विधानसभा चुनाव/राजस्थान: कांग्रेस की अंदरुनी कलह का भाजपा को मिल रहा फायदा
   दिनांक 21-नवंबर-2018
 
- डॉ. ईश्वर बैरागी
200 विधानसभा सीटों वाले राजस्थान में 7 दिसंबर को मतदान होगा। भाजपा ने एक बार फिर वसुंधरा राजे पर भरोसा जताया है। लेकिन कांग्रेस अभी तक मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तय नहीं पाई है। कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक गुटबाजी है। इस बार पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती अंदरूनी कलह से निपटना है
राजस्थान विधानसभा की 200 सीटों के लिए अगले माह 7 दिसंबर को मतदान होगा। चुनावी रण में भाजपा- कांग्रेस सहित करीब तीन दर्जन से अधिक राजनीतिक दल ताल ठोक रहे हैं। हाल ही में आए चुनावी सर्वे के आधार पर कांग्रेस खुद को सत्ता के करीब मानकर चल रही है। कांग्रेस को लगता है कि प्रदेश में सत्ता विरोधी लहर है और इसका फायदा उसे मिलना तय है। इसके विपरीत भाजपा राज्य में विकास कार्यों के दम पर चुनाव मैदान में उतरी है। भाजपा का पूरा ध्यान मतदान केंद्रों पर है। गत तीन माह से भाजपा किसी न किसी रूप में लोगों के घरों तक पहुंच रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह लंबे समय से राजस्थान में संगठन को दुरुस्त करने मे लगे हैं। भाजपा के ट्रंप कार्ड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य में करीब एक दर्जन सभाएं करेंगे। भाजपा के विकास कार्यों को आम जनता तक ले जाने के लिए भाजपा ने बड़े स्तर पर रणनीति बनाई है।
कांग्रेस और भाजपा के कार्यक्रमों पर नजर डालें तो जहां भाजपा बूथ स्तर पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए नव शक्ति बूथ सम्मेलन, मोटर साइकिल रैली, बूथ महासंपर्क अभियान, कार्यकर्ता परिवार मिलन, नगर पालिका और नगर परिषद स्तर पर प्रबुद्ध नागरिक स्नेह मिलन, मेरा परिवार- भाजपा परिवार जैसे कार्यक्रमों के जरिए आम आदमी तक पहुंची है। वहीं, आने वाले समय में युवा टाउन हॉल और कमल दीया अभियान के जरिए प्रत्येक घर में एक दीपक, एक कैलेंडर पहुंचेगा। इसके विपरीत कांग्रेस ने बूथ जिताओ, भाजपा हराओ, भ्रष्टाचार भगाओ जैसे नारों के साथ प्रदेश में बूथ संपर्क अभियान शुरू किया, लेकिन यह अभियान भी पार्टी की आपसी खींचतान और विवादों की भेंट चढ़ गया। यह अभियान महज नेताओं का शक्ति प्रदर्शन भर रहा।
केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत कहते हैं, ‘‘बूथ महासंपर्क अभियान में 7,808 शक्ति केंद्रों पर 51,844 बूथों में से 42,688 बूथों पर लोगों से संपर्क किया गया। इस अभियान के तहत भाजपा कार्यकर्ता 70 लाख परिवारों तक पहुंचे हैं। कार्यकर्ताओं ने इस तरह ही सभी अभियानों को उत्साहपूर्वक पूरे किए हैं और आने वाले दिनों में पार्टी की सक्रियता और अधिक बढ़ेगी।
भाजपा ने एक बार फिर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर भरोसा जताया है। भाजपा उनके नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव लड़ेगी। वहीं, कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री कौन होगा, इसे लेकर रार सड़कों पर है। पार्टी में निचले स्तर तक गुटबाजी है। कार्यकर्ता दो धड़ों में बंटे हुए हैं और एक-दूसरे निपटाने में जुटे हुए हैं। हालांकि यह तय नहीं हुआ है कि कांग्रेस किसे मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करेगी, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा है। हालांकि इस मुद्दे पर दोनों ही नेता मीडिया के सामने खुलकर कभी नहीं बोले, लेकिन बातों ही बातों में पायलट और गहलोत एक-दूसरे पर तीखे प्रहार करते हुए कई बार नजर आए हैं। इस बीच, जाट समाज के कद्दावर नेता और नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी ने भी खुद को मुख्यमंत्री दौड़ में शामिल कर लिया है। जाट समाज से आने वाले डूडी को भी अन्य जाट नेताओं की तरह ही इस बात का मलाल है कि राजस्थान को एक भी जाट मुख्यमंत्री नहीं मिल पाया। अपनी भावना को व्यक्त करते हुए वे कहते हैं, ‘‘यदि आलाकमान उन्हें मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपेगी तो वे इसे सहर्ष स्वीकार करेंगे।’’
