पाकिस्तान में फुटपाथ पर रहने को विवश हैं हिंदू
   दिनांक 28-नवंबर-2018
पाकिस्तान में हिंदू जोगी समुदाय बीन और सांप छोड़कर हस्तकला से अपना जीविकोपार्जन कर रहे हैं । पाकिस्तान में जब से हिन्दू जोगी समुदाय के मकानों और खेत-खलिहानों पर अवैध कब्जे हुए, तब से वे फुटपाथों पर रह रहे हैं। उन्हें न तो बुनियादी सुविधाएं मिलती हैं और न ही समुचित इलाज।
 - मलिक असगर हाशमी

पाकिस्तान में हिंदू जोगी समुदाय बीन और सांप छोड़कर हस्तकला से अपना जीविकोपार्जन कर रहे हैं 
पाकिस्तान में हिन्दू समुदाय की हैसियत अपनों में बेगाने जैसी है। उनका वजूद, भाषा, संस्कृति, धर्म, संपत्ति सब कुछ खतरे में है। उनके लिए परिस्थितियां इतनी तंग कर दी गई हैं कि वे जीते जी नरक भोग रहे हैं।
नवगठित इमरान खान सरकार ने ‘नए पाकिस्तान’ की उम्मीद जगाई थी, लेकिन सरकार के रवैये के कारण स्थानीय हिन्दू अब नाउम्मीद से दिखने लगे हैं। पूर्ववर्ती सरकारों की तरह मौजूदा सरकार भी कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघन का उलाहना लेकर संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ आग उगलने पहुंच गई। हालांकि अपने देश में ही अल्पसंख्यकों की स्थिति चिंताजनक है, लेकिन पाकिस्तान सरकार को इस बात की फिक्र नहीं है। अफसोस और आक्रोश इस बात से अधिक है कि जिन देशभक्त हिन्दुओं ने पाकिस्तान को अपना देश मानकर उसे सजाया-संवारा और विभाजन के बाद भी भारत नहीं आए, उनके विरुद्ध ज्यादतियां थम नहीं रही हैं। हिन्दू अधिकारों की बात तो छोड़िए, यहां तो वे फरियाद भी नहीं कर सकते। हर पल दहशत के साये में जीते हैं। हिन्दुओं में जोगी समुदाय खासतौर से सर्वाधिक पीड़ित है।
पाकिस्तान के सिंध प्रांत के रेगिस्तानी इलाके थारपरकर में हिन्दू जोगियों की बहुतायत है। यह सिंध प्रांत के 29 जिलों में से एक है। इस समुदाय के लोग भारत के राजस्थान और गुजरात के थार इलाके में भी बड़ी तादाद में रहते हैं। जोगियों का गेरुआ वस्त्रों और सांप से गहरा नाता रहा है। इनकी जिंदगी कलंदरों जैसी है। आमतौर पर बीन और सांप इनके जीवकोपार्जन के मुख्य साधन रहे हैं। बीन बजाकर सांप का खेल दिखाने पर दर्शकों से जो कुछ मिलता है, उसी से इनके घरों का चूल्हा जलता है। मगर अब परिस्थिति पहले जैसी नहीं रही। मनोरंजन के छोटे-बड़े ऐसे आविष्कार हो चुके हैं कि गांव के अनपढ़ बच्चों को भी बीन और सांप का खेल देखना पसंद नहीं है। पाकिस्तान के जोगियों के जीवन के कठिन होने की और भी कई वजहें हैं। जोगियों की आधी आबादी के पास नागरिकता पहचान-पत्र तक नहीं है। ऊपर से थारपरकर जिला भी समस्याओं से घिरा हुआ है। यहां रहने का मतलब है- नरक भोगना। इसलिए यहां से बड़ी संख्या में जोगी समुदाय दूसरे शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हुआ। 
थारपरकर जिले में कृषि वर्षा पर आश्रित है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस रेगिस्तानी इलाके में नियमित बारिश कभी होती ही नहीं। हालांकि इस जिले में हिन्दुओं की आबादी 40 प्रतिशत है, लेकिन यहां बिजली की उपलब्धता और शिक्षा का स्तर पाकिस्तान के अन्य इलाकों के मुकाबले सबसे नीचे है। एक आंकड़े के अनुसार, जिले में 100 में से केवल 30 बच्चे ही स्कूल जाते हैं। मानव विकास सूचकांक में यह सबसे निचले पायदान पर है। थारपरकर के बिगड़े हालात के चलते भारी संख्या में जोगी सिंध प्रांत से पाकिस्तान के प्रमुख शहर हैदराबाद में बस गए हैं। सिंधु नदी के किनारे बनी प्राचीन इमारतों और पार्कों वाले शहर को बसाने में एक हिन्दू दीवान गिदुमल की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। लेकिन अब उसी समुदाय के लोगों को यहां सिर छिपाने तक की जगह नहीं मिल रही है।
