मरीजों के लिए फरिश्ता हैं यह डॉक्टर
   दिनांक 05-नवंबर-2018
                                                                                                                                   - रिजवाना नियामतुल्लाह
 
नई दिल्ली के होली फैमिली अस्पताल के कैजुअल्टी वार्ड में हमेशा की तरह इमरजेंसी में मरीज आ रहे थे। शाम को पांच बजे एक व्यक्ति अपनी पत्नी और बच्चों के साथ अंदर आया और एक बेड पर लेट गया। उसे दिल का दौरा पड़ा था। इमरजेंसी वार्ड में मौजूद नर्स ने उसकी पत्नी से स्थिति के बारे में मालूम करके उसके सीने, हाथ-पैर में सेंसर वाले तार से बेड के ऊपर लगे मॉनिटर को जोड़ दिया। तभी कुछ कुछ ही क्षणों में सारी रेखाएं बराबर होने लगीं। नर्स समझ गई कि दिल की धड़कन रुक चुकी है। वह उस युवक का चेहरा ढकने की तैयारी कर रही थी। इस पूरे घटनाक्रम को सामने बैठा एक युवा डॉक्टर देख रहा था। डॉक्टर को लगा कि शायद अभी भी कुछ किया जा सकता है। वह उस व्यक्ति के नन्हे बच्चों और पत्नी के बारे में यह सोच रहा था कि आखिर वह उनके सामने वह कैसे बताएगा कि वह युवक नहीं रहा।
डॉक्टर ने उस युवक के सीने पर दोनों हथेली रखकर उसे पूरी जोर से दबाना (रिसक्सिटेशन) शुरू किया। करीब आधे घंटे में वह पसीने-पसीने हो गया। फिर भी उसके हिम्मत नहीं हारी। उस युवक को शॉक दिया गया। यह सिलसिला करीब डेढ़ घंटे तक चला। डॉक्टर की मेहनत रंग लाई, मॉनिटर पर फिर से रेखाएं ऊपर-नीचे होने लगीं, मानो उस डॉक्टर ने उसे यमदूत के पंजे से छुड़ा लिया था, आॅपरेशन के कुछ दिनों बाद वह व्यक्ति अपने परिवार के साथ उस युवा डॉक्टर के प्रति अपनी कृतज्ञता जताने आया।
यह युवा डॉक्टर थे डॉक्टर पुष्पेंद्र नारायण (पी.एन.) सिंह, जो अब उसी अस्पताल के क्रिटिकल केयर यूनिट के प्रमुख और सीनियर कंसल्टेंट फिजीशियन हैं। रीवां, मध्य प्रदेश में 11 अगस्त, 1973 को जन्मे डॉ. सिंह की मां लक्ष्मी सिंह हैं और पिता श्री प्रभुनाथ सिंह कैमिकल इंजीनियर हैं। चार भाई-बहनों में सबसे बड़े डॉ. पी.एन. सिंह ने अपनी शुरुआती शिक्षा मुख्यत: मध्य प्रदेश में हासिल की। उनके पिता ने देश-दुनिया की विभिन्न चीनी मिलों में सलाहकार के तौर पर काम किया। इसके चलते डॉक्टर सिंह को कम उम्र में अफ्रीका और यूरोप के बड़े हिस्सों घूमने का मौका मिला। वे शुरू से ही डॉक्टरी करना चाहते थे और उन्होंने सेंट पीटर्सबर्ग स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी (रूस) से पढ़ाई की। 1997 में डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने जबलपुर के नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज, नई दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय हॉस्पिटल, संजय नर्सिंग होम और सेंट्रल जेल हॉस्पिटल में काम करना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने होली फैमिली अस्पताल में रहते हुए तीन साल का पोस्ट ग्रेजुएशन (डीएनबी) कोर्स किया और मेडवर्सिटी ऐंड अपोलो हॉस्पिटल्स एजुकेशनल ऐंड रिसर्च फाउंडेशन से क्रिटिकल केयर में फेलोशिप ट्रेनिंग की।
आज इस 45 वर्षीय डॉक्टर के पास उत्तरी भारत के विभिन्न प्रदेशों से मरीज आते हैं लेकिन उनकी विनम्रता देखिए, ‘‘मैं लोगों की क्या मदद कर सकता हूं। मुझे तो इसके अलावा कुछ आता भी नहीं है।’ पूर्वी चंपारण से आकर उनसे अपना नियमित चैक-अप कराने वाली 56 वर्षीया ह्दय और मधुमेह रोगी सीमा का कहना है, ‘‘उनके हाथ में ईश्वर ने शिफा बख्शी है। कई जगह दिखाने के बाद आखिरकार मुझे कायदे का डॉक्टर मिल गया। पहली बार देखने पर वे बहुत देर तक सवाल पूछते हैं और फिर नुस्खा लिखते हैं।’’ डॉ. सिंह कई बार अपने मरीजों को मामूली दवा और सलाह देकर घर भेज देते हैं, जिस पर अमल से कई लोगों को काफी फायदा हुआ। फिरोजाबाद के इशरत खान के परिवार वालों को मधुमेह की शिकायत है और आज उनके सारे रिश्तेदार डॉ. सिंह को ही दिखाते हैं। कतर में काम करने वाले बिहार के मोतिहारी निवासी शकील अहमद और उनकी पत्नी मुमताज सलमा साल में एक बार स्वदेश आते हैं और आने से पहले ही डॉ. सिंह से अप्वाइंटमेंट ले लेते हैं। अभी स्थिति यह है कि अहमद के भाई-बहन सभी डॉक्टर सिंह के मरीज और मुरीद, दोनों हैं। इसी तरह बनारस और मथुरा के कुछ मरीज खासकर उन्हें ही दिखाने के लिए दिल्ली आते हैं।
डॉ. सिंह की ईमानदारी पर खुद डॉक्टरों को भी भरोसा है। पूर्वी चंपारण के ढाका में करीब 40 साल से प्रैक्टिस करने वाले 75 वर्षीय डॉ. सगीर अहमद करीब तीन साल सलाह के लिए डॉ. सिंह से मिले। तब दिल का इलाज करवा रहे डॉ. अहमद अपने जूनियर हमपेशा की सलाह सुनकर बोल पड़े, ‘‘हमारे पेशे में आप जैसे लोग बहुत कम हैं और यह किसी तमगे से कम नहीं है। डॉ. सिंह अपने मरीजों की मदद करने की हर संभव कोशिश करते हैं। वे अपने सहकर्मियों से नियमित बात करते हैं और कई बार बुजुर्ग विशेषज्ञों से भी मिलने की सलाह देते हैं।