तो इस कारण 1962 में चीन से हारा था भारत
   दिनांक 21-नवंबर-2018
आज हुआ था युद्ध विराम। 1962 के भारत चीन युद्ध की गाथा सैनिकों ने अपने रक्त से लिखी और नेहरु ने अपनी भूलों से। जवानों ने अपनी निरंतर उपेक्षा के बावजूद जान की बाज़ी लगाई। नेहरु लगातार चेतावनियों के बावजूद देश को पराजय की ओर ले गए। आज देश की अखंडता और सुरक्षा पर राजनीति करने वालों के लिए वो दौर एक सबक है। मुद्दा आज भी ज्वलंत है।
 
“ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आंख में भर लो पानी जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी ..” भारत चीन युद्ध की जितनी सजीव और मार्मिक प्रस्तुति इस गीत में हुई है, उसकी दूसरी मिसाल नहीं है। ये गीत समर्पित है भारत के उन वीर सैनिकों को, जिन्होंने अपने पराक्रम से सैन्य इतिहास में नया अध्याय जोड़ा और अति विपरीत परिस्थितियों में मोर्चा छोड़ने के स्थान पर बलिदान का विकल्प चुना। गीत की पंक्तियां हैं “थीं खून से लथपथ काया, फिर भी बंदूक उठाके,, दस-दस को एक ने मारा, फिर गिर गए होश गंवा के....” यह पूर्णतः सत्य हैं। समुद्र तल से 16 हज़ार मीटर की ऊंचाई पर स्थित रेजांग ला, जहां ऑक्सीजन की कमी के कारण सिर्फ सांस लेना भी एक चुनौती है, वहां जो संघर्ष हुआ, उसकी मिसाल पूरी दुनिया देती है। यहां परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह अपने 120 जवानों के साथ 12 सौ चीनी सैनिकों के सामने फौलाद की दीवार बनकर खड़े हो गए थे। तेरहवीं कुमाऊं रेजीमेंट के जाबांजों द्वारा आखिरी सांस और अंतिम गोली तक लड़े गए इस युद्ध ने चीनियों को हिलाकर रख दिया था। गोलियां सीने पर लगीं थीं और बंदूकों पर टिकी मृत देहों की उंगलियां ट्रिगर पर जमी थीं। बर्फ में जमे बलिदानी सैनिकों के शरीर युद्ध लड़ रहे सैनिकों की मूर्तियों का आभास दे रहे थे।
साहस के अलावा हर चीज़ की कमी
युद्ध के दूसरे पहलू भी थे। खून जमा देने वाली उस ठंड में हिमालय की सीमा पर भारत के जवान सूती कमीज, पतली ऊनी स्वेटर और बर्फ में पहने जाने वाले जूतों के बिना लड़ रहे थे| निमोनिया और बर्फ में गलते अंगों से जूझते हुए। भोजन, पानी, तंबू, ईंधन, गर्म कपड़े हर चीज़ का अभाव था। पर्याप्त गोला बारूद नहीं था। हाथ में थीं पुराने जमाने की राइफलें, जबकि चीनी आॅटोमेटिक राइफलें और भारी तोपखाने के साथ हमले कर रहे थे। सीमा पर तैयारियों का भी बुरा हाल था। इन बेहद दुर्गम मोर्चों तक पहुंचने के लिए सड़कें नहीं थीं। खंदकें नहीं थीं। पर्याप्त संख्या नहीं थी। चीनी संख्या-साधन-हथियार सबमें अधिक थे। अंतरराष्ट्रीय टाइम पत्रिका ने युद्ध पर अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि “भारतीय सैनिकों के पास साहस के अलावा हर चीज़ की कमी है।” भारत की सेना की इस साधनहीन अवस्था के जिम्मेदार कौन थे, प्रधानमंत्री नेहरू और वामपंथी झुकाव वाले उनके प्रिय रक्षामंत्री मेनन के अलावा?
