छत्तीसगढ़ में में फिर से हो रही भाजपा की वापसी !
   दिनांक 28-नवंबर-2018
छत्तीसगढ़ में चुनाव समाप्त होने के बाद राजनीतिक पंडितों की ओर से कयास लगाने का दौर शुरू हो गया। मतगणना में अभी समय है लेकिन तब तक राजनीतिक विश्लेषक अपने अनुभव से बता रहे हैं कि राज्य में भाजपा की फिर से वापसी हो रही है
 युवाओं से वार्ता करते हुए प्रसन्नचित्त मुद्रा में डॉ. रमन सिंह
छत्तीसगढ़ के 90 विधानसभा सीटों के चुनाव खत्म हो गए। अब दलों को प्रतीक्षा है परिणाम की। तब तक कयासों का बाजार गर्म है। इस चुनाव का औसत मत प्रतिशत भी लगभग पिछले चुनाव जैसा होने के कारण राजनीतिक पंडित भी ज्यादा कुछ नहीं बता पा रहे। सबसे आम सा विश्लेषण यही हो सकता है कि चुनाव लगभग पहले की तरह ही लड़े गए हैं। टिकट भी पहले की ही तरह, चुनाव अभियान भी वैसा ही, चेहरे और नेता भी लगभग वही, मुद्दे भी वही, परिस्थितियां भी वही तो जाहिर है, परिणाम भी लगभग कोई अप्रत्याशित जैसा नहीं होगा। ‘अबकी बार पैंसठ पार’ के लक्ष्य के साथ मैदान में आयी भाजपा परिणाम को लेकर संतुष्ट है, वहीं कांग्रेस के खेमे में अपनी कुछ साजिशों के सफल हो जाने से हल्की सी खुशी नजर आ रही है। कांग्रेस ने मान लिया था कि चुनाव कभी रोजी-रोटी, बिजली, सड़क, पानी के मुद्दे पर, विकास के आधार पर नहीं लड़े जाते। मानो यह तय कर लिया हो कि साजिशों, षड्यंत्रों, पाखंडों, झूठ और फरेबों के सहारे ही चुनाव की वैतरणी पार कर सत्ता के स्वर्ग तक पहुंचा जा सकता है। जिनके लिए सत्ता एकमात्र साधन और साध्य भी रहा हो दशकों से, उनके लिए इसके आगे की सोचने की उम्मीद भी शायद ज्यादती ही होगी।
बहरहाल प्रदेश में कांग्रेस के चुनाव अभियान की शुरुआत एक अश्लील सीडी के प्रसारित करने से हुई थी। कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने स्वयं प्रेस वार्ता में सीडी को लहरा कर उसमें प्रदेश के एक कद्दावर मंत्री को कथित तौर पर आपत्तिजनक हालत में दिखाया था। इससे पूरे प्रदेश में सनसनी फैल गयी थी। फिर एक निजी चैनल ने अपनी जांच में सीडी के नकली होने, उसे एक अश्लील फिल्म से लेकर छेड़छाड़ कर मंत्री का चेहरा उसमें रोपने संबंधित सारी साजिशों का मूल वीडियो के साथ पदार्फाश किया था। उसके बाद सीबीआई जांच का आदेश हुआ। प्रदेश अध्यक्ष जेल गए और फिलहाल जमानत पर बाहर हैं। जांच एजेंसी ने आरोप पत्र दाखिल कर दिया है। उसके बाद तो खैर गिरावट के ऐसे-ऐसे कीर्तिमान स्थापित किये कांग्रेस ने जिनके बारे में लिखते हुए भी शर्मिंदगी महसूस होती है। अपनी ही पार्टी के प्रदेश प्रभारी की अश्लील सीडी की चर्चा, फिर उसे खरीदने का सौदा करते हुए विधानसभा की दो सीट बेचने की बात, उसका भी एक अलग सीडी में खुलासा हो जाना, उसके बाद एक पोर्टल के माध्यम से लगातार विपक्ष के नेताओं के खिलाफ स्टिंग आदि दिखाना। जिस विपक्ष को 15 वर्ष के बाद लोकहित से संबंधित मुद्दों को उठाकर शासन की चूक को सामने लाते हुए अपना रोडमैप जनता के सामने रखने की उम्मीद थी, वह केवल नकारात्मक चीजों, फेक न्यूज, नकली सीडियों की शृंखला, तमाशा आदि को ही अपने अभियान का आधार बना कर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने के सपने पाले बैठा था।
इसके उलट भाजपा ने सकारात्मक रूप से अपनी तैयारी वर्ष भर पहले से ही शुरू कर दी थी। या यूं कहें कि संगठन की सक्रियता के चलते भाजपा लगातार जनता के बीच ही रही जिसके कारण उसे चुनाव में अतिरिक्त मेहनत की जरूरत नहीं पड़ी। शासन के ‘विकास यात्रा’ में दो चरणों में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अपने सभी मंत्रियों और नेताओं के साथ गांव-कस्बों तक जा कर अपने कार्यों का हिसाब सीधे जनता को दिया था। फिर चुनाव में भी करीब 72 बड़ी सभाओं के माध्यम से जनता तक सीधे अपनी बात पहुंचाने की कोशिशों से एक माहौल बना तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपाध्यक्ष अमित शाह समेत राष्ट्रीय नेताओं की लगातार सभाओं ने भी भाजपा के अभियान को गति और दिशा प्रदान की। पार्टी का टिकट वितरण हालांकि काफी अप्रत्याशित होने की उम्मीद थी लेकिन भाजपा ने कोई ज्यादा जोखिम लेना उचित नहीं समझा और उसका एक संतुलित निर्णय ही आया।
