क्या छत्तीसगढ़ में भाजपा के सामने एजेंडा विहीन है कांग्रेस!
   दिनांक 06-नवंबर-2018
      
 बीजापुर जिले में वनवासी समाज की महिला को चरण पादुका पहनाते श्री नरेंद्र मोदी। मंच पर जनता का अभिनंदन करते रमन सिंह
छत्तीसगढ़ के चुनाव अभियान के बीच 30 अक्तूबर को एक बार फिर नक्सलियों का दुर्दांत चेहरा देखने को मिला। राज्य के दंतेवाड़ा जिले से तीस किमी. दूर घात लगा कर किये गए नक्सली हमले में यहां सीआरपीएफ के दो जवान शहीद हो गए वहीं चुनाव कवरेज करने गए दूरदर्शन के छायाकार को मृत्यु का वरण करना पड़ा। लेकिन राजनीति करने वाले ऐसे हमलों पर भी राजनीति करने से नहीं चूके। इसे राजनीति का गिरता स्तर ही कहेंगे कि जब शहीद जवानों के क्षत-विक्षत शवों का उठाया जाना भी बाकी था कि कांग्रेस ने इस पर राजनीति शुरू करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की आलोचना शुरू कर दी, जिसका जवाब देते हुए भाजपा ने कांग्रेस को नक्सल समस्याओं की जननी बताया। भाजपा ने एक प्रेस वार्ता कर राहुल गांधी द्वारा शहरी नक्सलियों के पक्ष में खड़े होने का ट्वीट जारी कर उन पर सवाल खड़ा किया तो कुछ ही समय पहले राज्य के ही बिलासपुर में राहुल द्वारा नक्सलियों को दी गई कथित क्लीन चिट को मुद्दा बनाया।
भाजपा का कहना था कि जिस समय नक्सलबाड़ी में इस आतंक ने पैर फैलाने शुरू किये तब वहां कांग्रेस की सरकार थी। यही वह समय था जब आन्ध्र प्रदेश के रास्ते नक्सली तब के मध्य प्रदेश के बस्तर अंचल में प्रविष्ट हुए। तब इन दोनों प्रदेशों में कांग्रेस सत्ता में थी। यहां तक कि छत्तीसगढ़ का गठन होने के समय भी सबसे पहले कांग्रेस की अजीत जोगी सरकार थी, जिनकी नक्सलियों से कथित संलिप्तता की बात कांग्रेसी ही जब-तब करते रहते हैं।
सच चाहे जो हो लेकिन ऐन चुनाव के समय जहां राजनीतिक दलों से यह उम्मीद होती है कि वे लोक सरोकारों से जुड़े विषयों पर विमर्श कर अपना एजेंडे तय करेंगे, वहीं छत्तीसगढ़ की आबोहवा में कभी नक्सल, अश्लील सीडी, टिकट बेचने की बातें, हवाला आदि चीजें ही तैर रही हैं। प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता शिवरतन शर्मा कहते हैं,''वास्तव में कांग्रेस अब विपक्ष के लायक भी नहीं रह गयी है। भाजपा 15 वर्ष सत्ता में रहने के बावजूद गांव-गरीब-किसानों के कार्यों को चुनाव विषय बनाना चाहती है लेकिन कांग्रेस के पास मुद्दों का भीषण अकाल है। इधर कांग्रेस का सारा चुनाव अभियान बस ट्विटर और फेसबुक पर पूछे गए सवालों तक सीमित रह गया है।'' बहरहाल कांग्रेस जैसे ही राज्य में भाजपा पर हमलावर होने को होती है वैसे ही राहुल गांधी कुछ ऐसा कर देते हैं कि चहुंओर न केवल राहुल गांधी बल्कि कांग्रेस ही हास्य का पात्र बनकर रह जाती है। चुनावी बयार में राज्य में राहुल गांधी की एक-दो सभाएं जरूर हुईं लेकिन कभी वे भेल से मोबाइल बनाने की बात कह लोगों के हास्य का पात्र बनते दिखाई दे रहे हैं तो कभी पड़ोस में एचएएल से लड़ाकू विमान बनाने लगते हैं।
लेकिन इसके उलट भाजपा के पास अपने पंद्रह वर्ष के शासन में गिनाने लायक विकास की काफी योजनाएं हैं, जिसकी प्रासंगिकता और उपादेयता पर बातें कर आलोचना करने का मौका कांग्रेस के पास था, लेकिन वह लगातार उसे छोड़ती जा रही है। ऐसा लगता है मानों खुद कांग्रेस ने इस बात को मान लिया है कि रोजी-रोजगार और विकास आदि के मुद्दे पर वह भाजपा से पार नहीं पा सकती। ऐसे में कांग्रेस का सारा ध्यान केवल सनसनी पैदा करने वाली चीजों पर ही रह गया है।
सीबीआई द्वारा आरोपी घोषित कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल से नाराज राष्ट्रीय नेतृत्व ने चुनाव अभियान की कमान उनके हाथ से लेकर सात सदस्यीय कोर समिति को सौंपकर राज्य कांग्रेस की हकीकत सामने ला दी है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने हाल के रायपुर प्रवास में बघेल से कतराते देखे गए। स्थानीय पत्रकार हेमंत पाणिग्रही कांग्रेस की स्थिति पर कहते हैं,''अगर कांग्रेस नेतृत्व वास्तव में प्रदेश अध्यक्ष को दोषी समझता है तो उसे कोई और बड़ा सन्देश देना चाहिए था। शायद पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन कर वह ऐसा कर सकती थी लेकिन यहां भी कांग्रेस विफल साबित हुई है।''
बहरहाल राज्य कांग्रेस की हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेसी अभी न तो कोई बड़ी सभा कर पाए हैं और न ही बड़ी संख्या में टिकट घोषित कर पाने में सफल हुए हैं। लेकिन इसके उलट अजीत जोगी का प्रदर्शन कांग्रेस से कुछ बेहतर नजर आ रहा है। प्रदेश में वह तीसरी नहीं बल्कि दूसरी ताकत बन कर भी उभर आएं तो आश्चर्य की बात नहीं होगी। यह अवश्य है कि छत्तीसगढ़ जैसे संवेदनशील प्रदेश में अलगाव की हद तक किसी क्षेत्रीय दल का यूं उभरना चिंता की बात है, खासकर छत्तीसगढ़ के निर्माण के बाद जिन्होंने अजीत जोगी का शासन देखा है, वह बेहतर कल्पना कर सकते हैं ऐसे किसी दल के आगे बढ़ने से होने वाले दुष्परिणाम की। लोग अभी तक एनसीपी के कोषाध्यक्ष रहे रामावतार जग्गी की हत्या समेत अन्य मामले भूले नहीं हैं जिसमें तब के मुख्यमंत्री के बेटे मुख्य अभियुक्त थे और एक अजीब से फैसले में मुख्य अभियुक्त को छोड़ कर शेष सभी नामजदों को सजा हो गयी थी। बाद में फैसले देने वाले न्यायाधीश की एक सीडी भी आई थी जिसने सारा भंडाफोड़ कर दिया था। हालांकि बेहतर चुनाव प्रबंधन के लिए पहचानी जाने वाली भाजपा अभी एकतरफा बढ़त लेते दिख रही है। पार्टी को प्रदेश में सबसे बड़ा फायदा इस बात का मिलत़ा दिख रहा है कि यहां सत्ता और संगठन लगातार गतिशील है। आचार संहिता लागू होने से मात्र दो दिन पहले तक डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में पूरी सरकार विकास यात्रा पर थी, अटल जी के दिवंगत होने के बाद जिसका नाम 'अटल विकास यात्रा' रख दिया गया था। इसके अलावा लोक सुराज से लेकर उससे पहले भाजपा के महासम्पर्क अभियान, फिर गांव चलो, घर-घर चलो समेत अलग-अलग कार्यक्रमों के माध्यम से पार्टी हमेशा जनता के बीच में ही रही है। व्यक्तिश: संपर्क के अलावा प्रचार के सभी हाईटेक तरीके इस्तेमाल कर भाजपा अपनी बात जनता तक पहुंचाने में सफल होती दिख रही है।
अपनी जीत के प्रति छत्तीसगढ़ में भाजपा भले पूरी तरह आश्वस्त हो, लेकिन सवाल यह उठता है कि पंद्रह वर्ष तक शासन करते रहने के बाद भी ऐसा क्या करना शेष रह जाता है किसी दल के लिए उसे एक और कार्यकाल चाहिए? इसका जवाब देते हुए भाजपा सरकार के वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री एवं घोषणा पत्र समिति के संयोजक बृजमोहन अग्रवाल कहते हैं,'' साल 2003 में जब हमने सत्ता संभाली तो हमें एक खस्ताहाल और पिछड़ा प्रदेश मिला था।
पिछले पंद्रह वर्ष में हम राज्य को बीमारू से विकासशील राज्य बनाने में सफल रहे हैं। अब यह प्रदेश तेजी से विकसित हो रहे चुनिंदा राज्यों में शुमार है। लेकिन हमारी बड़ी चुनौती इस विकास को निरंतरत़ा देते की है। किसी भी विपरीत परिस्थिति में विकास का यह पहिया रुके नहीं और हम विकसित राज्यों में शुमार हों, यही हमारा लक्ष्य है। इसी लक्ष्य के लिए हम जनता का समर्थन मांगने के लिए मैदान में हैं।''
बहरहाल भाजपा के दावों और बातों में कितना दम है यह आगामी 11 दिसंबर को आने वाले परिणामों से ही पता चलेगा लेकिन इतना तय है कि भाजपा की फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती राज्य में अपने द्वारा खींची गयी लकीर से बड़ी लकीर खीचने की है। फिलहाल भाजपा के सामने एजेंडाहीन और कांग्रेस है।
चौथी बार भी भाजपा को जनादेश मिलता है तो अभी तक किये गए कार्यों से आगे जा कर ज्यादा बेहतर प्रशासन चला पाने की चुनौती को भाजपा को स्वीकार करना होगा। पर राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, क्या भाजपा बड़ी लकीर खींच पाने में सफल होगी? जवाब वक्त बताएगा।