गढ़ी गई पराजय
उस समय के सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों द्वारा लिखे गए संस्मरणों से पता चलता है कि नेहरू सेना की ज़रूरतों के प्रति किस कदर उपेक्षा का भाव रखते थे। वो कहते थे कि हम तो अहिंसावादी हैं, हमें किसी से युद्ध नहीं करना। हमारा काम तो पुलिस से चल जाएगा। आज विश्वास करना मुश्किल है लेकिन नेहरू के प्रधानमन्त्री काल में सीमा की सुरक्षा के लिए सेना या अर्धसैनिक बलों के स्थान पर पुलिस थाने स्थापित किए गए। तीनों सेनाओं के प्रमुख सेना की ज़रूरतों की सूची लेकर प्रधानमंत्री के कक्ष में जाते थे और सर झुकाए खाली हाथ लौट आते थे। कई रक्षा उत्पादन कारखानों में कप-प्लेट सौन्दर्य प्रसाधन आदि बनवाए जा रहे थे, क्योंकि हथियारों के उत्पादन के लिए आदेश और आवंटित बजट नहीं थे, और कर्मचारियों से कोई न कोई काम तो करवाना था| याद रहे इन्हीं कारखानों ने प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्धों में भारी मात्रा में गोला बारूद बनाया था।
दिवास्वप्न बना दु:स्वप्न
देश के आज़ाद होते ही पाकिस्तान ने कश्मीर पर भीषण आक्रमण किया था। लगभग उसी समय (49-50 में) चीन ने तिब्बत को हड़प लिया था। तब भी नेहरू न जाने किस दिवास्वप्न में खोए थे कि भारत को सैनिक तैयारियों की आवश्यकता नहीं है और देश की सुरक्षा करने के लिए उनकी गुट निरपेक्ष विदेश नीति ही बहुत है। वैसे विडंबना ये रही कि नेहरू और उनके दो अन्य साथी गुटनिरपेक्ष नेताओं, मिस्र के कमाल अब्दुल नासर और यूगोस्लाविया के टीटो, का आभामंडल युद्ध और उथल-पुथल ने ही नष्ट किया।
चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया
भारत ने इस युद्ध में अपने वीर सैनिकों के अलावा एक बड़ा इलाका अक्साई चिन भी खोया। तमाम चेतावनियों के बाद भी नेहरू “हिंदी-चीनी, भाई-भाई” की लोरी में खोए रहे चीन के कम्युनिस्ट तानाशाह माओ और प्रधानमंत्री झाऊ एनलाइ की बातों पर आंख बंद करके आगे बढ़ते रहे। पहली चेतावनी आई थी सरदार पटेल की ओर से, जिन्होंने भारत-चीन युद्ध के 12 साल पहले, 1950 में, अपनी मृत्यु के दो माह पूर्व नेहरू जी को पत्र लिखा और कहा कि चीन पर बिलकुल भी विश्वास मत करो। शब्दशः उन्होंने कहा था कि ‘चीन शत्रुता की भाषा बोल रहा है और तुम दोस्ती निभाए जा रहे हो।’
सरदार पटेल ने तो चीन-पाकिस्तान के आगामी गठजोड़ की मानो भविष्यवाणी कर दी थी। चीन और पाकिस्तान के आगामी गठजोड़ की संभावना सरदार के इन शब्दों में तलाशी जा सकती है "इस प्रकार पूर्व से अब दो खतरे हैं - कम्युनिस्ट और साम्राज्यवाद। जबकि हमारे पश्चिम और पूर्व में (तत्कालीन पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान) खतरे पहले से ही हैं, तब उत्तर और उत्तरपूर्व में ये नया खतरा (चीन) खड़ा हो गया है।" चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर उसे गुलाम बना लिया, वहां भीषण अत्याचार शुरू हो गए। लाखों तिब्बतियों को मौत के घाट उतारा गया, लेकिन सारी दुनिया में अहिंसा और लोकतंत्र की दुहाई देने वाले नेहरू मौन रहे। वो चीन के तानाशाह से पत्रों का आदान-प्रदान और राजनयिक बातचीत कर रहे थे और तिब्बत की बर्फीली जमीन रक्त से लाल हो रही थी। सरदार पटेल देश के प्रधानमंत्री को चेता रहे थे। नेहरू जी को संबोधित करते हुए पटेल लिखते हैं “ इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस पत्राचार के बीच के समय में चीनी तिब्बत (की जनता पर) पर भीषण आक्रमण की तैयारी कर रहे हैं। त्रासदी ये है कि तिब्बतियों ने हम पर विश्वास किया है परंतु हम उन्हें चीन की कूटनीति और दुष्ट इरादों से बचाने में असफल रहे हैं।"
 
विचित्र नीति
