साजिश के तहत सोशल मीडिया पर दबाई जा रही है 'भारत' की आवाज!
   दिनांक 02-नवंबर-2018
सोशल मीडिया क्या वास्तव में एक निष्पक्ष प्लेटफार्म है जहां आकर आम आदमी अपने मन की बात लिख सकता है। जी नहीं सोशल मीडिया कतई निष्पक्ष नहीं है। वामपंथी विचारों वाले लोग सोशल प्लेटफार्म की बड़ी कंपनियों में शीर्ष पदों पर बैठे हैं। यहां तक कि सैन फ्रांसिस्को जहां से विश्व की अधिकतर टेक्नोलॉजी कम्पनियां काम करती हैं, उस स्थान पर वामंपथी विचारधारा का प्रभुत्व है। फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग इस बात को अमेरिकी संसद में स्वीकार कर चुके हैं
- राहुल कौशिक

 
पिछले दिनों ट्विटर की इंडिया पॉलिसी हेड महिमा कौल के कुछ पुराने ट्वीट्स निकल कर बाहर आ गए। लोगों ने ट्विटर पर 2010 और 2011 में किए गए कई ट्वीट्स को रिट्वीट कर पुनः सार्वजनिक कर दिया जिन में वे एक तरफ राहुल गांधी की प्रशंसा के पुल बांध रही हैं, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीखी आलोचना कर रही हैं। यद्यपि यह तर्क दिया जा सकता है कि ये उनके निजी विचार हैं और इनका संस्थान से सम्बन्ध नहीं हैं,पर परन्तु ऐसा क्यों होता है कि इसी प्रकार के विचार रखने वाले लोग इन संस्थाओं में शीर्ष पदों पर पहुंचते हैं! इससे पहले भी ट्विटर के इंडिया हेड रहे राहिल खुर्शीद के प्रधानमंत्री मोदी के आलोचनात्मक ट्वीट कई बार सार्वजनिक हुए हैं। इन सबको देखने के बाद यह लगता है कि क्या यह सब प्लेटफार्म सच में निष्पक्ष हैं? क्या भारत को एक सच्चे अर्थों में निष्पक्ष प्लेटफार्म की आवश्यकता है? सोशल मीडिया का सबसे बड़ा लाभ है इसमें विचारों की स्वतंत्रता। यदि यहां भी विचारों को दबाया जाएगा तो इसकी सार्थकता पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर सबको विचार करने की आवश्यकता है।
पिछले कुछ वर्षों में पूरा विश्व एक सूचना क्रांति के युग से गुज़र रहा है। इंटरनेट ने आम लोगों के लिए न सिर्फ अनंत सूचनाओं के द्वार खोले हैं, अपितु लोगों को अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम भी दिया है। आज से 10—12 वर्ष पहले शायद यह कल्पना करना भी असम्भव था कि कोई व्यक्ति किसी सुदूर अंचल में बैठकर भी अपने विचारों से हर किसी को अवगत करवा सकता है। परन्तु आज यह न केवल सम्भव है अपितु इसके परिणाम भी पूरे विश्व में देखे जा सकते हैं। मिस्त्र में हुई क्रांति से जो शुरुआत हुई वह आज दुनिया के लगभग हर हिस्से में किसी न किसी रूप में मौजूद है। 2014 के चुनावों में भारत में नरेंद्र मोदी की जीत को भी सोशल मीडिया के उभार से जोड़कर देखा जाता रहा है। परन्तु इन सब के बीच एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है जो अत्यंत उल्लेखनीय है, और वह परिवर्तन है लगभग पूरे विश्व में राष्ट्रवादी विचारों का उभार।
 
