मध्यप्रदेश चुनाव: भाजपा की बढ़त से छटपटा रहे कमलनाथ
   दिनांक 20-नवंबर-2018
   दीपक गोस्वामी              
मध्य प्रदेश में महाकौशल को अपना गढ़ मानने वाले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के चेहरे पर चिंता की लकीरें हैं। इस ‘गढ़’ में ही उन्हें लाज बचाना मुश्किल हो रहा है इसीलिए वे अब साम, दाम, दंड, भेद की नीति से आगे जाते हुए समाज में खाई पैदा करने की कोशिश में हैं
समर्थन अपार : मध्य प्रदेश में एक चुनावी सभा में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर और प्रदेश भाजपाध्यक्ष राकेश सिंह (सबसे बाएं)
मध्य प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष कमलनाथ छिंदवाड़ा के ‘विकास’ के किस्से तो बहुत सुनाते हैं, लेकिन वहीं छिंदवाड़ा मध्य प्रदेश के जिस महाकौशल क्षेत्र का हिस्सा है, उसी क्षेत्र में कांग्रेस को जनता नकारती रही है। छिंदवाड़ा के ‘विकास’ की तुलना वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निर्वाचन क्षेत्र बुदनी से करते हैं और अपना छिंदवाड़ा मॉडल पूरे प्रदेश में लागू करना चाहते हैं, लेकिन छिंदवाड़ा के विकास की गाथा पूरे प्रदेश की 230 सीटों पर तो दूर, अपने महाकौशल की 31 सीटों तक भी नहीं पहुंचा पाये हैं। नतीजा यह रहा कि महाकौशल, जो कि कमलनाथ का गढ़ माना जाता है, वहां कांग्रेस लगातार हारती रही है।
2013 के पिछले विधानसभा चुनावों में महाकौशल की 31 सीटों में से 18 भाजपा ने जीतीं तो कांग्रेस को महज 12 सीटें ही मिलीं। कुछ ऐसा ही 2008 में भी देखा गया जब भाजपा 20 सीटों पर कब्जा जमाने में कामयाब रही जबकि कांग्रेस 11 सीटों पर ही सिमट गई।
2018 में भी दृश्य कोई अलग नहीं है। बस इस क्षेत्र को जीतने की कमलनाथ की छटपटाहट बढ़ गई है, क्योंकि अब वे प्रदेश अध्यक्ष हैं और महाकौशल में पार्टी के पिछड़ने का मतलब होगा कमलनाथ के कद में कमी होना। यहां कांग्रेस की हार का मतलब कमलनाथ की व्यक्तिगत हार होना होगा। यही कारण है कि कांग्रेस ने 31 में से 14 सीटों पर अपने चेहरे यानी प्रत्याशी ही बदल दिए हैं। वहीं, पाढुर्ना विधायक जतन उइके का टिकट काट दिया गया है।
बहरहाल, 15 साल से प्रदेश में शासन कर रही भारतीय जनता पार्टी, जिसके खिलाफ कांग्रेस सत्ता विरोधी रुख होने की बातें करती है, उसने केवल 8 सीटों पर ही अपने प्रत्याशियों में फेरबदल किया है। इन 8 में भी एक सिवनी विधानसभा से विधायक दिनेश राय मुनमुन हैं, जो कि 2013 में निर्दलीय जीते थे और फिर भाजपा में शामिल हो गये थे। इसलिए तकनीकी रूप से 7 सीटों पर ही भाजपा ने फेरबदल किया है। यह दिखाता है कि भाजपा तो नहीं, लेकिन कांग्रेस को जरूर लगता है कि उसके चेहरों के खिलाफ ‘एंटी इंकम्बेंसी’ का मामला है तभी उसने बड़ी तादाद में नये चेहरों पर दांव खेला है। शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रदेश में प्रचलित है कि जनता विकास विरोधी कांग्रेस के नेताओं से चिढ़ती है।
