संघ से क्यों डरती है यह जमात
   दिनांक 19-नवंबर-2018
संघ विरोधियों का एक पूरा तंत्र है जिसमें नेताओं, अभिनेताओं, फिल्मकारों, साहित्यकारों, तथाकथित बुद्धिजीवियों, मजहबी संगठनों, प्रकाशनों आदि की एक  जमात है, जो एक दूसरे से तालमेल बिठाकर काम करते हैं|  संघ और हिन्दू संगठन सदा इनके निशाने पर रहते हैं|
 
तथ्यहीन प्रलाप : कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 
एक है कांग्रेस पार्टी, जो 12 महीने, चौबीसों घंटे सिर्फ और सिर्फ राजनीति करती है। इस पार्टी के एक राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं जो ‘पार्ट टाइम’ राजनीति करते हैं, शेष समय क्या करते हैं, वह अज्ञात है। उनकी रहस्यमयी विदेश यात्राओं की तरह। सार्वजनिक मंचों पर कांग्रेस और राहुल, एक-दूसरे से असहज दिखते हैं, अचकचाए से लेकिन, एक काम है जिसमें पार्टी और अध्यक्ष में जबरदस्त तालमेल दिखता है- संघ निंदा। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लगातार कोसते रहते हैं, अनवरत। और जैसे-जैसे कोई चुनाव करीब आता है, उनका यह आलाप ऊंचे से ऊंचा होता जाता है। इसके पीछे गट्ठा वोटों का उनका एक गणित है, जिसे अब हर कोई समझता है।
इसके अलावा एक देशव्यापी तंत्र है। एक मंडली, स्वयं को अभिजात्य समझने वाला एक संगठित तबका, जिसे 60-70 सालों से सत्ता ने पाला है, जिसमें सम्मान वापसी फौज है, स्वघोषित और वित्तपोषित बुद्धिजीवी हैं, पत्रकार के रूप में दशकों से काम कर रहे राजनैतिक-कर्मी हैं, शाही परिवार के इतिहास से गुंथे इतिहासकार हैं, और अपनी चोर जेब में पोलित ब्यूरो का कार्ड छिपाए अकादमिक लोग, साहित्यकार वगैरह हैं। उसमें शहरी नक्सलियों की टोली है, और उनके प्यादे। ये सब मिलकर वह तंत्र बनाते हैं, जो सदा हिंदू विचार और हिन्दू संगठनों से खार खाए बैठा रहता है। यह तंत्र कांग्रेस नेताओं और वामपंथी खेमे द्वारा उछाली गई गालियों को लपक लेता है, और फिर उसे सिलसिलेवार घुमाया जाता है।
हाल ही में कांग्रेस ने मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव के लिए अपना घोषणापत्र जारी किया। इसमें क्रमांक 47.62 में लिखा गया है कि ‘यदि कांग्रेस सत्ता में आई तो शासकीय भूमि पर संघ की शाखा नहीं लगने देगी और सरकारी कर्मचारियों को संघ में जाने से रोका जाएगा।’ संघ से दुश्मनी कांग्रेस का घोषित शगल है। नेहरू के जमाने से कांग्रेस इस फेर में फंसी हुई है, बावजूद इसके कि जनता की अदालत से लेकर न्यायालयों तक, उसने बार-बार मुंह की खाई है। उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद अदालतों के चक्कर (नेशनल हेराल्ड के अलावा) लगा रहे हैं। संघ के विरुद्ध राहुल गांधी द्वारा किए गए दुष्प्रचार का मामला न्यायालय में है, जिनसे अब उन्हें खुद ही निपटना है, पर जब बात संघ को गरियाने की हो, तो कांग्रेस को तत्काल साथी मिल जाते हैं। इसलिए अब यह मुद्दा गर्माया हुआ है।
हिंदुत्व विरोधी यह तंत्र मीडिया-साहित्य के क्षेत्र से लेकर, बस्तर और दंतेवाड़ा के जंगलों तक, और फिल्मी दुनिया से लेकर शिक्षा संस्थानों तक कैसे काम करता है, इसकी कई मिसालें सामने आई हैं।
