए हैं, लेकिन अदालत ने बिना जांच यातना देने के आरोपों को खारिज कर दिया।
शियाओं को आतंकित करने वाला एक और पहलू यह है कि जब शासन-प्रशासन-अदालतें इस तरह कार्रवाई करती हैं, तब सलाफी-वहाबी-सुन्नी नेता और मौलवी, शियाओं के खिलाफ और इन सरकारी हरकतों के समर्थन में आग उगलते भाषण देते हैं। उनके भाषणों में शियाओं के सामाजिक बहिष्कार की अपीलें होती हैं। शियाओं से विवाह संबंध भी बड़ा अपराध माना जाता है। सऊदी अरब की शियाओं के खिलाफ यह लड़ाई उसकी अपनी जमीन तक सीमित नहीं है। सऊदी अरब यमन में ईरान के बढ़ते प्रभाव से चिंतित है। इसलिए यमन में उसके नेतृत्व में सुन्नी ताकतों ने शियाओं के सशस्त्र समूह अल अंसार को निशाना बनाने के लिए आबादी वाले इलाकों पर लड़ाकू विमानों से बम बरसाए, जिसकी तगड़ी मार वहां की शिया जनसंख्या पर पड़ी। उधर, 'इस्लाम के किले' पाकिस्तान में आइएसआइ के पाले हुए जिहादी संगठन शियाओं का नरसंहार करने में लगे हैं। इस कार्रवाई में बर्बरता की ऐसी मिसालें सामने आईं जब शियाओं पर आतंकी हमला करके कइयों को मौत के घाट उतार दिया गया और जब उनका जनाजा निकला तो भीड़ में घुस कर बम विस्फोट करके, उससे से भी बड़ी संख्या में शियाओं को कत्ल कर दिया गया। लाहौर, कराची जैसे बड़े शहरों से लेकर बलूचिस्तान के दूरदराज के इलाकों तक ऐसी घटनाएं घट रही हैं। सिपह-ए-सहाबा, पाकिस्तान तालिबान, अफगान तालिबान जैसे संगठन शियाओं पर जाने कबसे कहर बरपा रहे हैं।
 
 पाकिस्तान—ईरान बॉर्डर पर मुस्तैद पाकिस्तान के जवान
अपने-अपने जिहादी
पश्चिम एशिया की शिया-सुन्नी धुरी में आतंकी संगठनों की विशिष्ट भूमिका है। ईरान, लेबनान हिज्बुल्ला, यमन अल अंसार और ईराक शिया सशस्त्र समूहों का समर्थन-पोषण करते हंै। ईराक में इन संगठनों द्वारा सुन्नियों के पूरे गांव को मिटा डालने और काटे गए सिरों से फुटबॉल खेलने के आरोप लगे थे। दूसरी तरफ, दुनियाभर में फैले दर्जनों इस्लामी आतंकी संगठन जैसे तालिबान, अलकायदा, लश्करे तैयबा, अल बद्र, बोको हराम, इस्लामिक स्टेट को सुन्नी/ वहाबी/ सलाफी आकाओं द्वारा पाला जा रहा है। पैसा-हथियार-सूचना-प्रशिक्षण-प्रचार तंत्र सब कुछ झोंका जा रहा है। सऊदी अरब और कतर जिहादियों का बैंक बने हुए हैं, तो पाकिस्तान उनका कारखाना। ईरान का लक्ष्य इस्रायल, सऊदी अरब और उसके वहाबी मित्र हैं और सऊदी अरब का निशाना ईरान के नेतृत्व वाली शिया धुरी है। पाकिस्तान की निगाहें भारत और अफगानिस्तान पर गड़ी हैं। लेकिन पाकिस्तान से संचालित हो रहे जिहाद के तार बंाग्लादेश, फिलीपींस, चेचेन्या (रूस), चीन के सिंक्यांग और न्यूयार्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर हमले तक जुड़ते हैं। इन्हीं तारों को उधेड़ने के बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बुश ने पाकिस्तान को धमकाकर अफगानिस्तान में तालिबान से लड़ने में मदद के लिए राजी किया था, लेकिन बाद में मुल्ला उमर कराची में पाया गया और लादेन एबटाबाद में।
शिया-सुन्नी उग्रवादियों की कार्यप्रणाली में कुछ मूलभूत अंतर है, जिनकी चर्चा आवश्यक है। सुन्नी आतंकी संगठन जनसंख्या के बड़े हिस्सों को निशाना बनाते हैं, जिसका उद्देश्य 'काफिरों' को आतंकित करना और 'इस्लाम की ताकत' दिखाना होता है। उनके लिए कुफ्र और काफिर की परिभाषा बड़ी तरल है और ये ज्वलनशील तरल किसी पर भी गिर सकता है।
दूसरी ओर, शिया आतंकी समूह, सरकारों-सत्ताओं को लक्ष्य करके सीमित कार्रवाई करते हैं। उनका काम संगठित है, उद्देश्य निश्चित हैं और प्राय: राजनैतिक हैं। सुन्नी समूह अपनी समर्थक सरकारों के पूर्ण नियंत्रण में काम नहीं करते जबकि शिया समूह ईरान की खुफिया एजेंसी, ईरानी दूतावासों और ईरान सरकार नियंत्रित व्यापारिक उपक्रमों के साथ मिलकर काम करते हैं। इस स्वभावगत अंतर के कारण सुन्नी समूह (अपने मजहब वाली) स्थानीय आबादी के समर्थन पर काफी निर्भर करते हैं। शिया समूह मोल-भाव करने के लिए अपहरण करते देखे गए हैं, जबकि सुन्नी समूह हत्या करने के लिए अपहरण करते हैं। इस्लामिक स्टेट, अलकायदा और तालिबान आतंकियों द्वारा जारी किए सर कलम करने के सैकड़ों वीडियो इसकी गवाही दे रहे हैं।
अपना-अपना जिहाद
मजहबी राजनीति से प्रेरित इन सत्ताओं का संघर्ष इतना उलझा हुआ है कि कोई भी इससे एकतरफा बाहर नहीं आ सकता। इस लड़ाई में 1,400 साल पुरानी रंजिशें हैं, तेल की ताकत है और अलग-अलग मैदानों में लड़े जा रहे छाया युद्ध हैं, जबकि विरोधाभास सब तरफ हैं। समस्त इस्लामी देशों की तरह, एक दूसरे के चिर प्रतिद्वंदी ईरान और सऊदी अरब, दोनों की घरेलू सियासत में यहूदियों के प्रति घृणा का महत्वपूर्ण स्थान है।
इन विरोधाभासों के बीच, बात जमाल खगोशी की। दूसरे देश की जमीन पर की गई सऊदी अरब के इस पत्रकार की हत्या में सऊदी खुफिया एजेंसी का हाथ सामने आ रहा है। सऊदी अरब इस समय संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष है। तुर्की के राष्ट्रपति एरदोगेन इस हत्या से बहुत 'दुखी और उग्र' हैं जिन्होंने खुद तुर्की के सैकड़ों पत्रकारों और एक लाख के लगभग नागरिकों को जेलों में ठूंसा हुआ है।