चुनाव करीब आते-आते कांग्रेस की समझ में यह आने लगा था कि पंद्रह वर्ष के भाजपा के शासन के बावजूद वह न तो शासन की कोई बड़ी विफलता सामने लाने में कामयाब हो सकी है और न ही कांग्रेस की कोई दृष्टि जनता के सामने रख सकी है। ऐसा समझ आने के बाद काफी हड़बड़ी में कांग्रेस ने अपना घोषणा पत्र सामने रखा। ऐसा घोषणा पत्र जिसमें भाषा संबंधी ही करीब सौ से ज्यादा गलतियां थी। एक मामला तो काफी चर्चित रहा था जिसमें कांग्रेस ने ‘उपनिवेशवादियों’ से भी सुझाव लेकर घोषणा पत्र बनाने का दावा किया था। भाजपा ने उसे बड़ा मुद्दा बनाते हुए देश को गुलाम बनाने वाली ताकतों से अभी तक सांठ-गांठ होने का आरोप लगा कर उनका चेहरा उजागर किया, जिसके जवाब में कांग्रेस ने सफाई में कहा कि उनकी टीम ने ‘कोलोनाइजरों’ का हिन्दी अनुवाद उपनिवेशवादी कर दिया था। अगर इस पर भरोसा कर भी लिया जाय तब भी भाषा संबंधित इतनी असावधानियों के कारण कांग्रेस की गंभीरता का अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है। हालांकि इतनी सारी असावधानियों के बावजूद कांग्रेस की किसानों संबन्धित घोषणा ने भाजपा को जरा चिंतित किया था। पहली बार ऐसा लगा कि कांग्रेस कोई ऐसी बात कर रही है जिसका सीधे जनता से सरोकार है। हालांकि उनके वादों पर प्रेक्षक यह मानते हैं कि ऐसी घोषणाएं पूरी हो ही नहीं सकतीं।
केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कांग्रेस के इस घोषणा पत्र को ‘किसी दिवालिया बैंक द्वारा दिया गया पोस्ट डेटिड चेक’ कहा और भाजपा ने जोर-शोर से कर्नाटक के किसानों की गिरफ्तारी वारंट आदि का विषय उठा कर जनता को यह समझाने की कोशिश की जिसके जवाब में कांग्रेस के दर्जनों नेता प्रेस वार्ता में गंगाजल लेकर खड़े हो गए कि सत्ता में आने पर वे दस दिन के भीतर किसानों से किये गए वादे को पूरा करेंगे। सब जानते हैं कि ऐसा करना असंभव है। इधर जोगी कांग्रेस और आआपा ने भी सब्जबाग दिखाने में कोई कसर नहीं रखी। आआपा का तो खैर कुछ आधार ही नहीं लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी को मिले वोट से कांग्रेस के वोट कटने का अनुमान था जिसका फायदा भाजपा को मिलेगा, लेकिन जिस तरह से जोगी ने हर दिन अपने बयान बदलने, स्तरहीन और अगंभीर होने की छवि बनायी उस तरह उन्हें ज्यादा समर्थन मिलता दिख नहीं रहा। बसपा के साथ जोगी के गठबंधन से जरूर कुछ वोट बसपा के खाते में जाने चाहिए, साथ ही सीपीआइ से गठबंधन भी बस्तर के एकाध सीटों पर भाजपा की राह आसान कर सकता है, ऐसा माना जा सकता है।
बहरहाल परिणाम तो 11 दिसंबर को ही पता चलेगा लेकिन ‘पाञ्चजन्य’ ने एक अलग तरह से परिणाम का आकलन करने की कोशिश की है। हमने प्रदेश के पांच प्रमुख विश्लेषकों से सभी नब्बे सीटों पर परिणाम का आकलन करने का आग्रह किया। उन सभी अनुमानों का औसत निकालने पर एक स्पष्ट लेकिन सामान्य बहुमत से भाजपा की सरकार फिर से बन जाने का निष्कर्ष आया है। अध्ययनों के आधार पर मोटे तौर पर भाजपा को कुल 90 सीटों में 50 से 55 सीट मिलने की भविष्यवाणी की जा सकती है। अभी तक प्रदेश के सभी चुनाव रुझानों का औसत भी लगभग 54 सीटों का है। हालांकि लोकतंत्र और भाजपा के लिए सबसे संतोष की बात यह कि नकारात्मक अनुमान व्यक्त करने वाले अध्ययनों में भी सभी ने डॉ. रमन सिंह को मुख्यमंत्री के रूप में सबसे पसंदीदा पाया। अगर तीन पारी और पंद्रह वर्ष तक सत्ता में रहने के बावजूद किसी मुख्यमंत्री के लिए ऐसा ‘फीडबैक’ आये तो भाजपा इस बात पर संतोष कर सकती है कि उसकी विचारधारा ने कुछ तो अद्भुत किया है देश-प्रदेश में।