दर्द बांटा, दुआ मिली : गांवों में जाकर करते हैं चिकित्सा
   दिनांक 05-नवंबर-2018
 
आज दिल्ली जैसे शहर में डॉक्टरों और अस्पतालों की भरमार है। यहां एक से एक ऊंची फीस वाले 'स्पेशलिस्ट' डॉक्टर और महंगी से महंगी जांच का ऐसा मकड़जाल है कि मरीज जितना बीमारी से नहीं घबराता, उससे ज्यादा उसकी सांस खर्चे के बारे में सोच-सोचकर उखड़ने लगती है। 500 रु. तो मामूली फीस है किसी ठीक-ठाक डॉक्टर की यहां। लेकिन ऐसे में भी कुछ जाने-माने डॉक्टर हैं, जो इस पेशे की 'मानव सेवा सर्वप्रथम' की शपथ भूलते नहीं हैं और इस काम का पहला उद्देश्य हमेशा उनके मन के किसी कोने में जगमगाता रहता है।
डॉक्टर आर. के. कपूर यानी डॉ. राज कुमार कपूूर इन्हीं कुछ धुन के पक्के डॉक्टरों में हैं। 1979 में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज यानी एम्स से डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद हर युवा डॉक्टर की तरह उनके मन में भी नई उम्मीदें और नए अरमान उछाल मार रहे थे। लेकिन रामकृष्ण पुरम में अपने बड़े भाई के साथ रहते हुए डॉ. कपूर इनके एक दोस्त के कहने पर आखिरकार तब 1981 में पिछड़ी जगह माने जाने वाले मुनीरका गांव में गरीब मरीजों के इलाज के लिए आ डटे। शहरी इलाके से उलट वे यहां बड़ी मामूली फीस पर इलाज करने लगे। क्लिनिक के लिए किसी ने जगह दे दी और बस चल निकली डॉक्टरी। इलाज भी सस्ता और अचूक मिला तो मरीजों की संख्या बढ़ने लगी। डॉक्टर कपूर ने एक पैथ लैब खोली और छोटी-मोटी जांच वहीं करने लगे। गांव वालों को भी जांच-एक्स रे के लिए दूर और महंगी लैब में नहीं जाना पड़ा। पास ही एक इमारत मिली तो छोटा-सा अस्पताल भी शुरू हो गया।
 
डॉ. कपूर का नाम इतना फैल गया कि लोग इस अस्पताल को 'डॉक्टर कपूर का अस्पताल' कहने लगे। कम फीस पर इलाज का सिलसिला यूं ही बढ़ता गया। और फिर 1994 में डॉक्टर कपूर ने अपनी दिवंगत माताजी की याद में एक ट्रस्ट, दया मेमोरियल ट्रस्ट की नींव डाली। उसके जरिए क्या करना है, कैसे करना है, यह सब उतने विस्तार से तो नहीं सोचा था, बस इतना जानते थे कि लोगों की सेवा करनी है। शायद इसीलिए ट्रस्ट का सूत्रवाक्य रखा गया-''सहायता के दो हाथ, कमजोर हाथों के साथ''। लेकिन डॉक्टरी में उनका इतना समय चला जाता था कि ट्रस्ट के लिए चीजें साधते और योजना बनाते-बनाते एक अरसा बीत गया। फिर सेवाभावियों की टीम जोड़ी गई, अन्य चिकित्सकों को शामिल किया गया और आखिरकार 2004 में योजना ने मूर्त रूप लिया।
इस समय तक भारत के सुदूर देहाती इलाकों में इलाज सहज सुलभ नहीं था। ज्यादातर गांव चिकित्सा सुविधाओं से अछूते थे। निकटतम अस्पताल या डॉक्टर तक पहंुचने के लिए उन्हें मीलों सफर करना पड़ता था। देवयोग से डॉक्टर कपूर के पास एक मरीज इलाज कराने आया। वह मूलत: रीवां (मध्य प्रदेश) के एक सुदूर गांव से था। इलाज के दौरान उसने अपने गांव की बदहाली और चिकित्सा सुविधा की घोर कमी की विस्तार से जानकारी दी। भावुक हृदय डॉक्टर कपूर यह सुनकर चिंता में पड़ गए। उन्होंने सुना तो था कि गांव के लोगों की डॉक्टरों तक पहंुच नहीं है, लेकिन उस आदमी के मुंह से सुनी बातें आंखें खोलने वाली थीं। और इससे एक शुरुआत हुई। एक कल्याणकारी अभियान की। तय हुआ कि वे सुदूर देहातों में अपने बूते दो से तीन दिन के चिकित्सा शिविर लगाएंगे और जरूरतमंद ग्रामीणों को बुनियादी इलाज और दवाएं उपलब्ध कराएंगे। दिल्ली स्थित प्रिंटिंग कंपनी 'मल्टीप्लैक्स' ने सहयोग का हाथ बढ़ाया और साथ मिला एक टीम का, जिसमें एक ह्रदय रोग विशेषज्ञ, एक स्त्री रोग विशेषज्ञ, एक जनरल फिजीशियन, एक नेत्र विशेषज्ञ हैं और है सहायकों का दल।
डॉ. कपूर यादों को खंगालते हुए बताते हैं,''बड़ा कठिन दौर था वो। सबको साथ लेना, स्थान की तलाश करना! डॉक्टरी के उपकरण और दवाओं के डिब्बे लेकर रेल से हम लोग कैसे रीवां पहंुचे, इसे हम ही जानते हैं। और रीवां स्टेशन पर उतरकर दिन ढले वहां शहर से डेढ़-दो घंटे की दूरी पर स्थित गांव तक पहंुचने के लिए कच्चे रास्ते से गुजरना। तीन दिन का शिविर लगाया हमने और इस दौरान देखा कि वहां के लोगों को बहुत मामूली सी दवाएं भी नहीं मिल पाती थीं। हमें जहां ठहरने की जगह मिली थी, वहां शौचालय तक नहीं था। लेकिन इतने पर भी सेवा का आनंद था। एक तसल्ली थी कि डाक्टरी की पढ़ाई सही जगह काम आ रही है। स्थानीय लोगों ने जितना हुआ, मदद की पर फिर भी कष्टों के बीच पूरी टीम उत्साह से जुटी रही।''
 