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बारे में धारणा है कि वे चतुर राजनीतिज्ञ हैं। परदे के पीछे रहकर अपने विरोधियों को निपटाने के मामले में उनका कोई सानी नहीं है। जब तक गहलोत सत्ता के केंद्र में रहे, उन्होंने अपने कद के समकक्ष किसी को नहीं खड़ा होने दिया। 2008 में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष डॉ. सी.पी. जोशी मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार थे। लेकिन चौंकाने वाले चुनाव नतीजों में जोशी एक वोट से हार गए। नतीजा अशोक गहलोत ने हारी बाजी जीत ली और अपने तमाम विरोधियों को दरकिनार करते हुए दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। उस समय गहलोत पर सीपी जोशी को हराने के आरोप लगे थे। माना गया कि गहलोत के इशारे पर ही कांग्रेस समर्थित अपने सजातीय करीब पांच हजार मतदाताओं को गहलोत ने रातों-रात भाजपा की तरफ मोड़ दिया। अब यही डर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को भी सता रहा है। गहलोत को जब कभी भी अवसर मिला, उन्होंने परिणाम की चिंता किए बगैर जोखिम उठाया और अपने लिए राह बनाई।
1998 में गहलोत ने राजस्थान में कांग्रेस को पुनर्जीवित किया और तत्कालीन भाजपा नेता और मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत का नीतिगत विरोध करते हुए कांग्रेस को सत्तासीन किया। उस समय दूर-दूर तक यह संभावना नहीं थी कि गहलोत मुख्यमंत्री बनेंगे। उस चुनाव में कांग्रेस को 153 सीटें मिली थीं। राजनीतिक रूप से मजबूत जाट या ब्राह्मण जाति के नेता ही मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार थे। कांग्रेस में मतभेद इतना अधिक था कि विधायक दल की बैठक में पहुंचे पर्यवेक्षक विधायक दल के नेता का नाम तक घोषित नहीं कर पाए थे। इसके बाद दिल्ली जाकर अशोक गहलोत के नाम का ऐलान हुआ था। राजस्थान में राजनीतिक रूप से जाट, राजपूत और ब्राह्मण समाज का प्रभुत्व है। गहलोत माली समाज से आते हैं, जिसकी राज्य में जनसंख्या केवल तीन प्रतिशत है।
सचिन पायलट का राजनीतिक सफर पिता राजेश पायलट के गुजर जाने के कुछ वर्षों के बाद शुरू हुआ। पायलट जब 26 साल के थे तो 2004 में पिता राजेश पायलट की परंपरागत सीट दौसा से सांसद चुने गए। 2009 में पायलट ने दोबारा लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की और केंद्र में मंत्री भी बने। 2013 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी शिकस्त के बाद पायलट को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके बाद से ही उन्हें राज्य के भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन यह बात कांग्रेस के अन्य कद्दावर नेता अशोक गहलोत, डॉ. सीपी जोशी और नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी को नागवार गुजर रही है। नतीजा आज कांग्रेस की हालात बिना दूल्हे की बारात जैसी हो गई है। इसका असर विधानसभा टिकट बंटवारे में देखने को मिला। कई बार पायलट और डूडी में मतभेद खुलकर सामने आए हैं।
भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी विमल कटियार कहते हैं, ‘‘हमारे लिए कांग्रेस का दुष्पप्रचार ही सबसे बड़ी चुनौती है। इससे निबटने में भाजपा कार्यकर्ता सक्षम हैं। देशभर में कांग्रेस में अंतर्कलह चल रहा है, राजस्थान भी इससे अछूता नहीं है। मुख्यमंत्री कौन होगा, इसकी लड़ाई चल रही है। कांग्रेस में चल रहे अंतर्कलह को प्रदेश की जनता समझ चुकी है। राज्य के मतदाताओं को भाजपा पर विश्वास है। राजस्थान में फिर से भाजपा की सरकार बनाने के लिए सभी कार्यकर्ता पूरी लगन के साथ पार्टी की रीति-नीति और सरकार की उपलब्धियों का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।