इस बात को इससे भी बल मिलता है कि कांग्रेस ने न तो प्रदेश में अपना मुख्यमंत्री का चेहरा आगे किया है और न ही प्रचार के लिए किन्हीं अन्य चेहरों को आगे किया जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को तो प्रचार से दूर रहने की विशेष हिदायत इसीलिए दी गई है। कांग्रेस प्रयासरत है कि मुकाबला भाजपा बनाम कांग्रेस न करके भाजपा बनाम ‘एंटी इंकम्बेंसी’ किया जाये। भाजपा बनाम कांग्रेस के मुकाबले में उसे हार का डर सता रहा है। वैसे महाकौशल को जीतकर अपनी लाज बचाने की कमलनाथ की छटपटाहट को ऐसे भी समझा जा सकता है कि स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा प्रदेश में पैराशूट उम्मीदवार न उतारने की घोषणा को भी उन्होंने धता बता दिया है और जीतने के लिए सिहोरा सीट से उन खिलाड़ी सिंह आर्मो को मैदान में उतारा है जो कि कुछ समय पहले तक भाजपा में थे। खिलाड़ी सिंह को उनकी अनुशासनहीनता के कारण भाजपा से निष्कासित किया गया था। लेकिन कांग्रेस ने उन्हें गले लगा लिया।
वहीं, वारासिवनी से कांग्रेस ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साले संजय सिंह मसानी को टिकट दे दिया है। यहां बताना जरूरी होगा कि कुछ समय पहले तक स्वयं कांग्रेस संजय सिंह मसानी पर घोटाले के आरोप लगाती रही थी। उसका कहना था कि ‘मुख्यमंत्री के सभी घपले-घोटालों और भ्रष्टाचार का कामकाज संजय संभालते हैं’। लेकिन आज जब कांग्रेस संजय को गले लगाती है तो सवाल उठता है कि उसने कैसे एक ‘भ्रष्टाचारी’ को पार्टी में जगह दे दी? या फिर वास्तव में कांग्रेस के शिवराज पर लगाए गए आरोप झूठे थे?
संजय भाजपा से टिकट पाना चाहते थे लेकिन भाजपा ने कड़ा रुख अपनाकर उन्हें टिकट से वंचित कर दिया। तब कांग्रेस जिसे घोटालेबाज बताती थी उसे ही गले लगा लिया।
संजय सिंह को भाजपा से टिकट न देने का एक कारण यह भी रहा कि पार्टी ने एक परिवार में एक ही टिकट की नीति बनाई थी और वह अपनी नीति पर कायम रही। जबकि कांग्रेस जीतने के लिए एक ही परिवार के तीन-तीन सदस्यों को चुनाव में उतारकर वंशवाद की अपनी परंपरा को ही आगे बढ़ा रही है। दिग्विजय सिंह के परिवार से तीन लोगों को तो कांतिलाल भूरिया, अरुण यादव, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सुंदरलाल तिवारी के परिवार से दो-दो लोगों को टिकट दिया गया है।
जीत की यही छटपटाहट है कि कमलनाथ की कांग्रेस को अनुशासनहीन या भ्रष्टाचारी किसी से भी परहेज नहीं है। महाकौशल की 31 सीटों में 15 सीटें अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के लिए आरक्षित हैं। इसमें भी 8 पर भाजपा काबिज है जबकि कांग्रेस के पास 7 ही सीटें हैं। हालांकि 2008 में भाजपा के पास इनमें से 9 सीटें हुआ करती थीं और कांग्रेस के पास केवल 6, इसलिए भाजपा की कोशिश होगी कि इस बार इस अंतर को फिर से बढ़ाया जाये।
अगर जिलेवार दोनों पार्टियों की वर्तमान स्थिति पर बात करें तो महाकौशल की 31 सीटें सात जिलों में फैली हुई हैं-जबलपुर जिले में 8, डिंडोरी में 2, मंडला में 3, बालाघाट में 6, सिवनी में 4, नरसिंहपुर में 1 और छिदवाड़ा में 7 सीटें हैं। सिवनी को छोड़ दें तो सभी 6 जिलों में भाजपा का परचम लहरा रहा है। 2008 में तो सिवनी की भी 4 में से 3 सीटें भाजपा के पास थीं। वैसे, डेढ़ दशक से अधिक समय से ये सभी जिले भाजपा के कब्जे में रहे हैं। यही कारण है कि कमलनाथ के चेहरे पर चिंता की लकीरें उन्हें अपनी लाज बचाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद सब अपनाने पर मजबूर कर रही हैं।
इन सीटों पर रहेगी नजर