साल 2010 में 26/11 के मुंबई आतंकी हमले में पाकिस्तान को क्लीन चिट देते हुए एक किताब मुंबई से प्रकाशित हुई। इसका शीर्षक था-‘‘26/11: आरएसएस की साजिश’’। किताब का सार था कि मुंबई पर हुआ दुर्दांत आतंकी हमला पाकिस्तान से आए आतंकियों ने नहीं, बल्कि भारत के ही गुप्तचर तंत्र, सैन्य अधिकारियों ने रा. स्व. संघ के साथ मिलकर किया था। किताब के लेखक थे वरिष्ठ पत्रकार सहारा उर्दू के प्रमुख संपादक अजीज बर्नी। इस किताब की 25 हजार प्रतियां हिंदी में और इतनी ही अंग्रेजी में छापी गई थीं। किताब का विमोचन करने गए थे कांग्रेस नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, फिल्म निर्देशक महेश भट्ट, मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह, सपा नेता अबू आजमी, मौलाना महमूद मदनी और कुछ अन्य साहित्यकार-फिल्मकार। ये लोग संघ विरोध के चलते देश की सुरक्षा एजेंसियों को ही आतंकी ठहराने तक से बाज नहीं आए। संघ के एक कार्यकर्ता विनय जोशी ने इस किताब पर कानूनी कार्रवाई शुरू की और लेखक तथा अन्य पर देशद्रोह का मामला बनने लगा तो किताब वापस ले ली गई। बर्नी ने क्षमा मांग ली। बाद में तत्कालीन संप्रग सरकार ने बर्नी को इस काम के लिए अपने ढंग से पुरस्कृत किया। उन्हें तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल का अल्पसंख्यक शिक्षा मामले का सलाहकार नियुक्त किया गया। बर्नी ने मनमोहन सरकार में विज्ञान और तकनीक मंत्रालय तथा समुद्री विकास के मामलों के सलाहकार के रूप में भी काम किया।
इस तंत्र का दूसरा महत्वपूर्ण सूत्र है मजहबी कट्टरता की राजनीति और उसके मोहरे। इसका लंबा इतिहास है, शाहबानो से लेकर ओवैसी तक। ताजा उदाहरण है कांग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ का। कमलनाथ मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की कमान संभाले हुए हैं। 14 नवंबर को उनका एक वीडियो सामने आया जिसमें वे बंद कमरे में मुस्लिम नेताओं से कह रहे हैं कि चुनाव तक वे चुप बैठें, फिर कांग्रेस पार्टी संघ और हिन्दू संगठनों को निपटा देगी। इसके कुछ दिन पहले अक्तूबर 2018 में गृहमंत्रालय के पूर्व अधिकारी आरवीएस मणि ने कमलनाथ पर चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने बताया कि कैसे कमलनाथ उन पर और अन्य अधिकारियों पर दबाव डाल रहे थे कि लश्कर की आतंकी इशरत जहां को मासूम लड़की साबित कर दें ताकि इशरत के एनकाउंटर मामले में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फंसाया जा सके। जब मणि नहीं माने तो कमलनाथ उनसे बोले कि, ‘‘लोग राहुल गांधी का....पीने के लिए तैयार हैं, तुम इतना छोटा सा फेवर(इनायत) नहीं कर सकते?’’ आरवीएस मणि ने कमलनाथ को जवाब दिया कि ‘‘सर! आप लोगों का.... का टेस्ट (स्वाद) होगा। मैं नहीं पीता। मैं सच के साथ खड़ा हूं।’’