उस समय अमरीका और यूरोपीय देश कम्युनिस्ट चीन के इस साम्राज्यवादी विस्तार को दक्षिण एशिया में अपने हितों के लिए ख़तरा मान रहे थे। कई बातें इशारा करतीं हैं कि ये देश चाहते थे कि भारत सैनिक कार्यवाही कर तिब्बत को स्वतंत्र करवाए और अपनी सीमाएं सुरक्षित कर ले| वो इसके लिए शस्त्र-सैन्य सहायता देने को तत्पर थे। 1950 का चीन भारत से उलझने की स्थिति में भी नहीं था, पर नेहरू उदासीन बने रहे।
अब कई नेहरू भक्त विश्लेषक बहाना बनाते हैं कि यदि नेहरू अमरीका-ब्रिटेन को साथ लेकर चीन के खिलाफ जाते तो गुटनिरपेक्ष नीति का क्या होता, और भारत-रूस संबंध कैसे सधते, आदि। ये बातें कितनी खोखली हैं, ये विश्व राजनीति की मामूली समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति जानता है। गुटनिरपेक्ष या कोई अन्य नीति देशहित के लिए होती है, या सिर्फ नीति की गरज से कोई नीति चलाई जाती है? भारत की सुरक्षा और मानवता का तकाजा था कि तिब्बत को स्वतंत्र करवाकर भारत चीन के बीच इस बफर राज्य को पुनः स्थापित किया जाए| जहां तक रूस के नाराज होने का संबंध है, पूरी बात सिरे से बेतुकी है। रूस भारत को अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने से क्यों रोकता, जबकि उसके स्वयं के कई सीमा विवाद चीन के साथ चल रहे थे? 1917 से 1991 तक रूस चीन के बीच सीमा को लेकर कई सैनिक संघर्ष हुए। 1956 से 1966 तक दोनों के राजनैतिक संबंध भी स्थगित रहे| ये तर्क बेमतलब इसलिए भी है क्योंकि जब तिब्बत पर चीन का हमला हुआ, तब भारत रूस संबंध शुरू ही नहीं हुए थे। भारत के रूस से संबंध 1956 में प्रारंभ हुए।
शांतिपूर्ण तिब्बत के चीन के हाथों पतन ने भारत के सामने चुनौतियां खड़ी कर दीं| तिब्बत को हड़पने के बाद चीन ने तिब्बत से लगी भारत की सीमा पर भी अपने दावे शुरू कर दिए। भारत और तिब्बत के बीच के पुराने सीमा समझौतों को नकार दिया। सरदार पटेल ने अपने पत्र में पहले ही नेहरू को चेतावनी दी थी| उन्होंने लिखा था “" हमें समझ लेना चाहिए कि वे (चीन) शीघ्र ही तिब्बत की भारत के साथ हुई तमाम पुरानी संधियों (सीमा संबंधी) को नकार देंगे। तिब्बत के साथ हुई जिन संधियों के आधार पर भारत पिछली आधी सदी से सीमान्त संबंधी और वाणिज्यिक व्यवहार करता आया है, वे सारी संधियां (चीन द्वारा) अमान्य कर दी जाएंगी ..." और यही हुआ भी। जिसकी परिणिति युद्ध में हुई|
 
चीखते सबूतों से आंखें फेरे रहे
और भी कई चेतावनियाँ आईं| डॉ अम्बेडकर, डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी, संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्रीगुरूजी, आचार्य कृपलानी, सभी नेहरू जी को सावधान कर रहे थे। चीन हमारे प्रदेशों पर राजनयिक दावा जता रहा था। चीन के खतरनाक इरादों को बतलाने वाली सिलसिलेवार घटनाएं हो रहीं थीं। जैसे इंटेलीजेंस ब्यूरो ने लद्दाख में चीन की घुसपैठ के बारे में जानकारी दी, तो नेहरू जी ने उस पर ध्यान नहीं दिया गया। चीन के सैनिकों ने पेट्रोलिंग पर निकले भारतीय पुलिस दल को अगवा कर मारपीट की। एक ब्रिटिश पर्वतारोही दल ने भारत की पर्वतीय सीमाओं में चीनी घुसपैठ के बारे में आंखों देखा हाल बताया तो नेहरू जी ने उसे भारत-चीन को लड़वाने का ‘साम्राज्यवादी ताकतों का षडयंत्र’ बताकर ख़ारिज कर दिया| चीन ने लद्दाख में 400 किलोमीटर तक सड़क बना ली। लेकिन हिंदी-चीनी मित्रता की धुन बजती रही|
सीमा पर चीनी हरकतों लेकर इस कदर उदासीनता थी कि उस समय गृहमंत्रालय में एक मज़ाक चलता था , जब किसी अधिकारी को किसी कागज़ पर कार्रवाई नहीं करनी होती तो वो कहता "इसे बॉर्डर फाइल में डाल दो।"
 
और जब सच से सामना हुआ तो.....
