नवजातों के लिए सबसे खतरनाक है पाकिस्तान
   दिनांक 27-नवंबर-2018
पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हिन्दुओं की सर्वाधिक आबादी है, लेकिन वे बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। भूख और कुपोषण के कारण थारपरकर में कई नवजात एक माह भी जीवित नहीं रह पाते
 - मलिक असगर हाशमी

जुल्म की दास्तां
पाकिस्तान नवजातों के लिए सबसे खतरनाक स्थान है। जापान, आइसलैंड और सिंगापुर में जन्म लेने वाले नवजातों के मुकाबले पाकिस्तान में जन्मे नवजातों के जीवित रहने की उम्मीद 50 प्रतिशत कम है। हाल ही में जारी यूनिसेफ की एक रपट के मुताबिक, शिशु मृत्यु दर के लिए कुख्यात दस देशों में आठ अफ्रीकी और दो एशियाई देश हैं। इन देशों में पाकिस्तान तीसरे स्थान पर है। 40 प्रतिशत हिन्दू आबादी वाले सिंध प्रांत का थारपरकर जिला तो सोमालिया से किसी भी मामले में पीछे नहीं है। पाकिस्तान के इस उजाड़, बियाबान व रेगिस्तानी इलाके में न खाने की व्यवस्था है और न पीने के पानी का इंतजाम। भूख, गरीबी, बेरोजगारी और पिछड़ेपन के कारण सिंध में हर साल सैकड़ों बच्चों की असमय मौत हो जाती है। जिले में ऐसा कोई दिन नहीं बीतता, जब किसी गांव में भूख व इलाज के अभाव में बच्चों के दम तोड़ने की खबर न आती हो। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस साल अक्तूबर में केवल थारपरकर में ही कुपोषण से 53 बच्चों की मौत हो चुकी है। वहीं, अगस्त में जिला मुख्यालय मिठी के सिविल अस्पताल में 35 बच्चों की मौत हुई थी। इस वर्ष अब तक थारपरकर में भूख व बीमारी से 479 शिशुओं की मौत हो चुकी है। स्वास्थ्य विभाग भी मानता है कि जिले में हर साल कुपोषण से औसतन 1500 बच्चे मर जाते हैं। हालांकि गैर सरकारी आंकड़ा कई गुना अधिक है। इसके बावजूद न तो स्थानीय और न ही वहां की केंद्र सरकार इन मौतों को गंभीरता से नहीं लेती है, बल्कि मीडिया का शगूफा बताकर इसे हमेशा खारिज करने का प्रयास करती है।
सिंध की प्रांतीय सरकार का कहना है कि मीडिया बच्चों की मौत की खबर को बेवजह तूल दे रहा है, जबकि सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही है। कुपोषण, अकाल तथा बीमारियों से बचाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। थारपरकर को अकालग्रस्त घोषित करने के साथ 2,08,247 परिवारों को 50-50 किलो गेहूं मुहैया कराया जा रहा है। सिंध के मुख्यमंत्री सैयद मुराद अली शाह का दावा है कि स्वास्थ्य विभाग को स्वास्थ्य समस्यायाओं पर ध्यान देने व शिविर लगाने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं, प्रधानमंत्री इमरान खान ने जिले के लिए राहत पैकेज तैयार करने के निर्देश दिए हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। पाकिस्तान के इस ‘सोमालिया’ में बच्चों की मौत पर आंसू बहाने का ड्रामा पूर्ववर्ती सरकारों में भी होता रहा है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की नेता और सीनेटर कृष्ण कुमारी कोहली कहती हैं, ‘‘अगर प्रांत और संघीय सरकारें थारपरकर की समस्या को गंभीरता से लेतीं तो यह नौबत नहीं आती। उन्होंने सबूत देते हुए बताया कि बच्चों की लगातार मौतों के बावजूद सरकार ने अब तक इलाके में एयर एंबुलेंस की व्यवस्था नहीं की है, जबकि वे लगातार यह मांग कर रही हैं। एयर एंबुलेंस होने पर समय पर इलाज के लिए पड़ोस के शहरों में बच्चों को भेज कर उनकी जान बचाई जा सकती है। थारपरकर के अस्पतालों और कस्बे के स्वास्थ्य केंद्रों में तो जीवन रक्षक संसाधन तक नहीं हैं। यहां तक कि अस्पतालों में चिकित्सक भी नहीं हैं।’’
 
