'भारत के ही मूल निवासी हैं आर्य, हरियाणा व उत्तर थे सभ्यता के मुख्य केंद्र'
   दिनांक 22-नवंबर-2018
वामपंथी इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को हमेशा गलत तरीके से प्रस्तुत किया। अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय इतिहास को विकृत करने का काम शुरू हुआ। वामपंथियों ने यह थ्योरी गढ़ी कि आर्य भारत के मूल निवासी नहीं थे। वे बाहर से आए थे। अब खुदाई में मिले अवशेषों और विज्ञान ने भी प्रमाणित कर दिया है कि आर्य यहीं के मूल निवासी थे
- अनिता त्यागी 
उत्खनन में निकले रथ और विभिन्न पुरावशेषों के फोटो 
आर्यों को मध्य एशिया का मूल निवासी बताने वाली थ्योरी अब पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है। इतिहास की खोजों से साबित हो चुका है कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे और उनका मुख्य केंद्र उत्तर भारत के क्षेत्र रहे हैं। नदियों के किनारे विकसित होने वाली सभ्यता ही ऋग्वैदिक सभ्यता थी, जिसके अवशेष अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के उत्खनन में मिल रहे हैं। उपनिवेशवादी दृष्टिकोण से लिखा गया इतिहास खंड-खंड हो चुका है और लोगों को पता चल गया है कि हड़प्पा सभ्यता, सिंधु सभ्यता या वैदिक सभ्यता एक ही थी। इन सभ्यताओं को विकसित करने वाले आर्य ही थे। ऋग्वेद का नगरीय पक्ष ही हड़प्पा है।
 
प्रसिद्ध इतिहासकार और अखिल भारतीय इतिहास संकलन समिति के क्षेत्र संगठन मंत्री प्रो़ विघ्नेश त्यागी का कहना है कि सिंधु सभ्यता, हड़प्पा-मोहनजोदड़ो सभ्यता ही सरस्वती सभ्यता है। प्राचीन सभ्यताएं नदियों के किनारों पर विकसित हुई। इन्हें विकसित करने वाले आर्य ही थे। लगभग 100 साल पहले वामपंथी इतिहासकारों द्वारा आर्यों को भारत से बाहर का निवासी सिद्ध करने के प्रयास हुए। अब इतिहास की खोजों से सिद्ध हो गया है कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे और हरियाणा व उत्तर प्रदेश उनकी सभ्यता के मुख्य केंद्र थे।
 
बागपत के सिनौली में मिल चुके हैं साक्ष्य
यूपी के बागपत जनपद के सिनौली गांव में हुई खुदाई में तांबे के हथियार निकले हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के उत्खनन के दौरान ताबूत और रथ निकला है। इससे साफ होता है कि यह योद्धाओं के रथ थे। ऋग्वेद में जो अश्वों की बात कही गई है, उसी बात को सिनौली में निकले रथ, ताबूत व तांबे के हथियार सिद्ध कर रहे हैं। ऋग्वेद में जिस तरह से रथी, अतिरथी, महारथी और परमरथी का वर्णन है, उसकी पुष्टि सिनौली में निकले पुरावशेषों से हो रही है। सिनौली आर्यों की सभ्यता का नगरीय पक्ष है।
 