दुखद - हास्यास्पद स्थिति तब बनी जब चीन ने भारत पर हमला कर दिया तो नेहरु इन्हीं ‘”साम्राज्यवादियों” की शरण में गए| सीआईए के पूर्व अधिकारी ब्रूस रिडेल ने अपनी किताब ‘जेएफकेज़ फॉरगॉटेन क्राइसिस : तिब्बत एंड दि सिनो-इंडियन वॉर’ में लिखा है, कि जब चीन ने हमला कर दिया, तब घबराए नेहरु ने अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जेएफ कैनेडी को पत्र लिखकर रडार सिस्टम और लड़ाकू विमानों की 12 स्कवाड्रन (एक स्कवाड्रन में 12 से 24) माँगीं| ये बहुत बड़ी संख्या थी| लगभग डेढ़ सौ लड़ाकू विमान रातों रात? फिर भी कैनेडी भारत की सहायता करना चाहते थे, लेकिन उस समय क्यूबा मिसाइल संकट के कारण अमरीका और रूस युद्ध के मुहाने पर खड़े थे| दरअसल अमरीका के पास एक द्वीप पर रूस ने चुपके से अपनी परमाणु मिसाइलें तैनात कर दी थीं| दोनों महाशक्तियां अपने हथियार संभाले, साँस रोके, एक-दूसरे की की हर हरकत पर नज़र गडाए हुईं थीं| इसलिए भारत को सहायता नहीं मिल सकी|
घातक भूलें -
एक और घातक भूल की गई | इस बुरी हालत में भी, भारत की वायुसेना जो भारत चीन युद्ध के 15 सालों पहले तक ब्रिटिश वायुसेना का एक हिस्सा थी, चीन से बेहतर स्थिति में थी| लद्दाख और अरुणाचल के पठारी क्षेत्रों में आक्रमणकारी चीनियों को सर छुपाने की जगह नहीं थी, लेकिन ‘भारत ने हवाई हमला किया तो चीन दिल्ली पर हवाई हमला करेगा’ इस डर से भारत सरकार ने अपनी वायुसेना का पूरे युद्ध में उपयोग ही नहीं किया, जबकि वायुसेना युद्ध की दिशा बदल सकती थी|
वायुसेना के भूतपूर्व एयर कोमोडोर रमेश फडके ने बहुत संयत होकर, कम से कम चोट करने वाले शब्दों में लिखा है कि “सैन्य और राजनैतिक नेतृत्व के बीच संबन्धों का अभाव (अब ये अभाव सेना तो पैदा नहीं कर सकती, सरकार ही कर सकती थी) और सरकार में “सेना से बात करने की घोर अनिच्छा” के कारण नेहरु देश को इस संकट में ले गए|
सेना में राजनैतिक हस्तक्षेप भी इस कदर हावी था कि पूर्वोत्तर में सेना की कमान नेहरू के करीबी सैन्य अधिकारी को दी गई थी , जिसे एक दिन का भी युद्ध का अनुभव नहीं था, जो प्रशिक्षण अकादमी का अधिकारी था, और जो बहाना बनाकर दिल्ली के अस्पताल में भर्ती होकर वहीं से युद्ध का संचालन कर रहा था। इस राजनैतिक दबाव के कारण मोर्चे पर तैनात कई सैनिक अधिकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के स्थान पर सीधे दिल्ली को रिपोर्ट करते थे| इस सबका परिणाम अवश्यम्भावी हार के रूप में हुआ|
अंतहीन टीस
चीन के प्रति नेहरूजी की मेहरबानियाँ या विश्वास जो भी कहें, यहीं समाप्त नहीं होतीं| चीन में कम्युनिस्टों के सत्ता पर काबिज़ होते ही नेहरु उसके समर्थक बन गए| संयुक्त राष्ट्र में सदा उसका साथ दिया| आज संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत सरकार जी-तोड़ मेहनत कर रही है। सुरक्षा परिषद् के 5स्थायी सदस्यों में एक चीन भी है, जो इस विशेष अवसर को पाने के एवज़ में नेहरु जी का ऋणी है| ये बेहद चौंकाने वाला प्रसंग है| तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति कैनेडी ने 1956 में भारत को सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता थाल में सजाकर भेंट करनी चाही थी, क्योंकि एशिया में वो कम्युनिस्ट चीन के मुकाबले भारत को मजबूत होते देखना चाहते थे, लेकिन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने अपनी गुटनिरपेक्ष नेता की रूमानी छवि के मोहजाल में फँसकर इसे ठुकरा दिया। इतना ही नहीं, चीन पर अंधविश्वास रखने वाले नेहरू ने भारत के स्थान पर चीन को सुरक्षा परिषद् में प्रवेश देने की माँग कर डाली।आज चीन सुरक्षा परिषद की सदस्यता के बल पर पकिस्तान के आतंकियों को सुरक्षाकवच दे रहा है| भारत की एनएसजी सदस्यता में रोड़े अटका रहा है. आज नेहरु-गाँधी परिवार के कई भक्त इस बात को झुठलाते हैं कि कैनेडी ने ऐसा कोई प्रस्ताव भारत को दिया था|
पर दस्तावेज उनके झूठ के खिलाफ गवाही देते हैं. कांग्रेस नेता शशि थरूर ने अपनी किताब 'नेहरू-दि इन्वेंशन ऑफ़ इंडिया' में लिखा है कि संबंधित दस्तावेजों को देखने वाले अधिकारियों ने उन्हें इसकी पुष्टि की है। थरूर ने नेहरू द्वारा चीन को ये स्थान दिए जाने की मांग के बारे में भी लिखा है। मार्च 11, 2015 को लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स के अंतरराष्ट्रीय इतिहास विभाग के एंटन हर्डर ने “नॉट एट दि कॉस्ट ऑफ़ चाइना” नामक रिपोर्ट में नेहरू जी और उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित, जो कि अमरीका में भारत की राजदूत थीं, के बीच हुए पत्राचार को प्रकाशित किया है। जिसमें नेहरूजी ने साफ़-साफ़ लिखा है कि भारत सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता में इच्छुक नहीं है और भारत की जगह चीन को ये स्थान मिलना चाहिए।
चालाक चीन पीछे हटा 
चीन पर नेहरुजी के अंधे विश्वास की कीमत देश ने चुकाई| जब दुनिया का ध्यान अमरीका और रूस के संभावित युद्ध की ओर लगा था, और (नेहरु जी की उपेक्षा के बावजूद) भारत की सहायता के इच्छुक कैनेडी उलझे हुए थे, चीन ने 20 अक्टूबर 1962 को भारत की हिमालयी सीमाओं पर हमला किया, और ठंड की बर्फ़बारी के चलते उसके वापिस लौटने के रास्ते बंद हों, इसके पहले, 21 नवम्बर को उसने युद्ध विराम कर दिया. इस युद्ध ने देश के मनोबल पर गहरा कुठाराघात किया|
गहरे सबक 
आज का भारत उस दौर से बहुत आगे निकल चुका है| दक्षिण एशिया की बड़ी शक्ति है| दुनिया में उसके मित्रों की संख्या अधिक है| प्रभाव है| लेकिन ये सारा घटनाक्रम इस बात की सीख देता है, कि देश के नेतृत्व में दूरदर्शिता और देशहित क्या है, इसकी स्पष्टता होना कितनी बड़ी आवश्यकता है| ये इतिहास हमें बार-बार याद दिलाता है कि शक्ति और सन्नद्धता का कोई विकल्प नहीं है| जब आप युद्ध के लिए अच्छी तरह तैयार होते हैं, तो युद्ध की संभावना अपने आप घट जाती है| डोकलाम में चीन का आँखें दिखाना और फिर भारतीय सेना और भारतीय नेतृत्व की दृढ़ता देखकर पीछे हट जाना इस बात का प्रमाण है| ये इतिहास हमें चेताता है कि आज़ादी और स्वाभिमान से जीना सस्ता सौदा नहीं है, ये तो लगातार चलती रहने वाली प्रक्रिया है. कम शब्दों में कहें, तो सारा फेर समझ का है|