सेवा के 'सागर'
   दिनांक 05-नवंबर-2018
- अशोक कुमार श्रीवास्तव       
नई दिल्ली के वसंत कुंज में रहने वाले डॉ. प्रबोध सागर कान, नाक और गले की बीमारियों के विशेषज्ञ हैं। वे सुबह-शाम रोगियों को देखते हैं। उनका कहना है कि जिस समाज के सहयोग से वे डॉक्टर बने हैं, उसका लाभ तो समाज को मिलना ही चाहिए। इसलिए वे गरीब रोगियों से परामर्श के लिए एक पैसा नहीं लेते। उनके पास आने वाले रोगियों में ज्यादातर गरीब तबके के होते हैं। 'नर सेवा, नारायण सेवा' को मूलमंत्र मानने वाले डॉ. सागर का कहना है, ''यदि जीवन में शांति और सौहार्द चाहते हैं तो जब भी समय मिले, जरूरतमंदों की सेवा करें। आपकी सेवा से जो लाभान्वित होगा, उसका आशीर्वाद आपके जीवन की सभी दुश्वारियों को कम कर देगा।'' इसलिए वे किसी भी रोगी की सेवा उसे ईश्वर समझ कर करते हैं।
डॉ. सागर वसंत कुंज के आर्य समाज मंदिर में हफ्ते में दो दिन शाम को अपनी सेवाएं देते हैं। वहां के औषधालय में वे निर्धारित समय पर बैठते हैं और उस दिन जितने भी रोगी आते हैं, उनका इलाज करके ही घर जाते हैं। उनकी यह सेवा भी नि:शुल्क है। डॉ. सागर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में ई.एन.टी. विभाग के अध्यक्ष रहे हैं। वहां उन्होंने 28 साल तक लोगों की सेवा की। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपने स्तर से लोगों की सेवा शुरू की है। मरीजों से बात करने का उनका तरीका अनौपचारिक, मित्रवत होते हुए भी रोग से जुड़ी बारीकियों को समझने का है। वे किसी मरीज से पहले उनका हालचाल पूछते हैं, फिर नुस्खा लिखते हैं।
डॉ. सागर दिल्ली के वर्र्तमान प्रदूषण के प्रति चिन्तित रहते हैं। वे प्रदूषण को कान, नाक और गले की बीमारियों का मुख्य कारण मानते हैं। वे चिकित्सा जगत में वर्तमान व्यापारिक मनोवृत्ति के भी सख्त विरोधी हैं। कई अस्पतालों में 'वेन्टीलेटर' के दुरुपयोग को भी वे बहुत ही गलत करार देते हैं। उनका कहना है कि किसी भी चिकित्सक को नैतिकता और ईमानदारी के साथ लोगों की सेवा करनी चाहिए। मेडिकल कॉलेज, अमृतसर से एम.बी.बी.एस. करने के बाद उन्होंने 1963 में एम्स, नई दिल्ली से ई.एन.टी. सर्जरी में एम.एस. की डिग्री प्राप्त की। 1971 में उन्होंने यूरोप के प्राचीनतम ट्यूबिग विश्वविद्यालय से ई.एन.टी. सर्जरी में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके लिए उन्हें पश्चिमी जर्मनी की सरकार ने छात्रवृत्ति दी थी। डॉ. सागर कहते हैं कि समाज का ऋण सबसे बड़ा ऋण है। इससे उऋण होने में ही जीवन की सार्थकता है। यही कारण है कि वे इस उम्र में भी समाज की सेवा कर रहे हैं।