वामंपथियों की थ्योरी हुई फेल
वरिष्ठ इतिहासकार और एमएम पीजी कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. केके शर्मा का कहना है कि गंगा, यमुना, सरस्वती और हिंडन नदी के किनारे बहुत सारी सभ्यताएं विकसित हुईं। सरस्वती नदी पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बहुत दूर नहीं है। गंगा, यमुना व हिंडन नदी भी यहीं पर बह रही हैं। हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की संस्कृति एक ही है। वामपंथी इतिहासकारों की आर्यन थ्योरी अब पूरी तरह फैल हो चुकी है और वह खुद भी चुप्पी साधकर बैठ गए हैं। वेस्ट यूपी में हड़प्पा सभ्यता की विशेषताएं मौजूद है। यहां पर हर गांव में शंकर भगवान के मंदिर मौजूद है। हड़प्पा सभ्यता की तरह ही यहां पर भी भगवान पशुपति की पूजा होती है। पहले मोहनजोदड़ो को वैदिक सभ्यता का केंद्र बताया जाता था। अब हरियाणा और उत्तर प्रदेश के नगर इस सभ्यता के मुख्य केंद्र बन गए हैं। हरियाणा के राखीगढ़ी में सिंधु सभ्यता के बड़े अवशेष मिले। बागपत के सिनौली गांव में सबसे बड़ा शवाधान केंद्र मिला तो मुजफ्फरनगर जनपद के मांडी में सिंधु सभ्यता के गहने प्राप्त हुए हैं। यहां पर अभी तक का सबसे बड़ा खजाना मिला है। मांडी की खुदाई में मिले कड़े जैसे ही कड़े आज भी महिलाएं पहनती हैं। महिलाओं द्वारा अधिकांश आभूषण भी ऐसे ही पहने जाते हैं, जो वैदिक सभ्यता के दौरान पहने जाते थे। जिस तरह से सिनौली में शवाधान केंद्र में कंकालों के साथ ही बर्तन रखे मिले। वैसे ही बच्चों के शवों के साथ आज बर्तन आदि रखे जाते हैं। यूपी के चित्रकूट में पत्थरों पर पाषाण काल के हथियार के चित्रों जैसे हथियार ही सिनौली में खुदाई के दौरान पाए गए। इससे साफ है कि यह सभ्यता ही आर्यों की सभ्यता रही है और नागरिक सभ्यता का सबसे बड़ा केंद्र थी।
 
नगरीय सभ्यताओं का केंद्र रहा है यह क्षेत्र
शहजाद राय प्राच्य शोध संस्थान बड़ौत के निदेशक और इतिहासकार अमित राय जैन का कहना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का क्षेत्र पांच हजार साल से ज्यादा पुरानी सभ्यताओं का केंद्र रहा है। अब इतिहास की खोजबीन से भी साबित हो गया है कि यहां पर वैदिक सभ्यता से लेकर कुषाणकालीन, गुप्तकालीन आदि तमाम सभ्यताओं के अवशेष बहुतायत में मिल रहे हैं। बागपत जनपद का सिनौली गांव वैदिक सभ्यता का बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। यहां पर सबसे बड़ा शवाधान केंद्र मिला। वैदिक सभ्यता में पहली बार रथ सिनौली में ही उत्खनन के दौरान प्राप्त हुआ। इससे साफ होता है कि यह सारा क्षेत्र सिंधु सभ्यता का बड़ा केंद्र रहा है, जो पूरी तरह से वैदिक सभ्यता थी। सिनौली के शवाधान केंद्र से 177 कंकाल अभी तक प्राप्त हो चुके हैं। शवों को जलाने के चिन्ह के रूप में राख के बड़े-बड़े ढेर प्राप्त हुए हैं। अभी तक प्राप्त अवशेषों की कार्बन डेटिंग पद्धति से पड़ताल करने से पता चला है कि यह पांच हजार साल से भी ज्यादा पुराने हैं। इसके साथ ही कुषाणकालीन सभ्यता का यह बड़ा केंद्र रहा। बागपत जनपद के खपराना गांव में डॉ़ अमित राय जैन के सर्वेक्षण में ताम्र मुद्रा, मृदभांड आदि प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि खपराना गांव में कुषाणकाल का हिंडन नदी दक्षिण छोर पर सवा सौ बीघा क्षेत्र में फैला प्राचीन नगर रहा है। इस टीले से कुषाणकालीन उत्तरवर्ती शासक वासुदेव द्वारा चलाए गए मृदभांड, कृणभूषण, टेराकोटा, ताम्रमुद्रा आदि प्राप्त हुई। वासुदेव का शासन 200 से 220 ईसवी सन तक रहा। कुषाणकाल में अविभाजित कांधार, ब्लूचिस्तान, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बंगाल भी वासुदेव के राज्य में था।
 
प्राचीन नगरों की खोज को दस साल से चल रही मुहिम
अमित राय जैन ने बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यमुना और हिंडन नदी के दोआब क्षेत्र में प्राचीन नगरों की खोज के लिए शहजादराय प्राच्य शोध संस्थान बड़ौत दस साल से मुहिम चला रहा है। इसके लिए प्राचीन खंडहरों और टीलों का सर्वेक्षण किया जा रहा है। इसका नक्शा बनाकर भारत सरकार से संपूर्ण नदी घाटी सभ्यताओं के लिए विशेष उत्खनन अभियान शुरू करने की मांग की जा रही है। अब तक रावण उर्फ बड़ागांव में कुषाणकालीन सभ्यता की खोज की जा चुकी है। साथ ही मंशा देवी मंदिर का अस्तित्व गुप्तोत्तर काल का साबित कराया। 2017-18 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से सिनौली में फिर से खुदाई शुरू कराई, जिसमें ताम्र तलवार, ताबूत और रथ प्राप्त हुए। भारतीय उपमहाद्वीप में पहली बार इस प्रकार के अवशेष मिले हैं। बरनावा के लाक्षागृह में एएसआई से उत्खनन कराया। यहां से भी महाभारत काल से लेकर कई प्राचीन सभ्यताओं के पुरावशेष प्राप्त हुए।
 