अब अगर क्षेत्र की उन महत्वपूर्ण सीटों की बात करें जिन पर सबकी नजर रहेगी तो इसमें सबसे पहला नाम जबलपुर कैंट का आता है, जहां से भाजपा के अशोक रोहाणी विधायक हैं। यह सीट 1993 से भाजपा के पास है और बार-बार प्रत्याशी बदलकर भी कांग्रेस इस पर जीत को तरसती रही है। इस बार कांग्रेस ने उन आलोक मिश्रा पर दांव खेला है जो 2008 में इसी सीट पर अशोक रोहाणी के पिता पूर्व विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी से हारे थे। 2013 में अशोक रोहाणी ने करीब 69 प्रतिशत मत पाकर लगभग 54,000 मतों से यह सीट जीती थी। कांग्रेस के लिए इतने बड़े अंतर को पाट पाना असंभव नजर आता है।
वहीं शाहपुरा से कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश धुर्वे मैदान में हैं। उनके सामने कांग्रेस ने यहां से नये चेहरे पर दांव खेला है और भूपेंद्र मरावी को मौका दिया है। उसकी नजर बालाघाट सीट पर भी है जहां से शिवराज सरकार के कृषि एवं सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन मैदान में हैं। वे 2003 से ही इस सीट पर काबिज हैं। उनकी चुनौती से कांग्रेस पार नहीं पा सकी तो इस बार बाहरी प्रत्याशी पर दांव खेला है और कटंगी के पूर्व विधायक विश्वेश्वर भगत को उनके सामने उतारा है। विश्वेश्वर 2008 में कटंगी से चुनाव जीते थे जबकि 2013 में उसी सीट पर इस बुरी तरह हारे थे कि तीसरे पायदान पर पहुंच गये थे। विश्लेषकों की नजर वारासिवनी सीट पर भी रहेगी, क्योंकि यहां से वर्तमान विधायक योगेंद्र निर्मल को शिवराज सिंह के साले संजय सिंह मसानी कांग्रेस के टिकट पर चुनौती पेश कर रहे हैं। वे भाजपा से इस सीट पर टिकट चाहते थे लेकिन पार्टी और शिवराज ने वर्तमान विधायक पर ही भरोसा जताया और रिश्तेदारी को राजनीति से दूर रखा। अब यह देखना रोचक होगा कि बगावत करके संजय क्या पाते हैं?
सिवनी सीट पर भी नजर इसलिए रहेगी क्योंकि यहां से भाजपा ने उन दिनेश राय को उतारा है जो कि पिछले चुनाव में निर्दलीय ही जीतने में सफल रहे थे। देखना होगा कि वही चमत्कार वे अब भाजपा के लिए दोहरा पाते हैं या नहीं। कांग्रेस ने भी यहां अपना प्रत्याशी बदला है। सिहोरा सीट पर भी नजर रहेगी क्योंकि भाजपा से निकाला गया व्यक्ति ही आज भाजपा को चुनौती दे रहा है। कांग्रेस के टिकट पर खिलाड़ी सिंह आर्मो भाजपा विधायक नंदिनी सिंह मरावी को चुनौती दे रहे हैं। 1990 से यह सीट भाजपा का गढ़ रही है। 1998 में उसे जरूर हार मिली थी लेकिन 2003 से भाजपा यहां नहीं हारी है। नंदिनी सिंह 2008 से ही यहां विधायक हैं। उनकी तीसरी पारी रोकने के लिए कांग्रेस ने एक पूर्व भाजपा नेता पर ही दांव खेला है।
पाटन सीट पर पूर्व मंत्री अजय विश्नोई पर सबकी नजर होगी। वे 2013 में कांग्रेस के नीलेश अवस्थी से हार गये थे। इस बार वे अपनी हार का बदला चुकाने के लिए मैदान में हैं। वे लगातार तीन बार से विधायक थे (दो बार मझोली सीट से और एक बार पाटन से), 2013 में उनकी जीत का सिलसिला नीलेश अवस्थी ने तोड़ा था। अजय के अनुभव पर पार्टी ने फिर से भरोसा जताया है।
मध्य प्रदेश के इन चुनावों में महाकौशल का मुकाबला इस बार इसलिए भी रोचक है क्योंकि भाजपा और कांग्रेस दोनों के ही प्रदेश अध्यक्ष महाकौशल क्षेत्र से आते हैं और दोनों ही क्षेत्र से सांसद हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष जबलपुर से सांसद राकेश सिंह हैं तो कांग्रेस के कमलनाथ छिंदवाड़ा से सांसद हैं।