शरणार्थी से बने सेवक
   दिनांक 05-नवंबर-2018
कुछ लोग जन्म से ही महान होते हैं और कुछ लोग अपने कमार्ें से महानता को प्राप्त करते हैं। फरीदाबाद के डॉ़ रोमेश रैना अपने कमार्ें से महान बने हैं। वे अशोका एन्कलेव, सेक्टर-34, फरीदाबाद में 'रैनाज क्लिनिक' चलाते हैं। वे प्रतिदिन 20 मरीज देखते हैं, जिनमें ज्यादातर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले हैं। इन सबसे कभी वे किसी तरह का शुल्क नहीं लेते। यही नहीं, दवाई कंपनियों के प्रतिनिधि (एम.आर.) जो दवाइयां दे जाते हैं, उन्हें भी वे ऐसे मरीजों को दे देते हैं। उनकी इस सेवा के पीछे एक दर्दनाक कहानी है। उल्लेखनीय है कि डॉ़ रैना मूलत: श्रीनगर के रहने वाले हैं। '90 के दशक में आतंकवादियों के कारण लाखों हिंदुओं को जान बचाने के लिए कश्मीर घाटी से पलायन करना पड़ा था। उनमें डॉ़ रैना भी शामिल थे।
उन दिनों वे श्रीनगर में सरकारी चिकित्सा अधिकारी थे। 1990 में एक दिन उन्हें अपना पुश्तैनी घर-द्वार और जमीन-जायदाद छोड़कर दिल्ली आना पड़ा। यहां दूसरे हिंदू शरणार्थियों की तरह उन्हें भी शरणार्थी शिविर में रहना पड़ा। शिविर में लोगों की दुर्गति देखकर उन्हें एहसास हुआ कि गरीबी क्या होती है! भूख-प्यास से परेशान और बुखार से तड़प रहे लोगों को देखकर उनका मन विचलित हो गया। उन्हें खुद कई दिनों तक भर पेट खाना नहीं मिला। उनकी माली हालत तब ठीक हुई जब जम्मू-कश्मीर सरकार ने उनकी तनख्वाह दिल्ली भेजनी शुरू की, लेकिन ज्यादातर शरणार्थी तो जैसे-तैसे गुजारा करने को मजबूर थे। ऐसे में यदि कोई बीमार हो जाता था तो पूरे परिवार की हालत खराब हो जाती थी।
अपने शरणार्थी बंधुओं की ऐसी दुर्दशा देखकर उन्होंने उनकी चिकित्सकीय सेवा करने का व्रत लिया। दिल्ली में जहां भी शरणार्थी रह रहे थे, वहां उन्होंने चिकित्सा शिविर लगाना शुरू किया। जिसको किसी अस्पताल में ले जाना जरूरी होता था, उसे वे अस्पताल ले जाते थे। अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा वे इसी कार्य में लगा देते। बाद में किसी ने उन्हें दिल्ली के मदनगीर इलाके में एक छोटा-सा कमरा उपलब्ध कराया। उसी में वे बीमार शरणार्थियों और अन्य मरीजों का इलाज करने लगे। 2002 मे वे फरीदाबाद चले गए। वहां भी वे सेवा के इस व्रत का निरंतर पालन कर रहे हैं। वे कहते हैं, ''किसी की सेवा करने से जो संतुष्टि मिलती है, वह और किसी चीज से नहीं मिल सकती है। मैं जब तक यह जीवन है तब तक गरीबों की सेवा करता रहूंगा।'' डॉ़ रैना यह भी कहते हैं कि हर किसी को अपने आसपास के जरूरतमंद लोगां की सेवा करनी चाहिए। ऐसा करने से ही समाज एकजुट और समरस होगा।