मणि गृह मंत्रालय के तत्कालीन अवर सचिव थे। उनके अनुसार, इसके ठोस प्रमाण थे कि ‘इशरत जहां और उसके साथी आतंकी थे। ‘गजवा टाइम्स’ जिहादी संगठन जैश ए मुहम्मद का मुखपत्र है। उसने (इशरत के एनकाउंटर के) एक हफ्ते के अंदर छापा, ‘‘वह जैश की ‘शहीद’ थी। वह अपने आतंकी साथियों के साथ किन-किन शहरों में गई थी, किन होटलों में ठहरी थी, किन घरों में रुकी थी, कहां से हथियार लिए थे, यह सारी जानकारी हमारे पास थी। उसके साथी आतंकी जावेद मुहम्मद गुलाम शेख के पास दो पासपोर्ट थे। एक हिन्दू नाम से दूसरा मुस्लिम नाम से। आतंकी डेविड हेडली उर्फ दाऊद सईद गिलानी से पूछताछ के आधार पर अमेरिका ने भी पुख्ता प्रमाण दिए।’’ जब मणि ने इस झूठ में साथ देने से इनकार कर दिया तो उन्हें एसआईटी के अफसरों द्वारा यातनाएं दी गर्इं, जलती सिगरेटों से दागा गया। वे तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम की ओर भी इशारा करते हैं कि उनकी मर्जी के बिना यह सब संभव नहीं था। मणि के अनुसार मोदी और अमित शाह इशरत जहां के निशाने पर थे। संप्रग सरकार के दौरान कांग्रेस नेताओं (मंत्रियों) द्वारा बार-बार ‘हिन्दू आतंकवाद’ शब्द का भी प्रयोग किया गया।
हिन्दू विरोधी छद्म सेकुलर तंत्र का चौथा स्तंभ है शिक्षा जगत में बैठे हुए वामपंथी, जिनका नेटवर्क छात्र संगठनों, मीडिया और अकादमियों तक फैला हुआ है। इसी गिरोह की बानगी जेएनयू में लगे नारों ‘भारत की बर्बादी तक, जंग रहेगी- जंग रहेगी’ और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह-इंशाअल्लाह’ के रूप में सामने आई थी। इन्हीं नारेबाजों के समर्थन में राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल जैसे लोग उठ खड़े हुए थे। इन नारेबाजों पर जब पुलिस कार्रवाई शुरू हुई तो एक टीवी चैनल ने प्राइम टाइम पर अपना पर्दा काला कर प्रसारण किया था।
एक और परस्पर सहजीविता ध्यान खींचती है। कुछ ही समय पहले सुरक्षा एजेंसियों के घेरे में आए शहरी नक्सलियों के लिए कांग्रेस ने खूब आंसू बहाए थे। फिर अक्तूूबर 2018 में कांग्रेस नेता राजबब्बर ने नक्सलवादियों को ‘क्रांतिकारी’ घोषित कर डाला। राजबब्बर के शब्द थे, ‘‘आप बंदूकों से उन्हें डरा नहीं सकते, ये जो क्रांतिकारी (नक्सलवादी) निकले हुए हैं। यह मेरी राय है, और यह राय मैं अपनी पार्टी को दे भी चुका हूं, और पहले भी यही राय दी गई है।’’ छत्त्तीसगढ़ में भी चुनाव हो रहे हैं। सब जानते हैं कि यहां बस्तर, दंतेवाड़ा जैसे इलाकों में नक्सली बंदूक के जोर पर मतदान को प्रभावित करते रहे हैं।
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी संघ पर अनर्गल आरोप लगाकर कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहे हैं, मामला फिलहाल अदालत में है। न्यायालय ने इस आधार पर मुकदमा चलाने का निर्णय लिया कि जब गांधी हत्या के मामले में न्यायालय ने संघ को निर्दोष करार दिया, सारी जांच स्वयं सरदार पटेल की देखरेख-निगरानी में चली, कांग्रेस सरकार द्वारा बनाए गए जांच आयोगों ने संघ पर लगे आरोपों को बेबुनियाद बताया, तो फिर राहुल गांधी संघ पर यह आरोप कैसे लगा सकते हैं? लेकिन टीवी चर्चाओं में आने वाला एक पूरा समूह अभी भी ऐसे आरोपों को उछालता रहता है।
राहुल गांधी ने ‘हिन्दू आतंकवाद’ (विकिलीक्स) को लश्करे तोयबा से ज्यादा खतरनाक बताया, तो जिहादी आतंकी संगठन सिमी पर सपा नेता मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव आपत्तिजनक बयान देते रहे। उधर उर्दू प्रेस में इस आशय के लेख छपने लगे कि वास्तव में सिमी बजरंग दल द्वारा बनाया गया संगठन है जिसका उद्देश्य है मुसलमानों को बदनाम करना। 2016 में सिमी के 8 आतंकी एक पुलिस कांस्टेबल की हत्या कर भोपाल की सेंट्रल जेल से भागे। जब इन भगोड़े आतंकियों का पुलिस ने एनकाउंटर किया तो मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने पुलिस को ही निशाने पर लिया और बयान दिया कि ‘केवल मुस्लिम कैदी ही जेल से क्यों भागते हैं, हिन्दू क्यों नहीं?’ इस तरह एक जुगलबंदी दिखाई देती है, जिसमें पूरी एक जमात सत्ता के प्राचीन गलियारों की थाप पर थिरकती पाई जाती है।
अदालत की चौखट पर हर बार हार
सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने बार-बार संघ पर प्रतिबंध लगाया, पर हर बार प्रतिबंध हटाना पड़ा। फिर सत्ता के मद में संघ में काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों पर निशाना साधा गया, लेकिन न्यायालय से हर बार उन्हें बैरंग लौटना पड़ा। 1952 में इंदौर में ‘कृष्ण लाल बनाम मध्य भारत राज्य’ और 1962 में ‘चिंतामणि नुरगांवकर बनाम पोस्ट मास्टर जनरल कें.म., नागपुर’ मामलों में न्यायालय ने फैसला दिया कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को संघ का सदस्य होने के कारण नौकरी से नहीं हटाया जा सकता।
इसी तरह, 1966 में बेंगलूरु स्थित मैसूर उच्च न्यायालय ने ‘रंगनाथाचार अग्निहोत्री बनाम मैसूर राज्य’ मामले में फैसला दिया कि ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य होना न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति से वंचित रखने के लिए वैध कारण नहीं है।’ इलाहबाद उच्च न्यायालय ने 1963 के ‘जयकिशन महरोत्रा बनाम महालेखाकार, उत्तर प्रदेश’ मामले में फैसला सुनाया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य होने के कारण किसी सरकारी कर्मचारी को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त नहीं किया जा सकता।
बीते दशकों में ऐसे दर्जनों मामले न्यायालयों में पहुंचे हैं जब शासन-प्रशासन ने किसी कर्मचारी को संघ के कार्यक्रम में भाग लेने, संघ के शिविर में जाने अथवा संघ का सदस्य होने के आधार पर बर्खास्त अथवा सेवानिवृत्त किया। सभी मामलों में अदालत ने शासन के आदेशों को पलटते हुए संघ कार्यकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाया। ऐसे अन्य मामलों में जोधपुर स्थित राजस्थान उच्च न्यायालय (1964), ‘केदारलाल अग्रवाल बनाम राजस्थान राज्य’, दिल्ली स्थित पंजाब उच्च न्यायालय (1965), जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (1973): ‘भारत प्रसाद त्रिपाठी बनाम मध्यप्रदेश सरकार’, ‘मनोहर अम्बेकर बनाम भारत संघ तथा अन्य’, चंडीगढ़ स्थित पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय (1967): ‘रामफल बनाम पंजाब राज्य तथा अन्य’, ‘मध्य प्रदेश राज्य बनाम राम शंकर रघुवंशी’, अर्नाकुलम स्थित केरल उच्च न्यायालय (1982):‘श्रीमती थाट्टुम्कर बनाम महाप्रबंधक, टेलिकम्युनिकेशंस, केरल मंडल’ आदि शामिल हैं।
