झूठी खबरों का कारोबार कर रहा है मीडिया
   दिनांक 28-नवंबर-2018
चुनावी सरगर्मी बढ़ने के साथ ही झूठी खबरों के कारोबार में तेजी आ गई है। मीडिया का एक जाना-पहचाना वर्ग बड़ी सफाई से झूठ के नये-नये पहाड़ खड़े करने में रत है। इस क्रम में बीबीसी ने एक तथाकथित रिसर्च के आधार पर दावा किया कि भारत में फेक न्यूज के पीछे राष्ट्रवादी विचारधारा वाले लोगों का हाथ है। लेकिन यह अध्ययन फर्जी निकला। समाचार पोर्टल 'ओपइंडिया' ने बीबीसी की इस रिपोर्ट की बखिया उधेड़कर रख दी। उन्होंने न सिर्फ इस शोध की खामियों को उजागर किया, बल्कि बीबीसी की फैलाई झूठी खबरों की पूरी सूची जारी कर दी। नतीजतन बीबीसी को इस अधकचरी रिपोर्ट में कई बार बदलाव करना पड़ा। सवाल यह है कि ब्रिटेन के करदाताओं के पैसे से चलने वाली इस संस्था की रुचि भारत में राष्ट्रवादी विचारधारा की विश्वसनीयता कम करने में क्यों है? ऐसी क्या मजबूरी थी कि इसके लिए फर्जी आंकड़ों और झूठे तथ्यों का सहारा लेने की कोशिश की गई? जस्टिस लोया से लेकर मौजूदा राफेल विवाद तक फर्जी खबरों की झड़ी लगा देने वाले मीडिया संस्थान अगर यह आरोप लगाएं कि राष्ट्रवादी विचारधारा वाले लोग झूठी खबरें फैलाते हैं तो यह उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली बात है।
उधर, सीबीआई के आंतरिक विवाद के मामले में भी झूठ फैलाने वाला यही गिरोह सक्रिय है। एनडीटीवी ने सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई से ठीक पहले सूत्रों के हवाले से घोषित कर दिया कि छुट्टी पर भेजे गए निदेशक आलोक वर्मा को मुख्य सतर्कता आयुक्त की जांच में क्लीनचिट मिल गई है। अगले ही दिन यह समाचार गलत साबित हुआ। यह समझना मुश्किल नहीं है कि चैनल ने भ्रम पैदा करने की नीयत से जान-बूझकर यह समाचार गढ़ा था। एनडीटीवी और बीबीसी ही नहीं, कांग्रेस पार्टी के प्रचार तंत्र की तरह काम कर रहे तमाम मीडिया संस्थान लगातार ऐसी खबरें फैलाने की कोशिश कर रहे हैं जिनसे सरकारी और कानूनी प्रक्रियाओं को प्रभावित किया जा सके।
कुछ महीने पहले जम्मू के कठुआ में एक बच्ची की हत्या के बाद सेकुलर मीडिया की मदद से रातोंरात 'सेलिब्रिटी' बनी वकील दीपिका राजावत की सच्चाई भी सामने आ गई। मीडिया ने उनको ‘न्याय के लिए लड़ने वाली’ बहादुर महिला बताया था, लेकिन खुद पीड़िता के परिवार ने उन्हें मुकदमे से बाहर कर दिया। राजावत और उनके साथियों पर उस बच्ची के नाम पर मिले चंदे में भी गबन करने के आरोप हैं। उन्हें मीडिया ने महिमामंडित किया था, लेकिन सच्चाई सामने आने पर किसी ने भी इस बारे में विस्तार से नहीं दिखाया।
पंजाब के अमृतसर में आतंकवादी हमले की खबर भी मीडिया के एक वर्ग की चालाकी का शिकार बनी। राज्य पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था पर कहीं पर भी कोई सवाल देखने को नहीं मिला। हमले के फौरन बाद आम आदमी पार्टी के विधायक एचएस फुल्का ने सेना प्रमुख पर आरोप लगा दिया। मीडिया ने इससे जुड़ी खबरें दिखार्इं लेकिन ध्यान रखा कि कहीं पर भी उनके नेता अरविंद केजरीवाल का नाम न आए। आजतक चैनल ने तो फुल्का के बयान को यह कहते हुए सही ठहराने की कोशिश की कि वे सिर्फ विधायक नहीं, बल्कि मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हैं।
उधर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों को लेकर भी मीडिया का रवैया संदिग्ध है। कई चुनाव पूर्व सर्वे दिखाए गए, जिनमें बड़ी सफाई से राहुल गांधी की लोकप्रियता को बढ़ते दिखाया जा रहा है। टिकट बंटवारे ही नहीं, कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के बीच गुटबाजी और यहां तक कि मारपीट की खबरें आईं, लेकिन ज्यादातर को दबा दिया गया। कमलनाथ के कई भड़काऊ वीडियो सामने आ चुके हैं। लेकिन मीडिया का हंगामा इसे लेकर नहीं है। राजस्थान में तो कांग्रेस के गुटों के बीच दंगे-फसाद जैसी स्थिति पैदा हो गई। इसके चलते धारा 144 तक लगानी पड़ी। लेकिन शायद ही किसी राष्ट्रीय चैनल ने इस बात पर खास गौर किया। जमीनी स्थिति को दिखाने के बजाय अगर मीडिया झूठी कहानियां ही गढ़ता रहा तो इससे खुद मीडिया की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाएगी।