संघ से मिली सेवा की सीख
   दिनांक 05-नवंबर-2018
ग्रेटर नोएडा में एक आयुर्वेद का केंद्र चलाने वाले डॉ़ नितिन अग्रवाल रोगियों से कभी परामर्श शुल्क नहीं लेते। उनका कहना है जो शुल्क दे सकता है वह जरूर दे और जो नहीं दे सकता, वह बिल्कुल न दे। यह भावना उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और महर्षि महेश योगी से मिली है।
डॉ़ अग्रवाल अपने पास आने वाले रोगियों को घरेलू नुस्खे बताते हैं। यानी ऐसी चीजों से इलाज करना बताते हैं, जो हर घर में सामान्य तौर पर पाई जाती हैं। जैसे हल्दी, नमक, पानी, फिटकरी, तुलसी, फूल-पत्ती आदि। इसके पीछे उनकी मंशा है लोगों को नुक्सानदायक दवाइयों से बचाना और उन्हें आयुर्वेद की ओर लाना। वे कहते हैं, ''आयुर्वेद दुनिया की सबसे प्राचीन चिकित्सा पद्धति है और इसमें उन बीमारियों का इलाज भी संभव है, जिन्हें असाध्य माना जाता है।''
अपने इसी विचार को धरातल पर उतारने के लिए 1995 में हरिद्वार से बी़ ए़ एम़ एस. करने के बाद वे महेश योगी के साथ जुड़ गए। उन दिनों महेश योगी यूरोप के अनेक देशों के अलावा अमेरिका, रूस जैसे देशों में अपने शिष्यों के साथ आयुर्वेद और भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर रहे थे। डॉ़ नीतिन भी उनके शिष्य बने और विदेशों में आयुर्वेद का प्रचार करने लगे। प्रचार का सरल साधन था नि:शुल्क आयुर्वेदिक चिकित्सा शिविर और संगोष्ठी का आयोजन करना। डॉ़ नितिन ने मामूली मानधन पर लगातार आठ वर्ष तक यही कार्य किया। जो लोग शिविरों में आते थे उनका इलाज तो वे करते ही थे, साथ ही उन्हें आयुर्वेद की गहरी जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रेरित भी करते थे। इसका जबर्दस्त असर हुआ। उनकी प्रेरणा से आज करीब 500 विदेशी, जिनमें कई एलोपैथ और कायरोपेक्टर (स्नायु दर्द नियंत्रक और हड्डी बैठाने वाले चिकित्सक) के चिकित्सक हैं, आयुर्वेद की पढ़ाई करके आयुर्वेद के केंद्र चला रहे हैं। इससे भारत को अनेक तरह से लाभ हो रहा है। एक, दुनिया आयुर्वेद की ताकत से परिचित हो रही है। दूसरा, भारत को बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा मिल रही है, क्योंकि उन देशों में जो भी आयुर्वेदिक दवाइयां जाती हैं, वे भारत में ही बनती हैं। और तीसरा, आयुर्वेदिक इलाज के लिए प्रतिवर्ष हजारों विदेशी भारत आ रहे हैं।
डॉ़ नितिन ग्रेटर नोएडा में ही एक पंचकर्म केंद्र भी चलाते हैं। यहां से अनेक विदेशी पंचकर्म का प्रशिक्षण और इलाज दोनों लेते हैं। डॉ़ नितिन कहते हैं कि आयुर्वेद और योग के कारण ही भारत कभी विश्व गुरु कहलाता था। अब भी यदि भारत उस स्थान को पाना चाहता है तो उसे आयुर्वेद और योग को दुनिया में बढ़ाना ही होगा।