संघ के संबंध में इस समय एक विशेष मंडली द्वारा जोर-शोर से बयान दिए जा रहे हैं कि संघ राजनैतिक संगठन है, इसलिए कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र में कही गई बात सही है। इस संदर्भ में गुजरात उच्च न्यायालय, अमदाबाद का 1970 का फैसला कानूनी रोशनी डालता है जहां तत्कालीन गुजरात सरकार ने एक संघ कार्यकर्ता डी. बी. गोहल को संघ का सदस्य होने के नाते ‘राजनैतिक लिप्तता’ बताकर बर्खास्त कर दिया था। उच्च न्यायालय ने डी. बी. गोहल के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्बन्ध में यह सिद्ध नहीं है कि वह एक राजनैतिक आन्दोलन है, अत: (इस आधार पर) सरकारी कर्मचारी को सेवा से हटाया नहीं जा सकता।’
1971 के अपने फैसले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने (शिक्षा निदेशक, उत्तर प्रदेश तथा अन्य बनाम रेवत प्रकाश पांडे) संघ में भाग लेने को संगम का अधिकार कहा है। अदालत ने कहा, ‘सरकारी सेवा के दौरान किसी नागरिक का ‘संगम का अधिकार’ निलंबित नहीं हो जाता।’
कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में ‘सरकारी भूमि का उपयोग संघ की शाखा के लिए नहीं होने देंगे’ इस आशय की जो घोषणा की है, इस संदर्भ में अर्नाकुलम स्थित केरल उच्च न्यायालय (1981) का ‘टी. बी. आनंदन तथा अन्य बनाम केरल राज्य’ मामले में निर्णय पढ़ने योग्य है। अदालत ने संघ कार्यकर्ताओं के पक्ष में निर्णय देते हुए कहा था कि ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को किसी सरकारी विद्यालय के भवन का उपयोग अपने कार्यक्रमों के लिए करने की विशेष सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता।’
इतना ही नहीं, 1993 में तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गैर कानूनी घोषित करने के मामले में न्यायालय ने फैसला दिया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक को गैर कानूनी घोषित करने के लिए प्रमाण नहीं हैं।
ऐसे में संघ संबंधी कांग्रेस के घोषणापत्र के दावे कागज का किला ही हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। कांग्रेस के घोषणापत्र को लेकर जब चारों ओर प्रतिक्रिया शुरू हुई तो कांग्रेस के नेता उसकी वकालत करते हुए मैदान में कूद पड़े। जाहिर है कि वे अतीत से सबक सीखना नहीं चाहते और न ही जनभावनाओं का आदर करना जानते हैं। कभी विदेशियों के सामने तथाकथित ‘हिन्दू आतंकवाद’ का हौव्वा खड़ा कर चुके उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष अब खुद को आस्थावान हिन्दू साबित करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ हिंदू संगठनों के प्रति अपनी नफरत को छिपा भी नहीं पा रहे हैं। उधर छद्म सेकुलर तंत्र भी अपना पुलिंदा लिए हुए हमलावर है। यह फसाद अभी जारी रहने वाला है। जो सत्ता से उखाड़ फेंके गए हैं, वे वापसी के लिए बेचैन हैं।
उनके उखड़ने से उनके आश्रय में फली-फूली जमातें भी लड़खड़ा रही हैं। सो लड़ाई अब अस्तित्व की है। इसलिए यह कोलाहल थमने के स्थान पर और तेज होने वाला है। उनकी छटपटाहट बढ़ने वाली है। संघ से डरने वाले समाज को बांटने के षड्यंत्र रच रहे हैं।