सृष्टि दिखाने वाली डॉ. सीमा
   दिनांक 05-नवंबर-2018
                                                                                                                                        - रिजवाना नियामतुल्लाह              
 
‘नमस्कार, मुझे अपने मित्र के पिता जी की आंख दिखानी है।’ दूसरी तरफ से आवाज आती है, ‘‘नमस्कार मैडम, कहां दिखाना चाहते हैं? फाइव स्टार में या ढाबे में?’’ चुलबुली और हंसमुख युवा आॅप्थेलोमॉलोजिस्ट (नेत्ररोग विशेषज्ञ) डॉ. सीमा राज चहकते हुए कहती हैं कि दोनों की अपनी विशेषताएं हैं। पहले से तय वक्त के मुताबिक, शाम को मरीज दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के एक क्लिनिक में पहुंचते हैं। वहां डॉक्टर की कुर्सी पर बैठी छोटे कद की एक लड़की किसी महिला मरीज से बात कर रही है। वह उसका मर्ज पूछने के बाद उसके पारिवारिक जीवन के बारे में बात करने लगती है। उस महिला ने अभी चंद रोज पहले अपनी मां की आंखों का आॅपरेशन करवाया था। वे कहती हैं, ‘‘मां ने दो साल तक कुछ नहीं देखा था और आंख से पट्टी हटने के बाद सबसे पहले डॉ. सीमा को देखा।’’ दरअसल, हरियाणा के सोनीपत में एक सामान्य परिवार में पली-बढ़ी सीमा बचपन से ही डॉक्टर बनना चाहती थीं और लोगों की मदद करना चाहती थीं। सीमा और उनके बड़े भाई को पुलिस हेडकांस्टेबल पिता और मां ने बेहद अनुशासित ढंग से पाला-पोसा। जब वे 14—15 साल की हुर्इं तो घर से निकलने पर भाई, मां या पिता साये की तरह उनके साथ होते थे। डॉ. सीमा बताती हैं, ‘‘मेरी मां निरक्षर थीं और उन्हें लगता था कि अगर वे पढ़ी होतीं तो पिता जी की जिम्मेदारियों को साझा कर सकती थीं।’’ उनकी मां चाहती थीं कि बेटी पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाए। दिल्ली के एक कोचिंग संस्थान में दाखिला मिलने पर वे बस से मां के साथ आती थीं और घर लौटने पर मां खाना बनाया करती थीं। मां भले ही रात में एक बजे सोतीं लेकिन अपनी बेटी को उसके कहे के मुताबिक सुबह चार बजे पढ़ने के लिए जगा देती थीं। आज एक साथ तीन अस्पतालों में काम करने वाली डॉ. सीमा कहती हैं, ‘‘मैं आज जो कुछ भी हूं 90 प्रतिशत अपनी मां की मेहनत से हूं, 10 प्रतिशत ही अपनी मेहनत से हूं।’’ दरअसल वे अपनी मां के सपनों को जी रही हैं, जो घर चलाने के लिए अपनी गाय-भैंस खुद दूहती थीं। लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने के बाद 24 साल की उम्र में ही उनकी शादी डॉ. दिनेश राज से हो गई, जो बाल रोग विशेषज्ञ हैं। इसके बाद उन्होंने मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज से नेत्र रोग विज्ञान में एमएस की डिग्री हासिल की। तभी उन्हें पहली बार अपनी जान से ज्यादा ड्यूटी की अहमियत का अंदाजा हुआ, ‘‘जोरदार बारिश हो रही थी और इमरजेंसी में सड़क दुर्घटना का एक ऐसा केस आ गया जिसकी आंखें बाहर निकल आई थीं।’’ वे बताती हैं’’ तब मैं गर्भवती थी, फिसलकर गिर भी गई, लेकिन वहां पहुंचकर उसका इलाज किया।’’ धर्मादा के बारे में वे बड़ी विनम्रता के साथ कहती हैं, ‘‘मेरे पिता कहा करते थे कि किसी गरीब का सिर्फ इलाज ही नहीं करना। अगर हो सके तो उसे घर जाने के लिए 10 रुपए भी दे देना।’’डॉ. सीमा ने अपने पिता की इस नसीहत को माना और इसे अपना उसूल बना लिया।
वे कहती हैं, ‘‘मैं हमेशा धर्मादा नहीं करती लेकिन जरूरतमंद के लिए अपने अस्पताल प्रबंधन से बात करती हूं। अपनी फीस छोड़ देती हूं। कई बार किसी जरूरतमंद के लिए अपने पैसे कटवा देती हूं।’’ वे बताती हैं कि एक मोची के बेटे का आॅपरेशन करने के लिए मैंने एनेस्थेसिस्ट को राजी किया और इंप्लांट का खर्चा खुद जुटाया और मुफ्त में आॅपरेशन कर दिया। वे यह भी कहती हैं, ‘‘मैं सेवा का काम एक क्लीनिक में करती हूं।’’ वे एक ऐसे अस्पताल का नाम बताती हैं, जो वास्तव में चैरिटेबल अस्पताल है और वे वहां सप्ताह में तीन दिन बैठती हैं, लेकिन सबसे ज्यादा वे उस क्लीनिक में सेवा को महत्व देती हैं, जहां वास्तव में कमजोर तबके के लोग आते हैं। लेकिन क्या इससे उनके पति को कोई फर्क नहीं पड़ता? वे अपने पति के बारे में बताती हैं, ‘‘उनका काम अच्छी तरह चल रहा है और घर वही चलाते हैं। मुझसे कहते हैं कि अपनी खुशी के लिए काम करो।’’ अपने पति और अपनी छह वर्षिया बेटी मीशा के साथ दिल्ली के एक अस्पताल परिसर में रहने वाली डॉ. सीमा सुबह 10 बजे तक घर से निकल जाती हैं और उनके तीनों अस्पताल घर से तीन किमी की परिधि में होने की वजह से आराम से पति और बेटी को समय देती हैं।