मीडिया में घर कर चुका नक्सलवादी प्रभाव उसके असली चेहरे को उजागर कर रहा है
   दिनांक 06-नवंबर-2018
प्रेस की आजादी और पत्रकारों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मुखर दिखने वाले कुछ तथाकथित बड़े पत्रकारों का असली चेहरा एक बार फिर से देखने को मिला, जब छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में एक नक्सली हमले के दौरान दूरदर्शन के कैमरामैन की जान चली गई। दिल्ली में मीडिया के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाली तमाम संस्थाओं को मानो सांप सूंघ गया।
इस स्तंभ में हम अक्सर आपको बताते रहते हैं कि नक्सलवाद की जड़ें मीडिया में काफी गहरी हैं। यही कारण है कि तमाम मीडिया संस्थाएं नक्सलियों के इस बर्बर कृत्य का खुलकर विरोध नहीं कर पाईं। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने जो बयान जारी किया उसमें शहीद पत्रकार का नाम छिपाया गया और इसका ध्यान रखा गया कि हत्यारों के लिए ऐसा कोई शब्द इस्तेमाल न हो जिससे वे नाराज हो जाएं। यह निशानी है कि देश के कई पत्रकार और संपादक नक्सलवादी तंत्र का हिस्सा हैं।
मीडिया में माओवादी प्रभाव का सच तो तभी सामने आ चुका था जब प्रधानमंत्री की हत्या का षड्यंत्र सामने आया था। बीते सप्ताह आरोपी शहरी नक्सलियों को पुणे पुलिस ने औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया तब भी चैनलों और अखबारों ने उनके लिए 'सामाजिक कार्यकर्ता' और 'मानवाधिकार कार्यकर्ता' जैसे विशेषण प्रयोग करना जारी रखा। यह हालत तब है जब अदालत में पुलिस ने वे सारे तथ्य सार्वजनिक कर दिए हैं, जिनके आधार पर इन षड्यंत्रकारियों को पकड़ा गया है। उधर केरल में शबरीमला मंदिर के भक्तों पर वामपंथी पुलिस का अत्याचार जारी है। हजारों लोगों पर मुकदमे बनाकर उन्हें गिरफ्तार किया गया, लेकिन देश का कथित निष्पक्ष मीडिया कान में तेल डाले रहा। ऐसी ही पुलिसिया कार्रवाई किसी गैर-वामपंथी राज्य में होती तो यह सबसे बड़ी खबर बन चुकी होती। मीडिया का यही वह वर्ग है जो देश को एकजुट करने वाले किसी महापुरुष की प्रतिमा स्थापित होने से तिलमिला जाता है।
जांच एजेंसी सीबीआई का विवाद भी बीते दिनों सुर्खियों में रहा। इस पूरे मामले की कवरेज में मीडिया खास तौर पर कुछ पत्रकारों की भूमिका बेहद संदिग्ध रही। मीडिया की उड़ाई कई खबरें झूठी साबित हुई। जाहिर है, ये किसी एक पक्ष की तरफ से दूसरे पक्ष को नीचा दिखाने की नीयत से फैलाई गई होंगी। दैनिक भास्कर ने छापा कि विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने सूरत में अपनी तैनाती के दौरान पुलिस कोष से भाजपा को 20 करोड़ रुपये दिलवाए थे। यह एक मनगढ़ंत रिपोर्ट थी जिसके पीछे अखबार के प्रबंधन का हाथ माना जा रहा है। यही झूठी खबर मुंबई मिरर समेत कुछ दूसरे अखबारों में भी दिखी। आश्चर्य है कि सूरत पुलिस के खंडन के बाद भी इन तमाम मीडिया समूहों ने कोई खेद जताने या भूल सुधार की जरूरत नहीं समझी। इस मामले के दौरान नियमित सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात खुफिया ब्यूरो के कर्मचारियों को लेकर भी कुछ विवाद हुआ। टीवी चैनलों ने उनके चेहरों को पूरे दिन दिखाया और अखबारों ने भी अगले दिन पहले पन्ने पर छापा। बिना यह सोचे कि उनके ऐसा करने से दिल्ली के इस वीवीआईपी इलाके की सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है।
बीते हफ्ते 'आधार' को लेकर मीडिया में चल रहे एक खेल का खुलासा हुआ। आपको ध्यान होगा कि कुछ समय पहले 'आधार' से लोगों का डेटा लीक होने को लेकर मीडिया में खूब हंगामा मचा था। इस व्यवस्था को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती भी दी गई थी। अदालत ने 'आधार' के कुछ प्रयोगों पर पाबंदी भी लगा दी है। अब दुनिया की नामी डिजिटल सिक्योरिटी कंपनी गेमाल्टो ने 'आधार' पर दी अपनी फर्जी रिपोर्ट के लिए माफी मांगी है। इससे पता चलता है कि 'आधार' को लेकर लोगों ने मन में जान-बूझकर भ्रम फैलाया गया था। हर नागरिक की पहचान के नंबर की यह व्यवस्था शायद घुसपैठियों और आतंकवादियों के मददगारों को खटक रही थी, लिहाजा उन्होंने अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ मिलकर यह दुष्प्रचार फैलाया। भारतीय मीडिया का एक बड़ा वर्ग जाने-अनजाने इस षड्यंत्र का हिस्सा बना हुआ था। क्या यह मीडिया की स्वयंभू नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है कि वे यह तय करें कि कोई चैनल या अखबार इस तरह से राष्ट्रीय हितों के साथ खिलवाड़ न कर सके?