आर्यों ने सबसे पहले प्रयोग किए थे रथ
मेरठ केन्टोनमेंट हेरीटेज सोसाइटी के सचिव व सेंटर फॉर आर्म्ड फोर्सेज हिस्टोरिकल रिसर्च नई दिल्ली के फेलो डॉ़ अमित पाठक का कहना है कि दुनिया में सबसे पहले आर्यों ने ही रथों का प्रयोग किया था। जबकि अंग्रेजों ने भारतीयों के गौरवशाली अतीत को भुलाने के लिए दूसरी ही कहानी गढ़ दी। स्कूली पाठ्यक्रमों में भी बाकायदा इसे शामिल करके नई पीढ़ी को पढ़ाया जाने लगा कि आर्य भारत के मूल निवासी नहीं थी। बल्कि आर्यों ने ईसा से 1500-2000 वर्ष पूर्व भारत पर आक्रमण किया था। इतना ही यह भी बताया गया कि आर्यों ने भारतीय सभ्यता को रौंदकर नई सभ्यता की नींव रखी थी।
 
राजकीय स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय मेरठ के अध्यक्ष रहे और वर्तमान में गोरखपुर के राजकीय बौद्घ संग्रहालय के उप निदेशक डॉ़ मनोज गौतम का कहना है कि बागपत का सिनौली ही नहीं, बल्कि मेरठ जनपद के आलमगीरपुर गांव में भी वैदिक सभ्यता के अवशेष निकल चुके हैं। दुनिया की सबसे प्राचीन और विकसित सभ्यता वैदिक काल की ही थी और आर्यों द्वारा विकसित की गई थी। अभी तक केवल हड़प्पा और मोहनजोदड़ों में ही सिंधु सभ्यता का विकास माना जाता था। जबकि अब साबित हो चुका है कि हड़प्पा तो केवल वैदिक सभ्यता का एक किनारा था। मुख्य केंद्र तो हरियाणा और उत्तर प्रदेश का यमुना-हिंडन दोआब का क्षेत्र ही है। वैदिक सभ्यता बहुत विकसित थी, जिसका सिनौली में उत्खनन में मिले लकड़ी के रथ पर बड़े पैमाने पर हुए तांबे के प्रयोग से पता चलता है। सिनौली में रथ के साथ ही मुट्ठे वाली तलवार, तांबे की कील और कंघी भी मिली है।
 
उन्होंने बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महाभारत काल के अवशेष भी मिल चुके हैं। 1953 में प्रसिद्घ पुरातत्वविद प्रो़ बीबी लाल ने उत्खनन में मिले चित्रित धूसर मृदभांडों को महाभारत काल करार दिया था। सिनौली में दैनिक उपयोग की खाद्य सामग्री से भरे मृदभांड, उनके अस्त्र-शस्त्र, औजार एवं बहुमूल्य मनकें इसे प्राचीन सभ्यता ही सिद्घ कर रहे हैं।
 
खुदाई में पहले भी मिली है कब्रगाह
सिनौली से पहले भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को उत्खनन में कई स्थानों पर कब्रगाह मिल चुकी है। हरियाणा के राखीगढ़ी, कालीबंगन और लोथल से पहले भी कई कब्रगाह खुदाई के दौरान मिली है, लेकिन शवाधान केंद्र के साथ पहली बार रथ मिली है। ऐसा पहली बार है कि किसी शवाधान केंद्र के पास रथ मिला है। इससे पहले मेसोपोटामिया, जॉर्जिया और ग्रीक सभ्यता में रथ पाए गए हैं। सिनौली में मिला रथ भी इन स्थानों पर मिले रथ के जैसा ही है। रथ के साथ ही मुकुट मिलने से यह अनुमान है कि यह किसी युद्घ का स्थान रहा होगा।