आखिर क्यों इस अभियान की शुरुआत डॉ. कपूर ने? वे चाहते तो अपने क्लिनिक में बैठे-बैठे ही और डॉक्टरों की तरह पैसा कूटते रहते। तीन दिन की कमाई भी गंवाई और शरीरिक-मानसिक मशक्कत भी की। लेकिन कुछ था, जिसने उनमें ऊर्जा भरी थी और ऐसी ऊर्जा भरी कि उसके बाद हर साल किसी न किसी सुदूर ग्रामीण इलाके में जाकर गांव वालों के बीच रहकर उनकी तीमारदारी में रम गए। वे अब तक 10 से ज्यादा चिकित्सा शिविर लगा चुके हैं ट्रस्ट की तरफ से, जिनमें से हर शिविर में डॉ. कपूर खुद मौजूद रहकर लोगों का इलाज करते हैं। इनमें प्रमुख हैं, रीवां, झाबुआ (मध्य प्रदेश), अल्मोड़ा, रुद्रप्रयाग, टिहरी गढ़वाल (उत्तराखण्ड) और नागौर (राजस्थान) के शिविर। अल्मोड़ा के सराईखेत में तो डॉ. कपूर ने पूरे गांव को हीपैटाइटिस-बी के तीनों टीके विशेष अंतराल के बाद लगाए थे, जिसके लिए जिलाधिकारी और गांव के सरपंच ने उनके सेवा-भाव की जी खोलकर तारीफ की। आंकड़ों की बात करें तो हर शिविर से 3-4 हजार लोगों का भला होता है, दवाओं वगैरह पर 2 से 3 लाख रुपए का खर्च आता है जिसे डॉ. कपूर और मल्टीप्लैक्स कंपनी जैसे दानदाता मिलकर उठाते हैं। पर सरकार से कोई सहायता नहीं लेते। यह दास्तान सुनाते-सुनाते डॉ. कपूर चेहरे पर गर्व के भाव के साथ बोले, ''मेरा बेटा और बेटी भी सेवा के इस काम में मेरी मदद करते हैं। अपने-अपने काम से दो-चार दिन छुट्टी लेकर दोनों कैम्प में जाते हैं।'' बता दें कि डॉ. कपूर के सुपुत्र भी डॉक्टर हैं और बेटी भी डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही है। पिता के लिए सच में यह गर्व की ही बात है।
गांवों में चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने के इस अभियान के साथ ही डॉक्टर कपूर अब 'रूरल इंडिया मेडिकल क्लिनिक' यानी आरआईएमसी मिशन की शुरुआत करने को लेकर गंभीर हैं। सरकार का सहयोग मिला तो आगामी मार्च में उनका पहला आरआईएमसी काम करने लगेगा। यह मिशन क्या है, इस सवाल पर डॉक्टर कपूर का कहना था, ''हमारा मिशन है उन गांवों में एक स्थायी क्लिनिक बनाकर डॉक्टर उपलब्ध कराना जहां दूर-दूर तक बुनियादी चिकित्सा का अभाव है। क्लिनिक में जरूरी दवाएं, छोटी-मोटी जांच के लिए उपकरण, एक्स-रे मशीन और दूसरी आवश्यक सुविधाएं रहेंगी। गांव वालों का इलाज नि:शुल्क किया जाएगा। विशेषज्ञ डॉक्टर की जरूरत होने पर उसकी भी व्यवस्था की जाएगी।'' एक आरआईएमसी केन्द्र का एक साल का खर्च 12 लाख रु. के आस-पास बैठेगा। बेशक, समाज के साथ के बिना कोई भी मिशन सफल नहीं हो सकता। चिकित्सा के क्षेत्र में सेवा करने के इच्छुक लोग प्रायोजक के नाते इस मिशन से जुड़ सकते हैं। मुनीरका गांव में डॉ. आर. के. कपूर के क्लिनिक से निकलते हुए दिमाग में बस यही घूम रहा था कि जाने किस मिट्टी के बने होते हैं डॉ. कपूर जैसे लोग, जो घर और काम के तनाव के बीच भी समाज के हाशिए पर रह रहे अंतिम व्यक्ति के भले के लिए वक्त निकाल लेते हैं!