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, रियासत खुदाबाद के शासक मियां गुलाम अली शाह कल्होर ने सिंधु नदी के जल प्रलय से तंग आकर मौर्यकालीन खंडहर नेरूण, जिसे नेरूण कोट भी कहा जाता है, में एक किले का निर्माण करा कर अपनी रियासत की राजधानी को वहीं स्थानांतरित कर लिया था। दीवान गिदुमल की देख-रेख में 1760-68 तक यानी आठ साल तक किले का निर्माण कार्य चला। एक ऊंचे टीले पर बने इस किले को सिंधी में ‘पक्को किलो’ कहा जाता है।
1848 में प्रकाशित जे.एच.डब्लू. की पुस्तक ‘सीन्स इन सोल्जर लाइफ’ में बताया गया है कि किले के अंदर 1800 भव्य इमारतें थीं, जिसमें खुदाबाद के शासक मियां गुलाम अली शाह और उनकी रियाया रहती थी। इतिहासकार बताते हैं कि गिदुमल के कार्य से शासक इतने खुश हुए थे कि दो नावों में अशर्फियां भर कर उन्हें विदा किया था। 1771-72 में तत्कालीन शासक की मौत के बाद इलाके का पतन शुरू हो गया। 1782 में कल्होर्स और ब्लूच के बीच युद्ध हुआ, जिससे इस क्षेत्र को काफी नुकसान पहुंचा और बाकी कसर अंग्रेज शासकों ने पूरी कर दी। चार्ल्स नेपियर के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने किले के भीतर स्थित अधिकतर इमारतों को ढहा दिया और शेष बची इमारतों में अपना कार्यालय खोल दिया। किले के बीच में एक छह मंजिला टावर था, उसे भी गिरा दिया गया। मौजूदा हैदराबाद किले भीतर से लेकर बाहर तक कई किलोमीटर में फैला हुआ है। हालांकि अब किला तो नहीं है, लेकिन अवशेष के रूप में ऊंचे दरवाजे और पक्की र्इंटों की मोटी दीवारें आज भी मौजूद हैं। इसके एक हिस्से में संग्रहालय है। किले के अधिकांश हिस्से पर लोगों ने अतिक्रमण कर
लिया है।
1990 के आसपास तत्कालीन सरकार ने ‘पक्को किलो’ के संरक्षण के लिए कुछ घोषणाएं की थीं, लेकिन कोई भी घोषणा आज तक परवान नहीं चढ़ पाई। किले के अंदर कई हिन्दू साहूकारों की इमारतें थीं। बंटवारे के बाद हिन्दू भारत आ गए तो उनकी संपत्तियों पर मुलसमानों ने कब्जे कर लिए। हैदराबाद की फातिमा जिन्ना रोड से हैदराबाद प्रेस क्लब तक सड़क के दोनों ओर फुटपाथ पर करीब 400 जोगी हिन्दू परिवार रहते हैं। इनमें से अधिकांश थारपरकर के मूल निवासी हैं। विभाजन के बाद मुसलमानों ने इनके मकानों, जमीन-जायदाद पर कब्जा कर लिया। अब ये फुटपाथों पर ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं। सरकार इन्हें बुनियादी सुविधाएं भी मुहैया नहीं करा रही। इनके बच्चे स्कूल नहीं जाते। वक्त की नजाकत को समझते हुए जोगियों ने बीन और सांप को छोड़कर हस्तकला को जीवनयापन का जरिया बना लिया है। अब वे कच्चे बांस की खपच्चियों से सजावटी सामान, टेबल, कुर्सी आदि बनाते हैं।
जोगी समुदाय का कहना है कि पिछली सरकार ने अवैध कब्जे का शिकार हो चुकी इनकी संपत्तियों के बदले घर बना कर देने का वादा किया था, जो पूरा नहीं हुआ। पाकिस्तान के मशहूर अंग्रेजी दैनिक ‘डान’ की एक रपट के मुताबिक, कराची के कयूमाबाद में 60 वर्षों से 4,000 जोगी परिवार झोपड़ियों में रह रहे हैं। ये भी थारपरकर के मूल बाशिंदे हैं। पाकिस्तान में जोगी समुदाय के मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले कृष्ण भंडारी कहते हैं कि फुटपाथों पर रहने वाले जोगियों के पास नागरिकता पहचान-पत्र नहीं है, इस कारण उन्हें पानी, बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलती हैं। उन्हें सरकारी अस्पतालों में भी समुचित इलाज नहीं मिल पाता है। पाकिस्तान के अस्पतालों में बड़े पैमाने पर जकात (दान) का पैसा लगा हुआ है। जोगियों का आरोप है कि स्वास्थ्य कर्मचारी कहते हैं कि जकात के पैसे से खरीदी गई जीवन रक्षक वस्तुएं केवल मुसलमानों के लिए हैं। चूंकि वे हिन्दू हैं, इसलिए उन्हें इसकी सुविधा नहीं मिलेगी। पाकिस्तान में हिन्दुओं की दशा पर नजर रखने वाली एक वेबसाइट के अनुसार, झोपड़ी में रहने वाले धनिया का आरोप है कि उसे एक कारखाने से इसलिए निकाल दिया गया, क्योंकि उसके पास नागरिकता पहचान-पत्र नहीं है।
(लेखक हिन्दी पायनियर (हरियाणा संस्करण) के संपादक हैं।)