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि इलाके के अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं नहीं होने के कारण कोई भी चिकित्सक थारपरकर में नहीं टिकता। अगर किसी का तबादला इस इलाके में होता है तो वह आते ही दूसरे तबादले की जुगत में लग जाता है। इन लोगों की सियासत में इतनी पैठ है कि चिकित्सक बहुत आसानी से मनचाहे अस्पताल में अपना तबादला करा लेते हैं। सिंध सरकार के मंत्री असद उमर ने कुछ दिनों पहले सदन में एक मिनी बजट पेश किया था, जो सरकार के दावे की कलई खोलता है। इसमें थारपरकर में स्वास्थ्य सेवा सुधारने के लिए किसी विशेष अभियान का जिक्र नहीं था। सर्वाधिक हिन्दू आबादी वाला यह जिला रेगिस्तानी व बंजर इलाके में पड़ता है। यहां के लोग पशु धन और सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर हैं। जिले की 80 प्रतिशत आबादी पशुपालन करती है और बारिश नहीं होने के कारण न जाने कितने वर्षों से खेत बंजर पड़े हैं। आलम यह है कि बंटवारे के 70 साल बाद भी लोगों को सिंचाई तो दूर, पीने का पानी मक मयस्सर नहीं है। इसके अलावा, जिले में बिजली, सड़क और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों का भी घोर अभाव है।
मीडिया रपट के मुताबिक, केंद्र व प्रांत सरकार की 70 प्रतिशत योजनाएं इस दुर्गम जिले में पहुंचते ही दम तोड़ देती हैं। जिले में भ्रष्टाचार चरम पर है। कृष्ण कुमारी कहती हैं, ‘‘थारपरकर नवगठित इमरान सरकार की प्राथमिकताओं में नहीं है। उन्होंने शपथ लेने से पहले देश में कुपोषण से हो रही मौतों का मुद्दा उठाया था, पर सत्ता में आने के बाद उन्होंने इस दिशा में अब कोई ठोस कदम नहीं उठाया। सरकार की सौ दिन की प्राथमिकता सूची में थारपरकर का जिक्र तक नहीं है। यदि मीडिया में भूख से बच्चों की हो रही मौतों से जुड़ी खबरें नहीं आतीं तो इस ओर प्रधानमंत्री का ध्यान भी नहीं जाता।’’ जिले की हालत ऐसी है कि भ्रष्टाचारी मरने वालों के मुंह से निवाला तक छीन ले रहे हैं। हाल ही में इसका एक ताजा उदाहरण सामने आया। जिले को अकालग्रस्त घोषित करने के बाद प्रांत सरकार की ओर से लोगों को 50-50 किलो गेहूं देने के बदले उनसे हर बोरी पर 50 से 100 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। मीडिया में खबर आई तो सरकार ने भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने के बजाए खबरों को ही गलत ठहराना शुुरू कर दिया। रेडियो पाकिस्तान के अनुसार, सरकार अब तक दो लाख से अधिक परिवारों को गेहूं की बोरी उपलब्ध करा चुकी है। भारत के राष्ट्रीय पक्षी मोर का जीवन भी थारपरकर में सुरक्षित नहीं है। जिले में इस वर्ष अब तक 350 से अधिक मोर मर चुके हैं। सिंध वन्यजीव विभाग के आंकड़ों की मानें तो मई में 15 मोरों की मौत हुई। पिछले साल भी सैकड़ों मोर मर गए थे। यहां दरअसल, हर साल मोरों में रानीखेत रोग फैलता है, जिससे उनकी मौत हो जाती है। पर बच्चों के साथ मोरों को बचाने में भी पाकिस्तान सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं है।
(लेखक हिन्दी पायनियर (हरियाणा संस्करण ) के संपादक हैं। )