पैसे से बड़ी इनसान की कीमत
   दिनांक 05-नवंबर-2018
 
आज एक सामान्य व्यक्ति के लिए किसी भी बीमारी का इलाज कराना आसान नहीं रह गया है। ऐसे रोगियों को यदि किसी बीमारी के कारण सी.टी. स्कैन या एम.आर.आई. कराने की जरूरत पड़े तो उनका घरेलू बजट गड़बड़ा जाता है। आगरा के डॉ. मुनीश्वर गुप्ता इन रोगियों की परेशानियों को कम करने का काम कर रहे हैं। वे प्रोफेसर कॉलोनी, आगरा में ईशा डायग्नोस्टिक के नाम से एक जांच केंद्र चलाते हैं। यहां 1,000 से 1,500 रु. तक में सी.टी.स्कैन होता है, जबकि बाजार में इसी जांच के लिए 1,700 से 2,500 रु. तक खर्च करने पड़ते है। इसी तरह यहां एम.आर.आई. केवल 2,000 रु. में होता है, जबकि बाहर इसी के लिए 5,000 रु. लगते हैं। इस केंद्र में सी.टी. स्कैन मशीन 1993 में लगाई गई थी। इसका उद्घाटन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक प्रो. रज्जू भैया ने किया था। तो एम.आर.आई. मशीन का उद्घाटन पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के करकमलों से 1996 में हुआ था। डॉ. मुनीश्वर कहते हैं, जिस केंद्र को ''श्री रज्जू भैया और अटल जी जैसी विभूतियों का आशीर्वाद मिला हो, वह भला बाजार के बहाव के साथ कैसे बह सकता है? इसलिए इस केंद्र में बाजार भाव से कम कीमत पर एम.आर.आई. और सी.टी. स्कैन किया जाता है।'' यही नहीं, यदि कोई रोगी इतना पैसा भी दे पाने में सक्षम नहीं होता तो उसे और विशेष छूट दी जाती है। यानी डॉ. मुनीश्वर पैसा से ज्यादा इनसानियत को महत्व देते हैं। उनका कहना है कि किसी जांच के अभाव में कोई अपनी बीमारी का इलाज न करा पाए, यह समाज के लिए ठीक नहीं है। इसलिए उनसे जो बनता है, उसी से समाज की सेवा करते हैं। वे प्रतिदिन 20-22 मरीजों की जांच करते हैं। वे 25 वर्ष से रोगियों की सेवा कर रहे हैं। एक अनुमान है कि इस अवधि में उन्होंने करीब 40 करोड़ रु. का काम किया और समाज का लगभग 25 करोड़ रु. बचाया। डॉ. मुनीश्वर ने आगरा के एस.एम. मेडिकल कॉलेज से एम.बी.बी.एस. और एम.डी. की उपाधि ली है। चिकित्सा शिक्षा में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अनेक बार अनशन भी किया है। डॉ. मुनीश्वर देश के पहले चिकित्सा छात्र हैं, जिन्होंने अपना शोध ग्रंथ हिंदी में लिखा था। 1987 में हिंदी में शोध ग्रंथ लिखने से पहले उन्हें व्यवस्था से संघर्ष भी करना पड़ा था। आखिर में उन्हें इसकी अनुमति मिली। उनके इस संघर्ष का सुफल आज दिखने लगा है। चिकित्सा जगत के अनेक छात्र आज हिंदी में ग्रंथ लिख रहे हैं और पढ़ाई भी कर रहे हैं।