ट्विटर की इंडिया हेड महिमा कौल का पीएम मोदी पर लिखा गया एक पुराना कमेंट
पिछले पूरी शताब्दी में पूरे दुनिया में साम्यवाद, उदारवाद या वामपंथी विचारधारा का प्रभुत्व रहा है। राजनीति से लेकर शिक्षा प्रणाली, अर्थजगत और बुद्धिजीवी समूहों में हर जगह वामपंथियों का प्रभुत्व स्थापित किया गया। इस प्रभुत्व के कारण ही भारत में भी अन्य कोई विचार मुख्यधारा के विमर्श का कभी हिस्सा नहीं बन पाया। परन्तु इंटरनेट ने सब बदल दिया। फेसबुक और ट्विटर जैसे माध्यमों के कारण लोगों ने अपने विचार रखने शुरू किए और वर्षों की मेहनत से प्रपंचों के सहारे बनाए गए स्वनामधन्य पत्रकार और बुद्धिजीवियों का आभामंडल टूटने लगा। इसका सबसे बड़ा कारण रहा इन माध्यमों पर किसी प्रकार के वैचारिक नियंत्रण या बंदिशों का अभाव। अभी तक टीवी पर या अख़बार पर आने वाली खबरों से कुढ़कर रह जाने वाला आम आदमी जब अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगा, तो वर्षों से जमे बैठे मठाधीशों के सिंहासन दरकने लगे। 2014 में भारत में हुई नरेंद्र मोदी की जीत और उसके बाद 2016 में अमेरिका में हुई डोनाल्ड ट्रम्प की विजय ने लिबरल आकांक्षाओं पर जैसे तुषारापात कर दिया| पूरी लिबरल जमात ने जहां हिलेरी क्लिंटन को राष्ट्रपति मान किया था, वहीं कई अखबारों, चैनलों और पत्रिकाओं ने विशेषांक की भी तैयारी कर ली थी। लिबरल जमात को जब उनके प्रभुत्व पर संकट दिखाई दिया तो उनको अपने सबसे बड़े शत्रु के रूप में सोशल मीडिया पर बैठा आम आदमी ही दिखाई दिया।
मोदी के बाद ट्रम्प का राष्ट्रपति बनना इस लिबरल इकोसिस्टम के लिए खतरे की घण्टी बन गया। इसलिए सोशल मीडिया पर अंकुश की तैयारी शुरू हो गई। इसके बाद योजनाबद्ध तरीके से राष्ट्रवादी विचारधारा के समर्थकों के एकाउंट ब्लॉक किए जाने लगे। इसके बाद जाकर लोगों को महसूस हुआ कि सोशल मीडिया भी स्वतंत्र नहीं है।
 
ट्विटर की इंडिया हेड महिमा कौल के कुछ पुराने ट्वीट उनकी सोच को बताते हैं  
इस बात को अंततराष्ट्रीय स्तर पर हुई कई घटनाओं और पुष्ट किया जाता है। उदाहरण के तौर पर पिछले दिनों पहले कैम्ब्रिज एनालिटिका नामक कम्पनी का पता चला कि कैसे वो फेसबुक के साथ मिलकर लोगों की सोच को प्रभावित करने का प्रयास कर रही थी। पूरे विश्व में इस खुलासे से हड़कंप मच गया। पता चला कि हिन्दुस्तान में भी यही कंपनी कांग्रेस की सहायता कर रही थी।
फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग की पेशी अमेरिकी संसद में हुई। मार्क ने यह स्वीकार किया कि न केवल उनकी कम्पनी अपितु पूरे सैन फ्रांसिस्को अर्थात जहां से विश्व की अधिकतर टेक्नोलॉजी कम्पनियां काम करती हैं, उस स्थान पर वामंपथी विचारधारा का प्रभुत्व है।
बाद में ट्विटर के सीईओ ने भी कई साक्षात्कारों में इस बात को स्वीकार किया। सोशल मीडिया पर विपरीत विचारधारा को दबाने के लिए फेक न्यूज़ का दुष्प्रचार शुरू हुआ। फेक न्यूज़ निश्चित एक समस्या है पर फेक न्यूज़ की आड़ में केवल विपरीत विचारधारा के लोगों को टारगेट करना और उनके सोशल मीडिया एकाउंट ब्लॉक करवाना, यही आज के दिन वामपंथियों का ध्येय है। जब तक ये प्लेटफॉर्म निष्पक्ष थे, इन सब स्थानों पर राष्ट्रवादियों का प्रभुत्व था, अब समय के साथ इस प्रभुत्व को समाप्त करने का षड्यंत्र चल रहा है। फेसबुक ने कुछ समय पूर्व घोषणा की कि वह फेक न्यूज़ को चेक करने के लिए एक तंत्र बनाएगा जिसमे उसकी सहायता boomlive.com नाम की एक संस्था करेगी। Boomlive घोषित रूप से एक वामपंथी विचारों वाली वेबसाइट है। जो भाजपा, संघ और अन्य समविचारी संगठन या विचारधारा की आलोचना करने वालों से भरा हुआ है। फेसबुक कई वेबसाइट को स्वयं को प्रमोट करने के लिए ऐड क्रेडिट देता है। पर उस सूची में एक भी राष्ट्रवादी वेबसाइट नहीं है।
क्विंट जैसी वेबसाइट, जिसके संस्थापक पर मनी लॉन्ड्रिंग के केस हैं, उनको लाखों रुपए के ऐड क्रेडिट दिए जाते हैं। वहीं दूसरी ओर rightlog.in जैसी कई वेबसाइट्स को रातोंरात बिना कारण दिए ब्लॉक कर दिया जाता है। यदि झूठी रिपोर्ट दिखाने पर एनडीटीवी पर एक दिन का प्रतिबंध लगे, तो उसे गलत ठहरा दिया जाता है, वहीं फेसबुक और ट्विटर जैसे प्लेटफार्म विपरीत विचारधारा के एकाउंट का अस्तित्व ही मिटा देते हैं।