झूठे बाने में पलता जिहाद
   दिनांक 06-नवंबर-2018
इस्लामिक गुट पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया पीएफआई के कई गुर्गे कुख्यात आतंकी संगठन आई एस आई एस में शामिल हो चुके हैं। यही नहीं, संचालकों में से अनेक पर गंभीर आरोप हैं। इसके बावजूद बहुत ही चालाकी से उस उदारवाद का आवरण चढ़ा दिया गया है। इस अंक से यथार्थ नाम से पीएफआई के कारनामों पर एक श्रृृंखला शुरू की जा रही है। प्रस्तुत है उसकी पहली कड़ी
केरल में एक रैली निकालते हुए पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के समर्थक दरअसल ये लोग अपने ऊपर लगे आरोपों को कुंद करने के लिए विभिन्न समस्याओं को लेकर धरना—प्रदर्शन करते रहते हैं 
गत कुछ बरसों से पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पी.एफ.आई.) अपने कारनामों के कारण पूरे देश में चर्चित है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह संगठन उभरते भारत के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। सामान्यत: यह संगठन मुस्लिम युवा, मुस्लिम क्षमता, मुस्लिम रणनीति, मुस्लिम कल्याण, मुस्लिम एकीकरण की बात करता है, लेकिन इसकी गतिविधियों को देखने से पता चलता है कि इसके मूल में गिरोहबंदी और हिंसा है। जानकारों का मानना है कि अब तो इसने आतंकी संगठन आई.एस.आई.एस. से भी नाता जोड़ लिया है। कुछ लोग तो इसकी तुलना आतंकवादी हाफिज सईद के संगठन जमात-उद-दावा से भी कर रहे हैं। बता दें कि जमात-उद-दावा भी मानव कल्याण की बड़ी-बड़ी बातें करता है। लेकिन हकीकत में यह लश्कर-ए-तोयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के बीज का अंकुरण केंद्र है। इसलिए पाकिस्तान सहित विश्व के अनेक देशों में इस पर प्रतिबंध लगा हुआ है।
आगे बढ़ने से पहले पी.एफ.आई. के इतिहास को जानना जरूरी है। हम सभी जानते हैं कि पाकिस्तान भारत को अपना स्थायी दुश्मन मानता है और हर पाकिस्तानी नेता यही मानता रहा है कि भारत को नुकसान पहुंचाना ही पाकिस्तान का राष्ट्रहित है। ऐसे में, एक भारत विरोधी संगठन खड़ा करने का विचार ही आखिरकार पी.एफ.आई. के रूप में सामने आया। असल में इसकी शुरुआत 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय हुई थी। भारत से हारने के बाद उसने ऑपरेशन जिब्राल्टर चलाया। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि इस रणनीति के सफल होने पर वह कश्मीर पर कब्जा कर लेगा, लेकिन उसकी रणनीति विफल होती रही और 1971 में भी भारत ने उसे बुरी तरह पीटा। इसके बाद अपने सशस्त्र बलों की क्षमता के प्रति अपने नागरिकों में विश्वास बहाल करने की खातिर पाकिस्तान '3 के' की रणनीति के साथ सामने आया। '3 के' का अर्थ है-खालिस्तान, किशनगंज और कश्मीर।
इसके बाद पाकिस्तान ने 1980 में ऑपरेशन टोपाक शुरू किया। इसका संचालन वहां की बदनाम खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज-इंटेलिजेंस (आई.एस. आई.) के हाथ में थी। भारत को हजार घाव देने के घोषित उद्देश्य से इसकी शुरुआत की गई थी। इस ऑपरेशन के तहत एक तरफ खालिस्तानी आतंकवाद को प्रोत्साहित किया गया और बाद में ऐसी ही चालें भारतीय कश्मीर और अन्य स्थानों पर आजमाई गईं। लेकिन भारतीय सुरक्षाबलों ने पाकिस्तान की हर हरकत का मुंहतोड़ जवाब दिया है और यह निरंतर जारी है। जब पाकिस्तान को यह बात समझ आ गई कि प्रत्यक्ष लड़ाई में भारत को हराना नामुमकिन है तो उसने आतंकवाद के रूप में छद्म लड़ाई शुरू की। उसने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सिमी (स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया) का इस्तेमाल किया। लेकिन भारत सरकार की कार्रवाई से सिमी सिमट गया और अब तो उसका कहीं नामोनिशान तक नहीं है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सिमी की भरपाई के लिए पी.एफ.आई. को सक्रिय किया गया है।
2010 में पी.एफ.आई. पर आरोप लगा था कि उसके संबंध सिमी से हैं। इसका राष्ट्रीय अध्यक्ष अब्दुल रहमान सिमी का राष्ट्रीय सचिव रह चुका है। इसका एक अन्य प्रमुख चेहरा अब्दुल हमीद मास्टर भी सिमी का राज्य सचिव रह चुका था। यह भी कह सकते हैं कि सिमी से जुड़े ज्यादातर कट्टरवादी अब पी.एफ.आई. के साथ हैं।
अब पी.एफ.आई. की वर्तमान हरकतों पर नजर डालें। केरल में पी.एफ.आई. की गतिविधियां प्रमाणित हो चुकी हैं। वहीं से दूसरे राज्यों में भी इसकी गतिविधियों में तेजी आई है। जहां तक इसकी कार्यशैली का सवाल है, वह खुफिया शारीरिक कक्षाएं, प्रशिक्षण शिविर, बरगलाने या मस्तिष्क परिवर्तन वाली गुप्त कक्षाएं, नेताओं के प्रशिक्षण कार्यक्रम आदि आयोजित करता है। केरल में पी.एफ.आई. का उभार 2006 में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट (एन.डी.एफ.) के वारिस के रूप में हुआ था। बाद में कर्नाटक में कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी (के.एफ.डी.) और तमिलनाडु में मन्नीथा नीति पासाराई (एम.एन.पी.) के साथ इसका विलय हो गया। अन्य राज्यों में भी, जैसे—गोवा के सिटिजन फोरम, राजस्थान की कम्युनिटी सोशल एंड एजुकेशनल सोसाइटी, पश्चिम बंगाल में नागरिक अधिकार सुरक्षा समिति, मणिपुर में लिलोंग सोशल फोरम और आंध्र प्रदेश की एसोसिएशन ऑफ सोशल जस्टिस के साथ पी.एफ.आई. का विलय कर दिया गया। इसके आनुशांगिक संगठनों में रिहैब इंडिया फाउंडेशन, इंडियन फ्रैटरनिटी फोरम, कन्फेडरेशन ऑफ मुस्लिम इंस्टीट्यूशंस इन इंडिया, मुस्लिम रिलीफ नेटवर्क (एम.आर.एन.) और सत्य सारिणी जैसे संगठन शामिल हैं।
पी.एफ.आई. ने आधिकारिक रूप से माना है कि वह मुसलमानों के लिए आरक्षण, मुसलमानों के लिए व्यक्तिगत कानून के साथ-साथ सिखों, वनवासियों और वंचितों के मुद्दों के साथ जुड़ा है। यह नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइजेशन्स (एन.सी.एच.आर.ओ.) और अन्य कथित मानवाधिकार संगठनों के साथ भी काम करता है। लेकिन उसकी ये सभी गतिविधियां अपने असली उद्देश्यों को छिपाने के लिए होती हैं। यह संगठन आर्थिक रूप से बहुत मजबूत है। वह निरंतर विभिन्न संस्थाओं और शिक्षण संस्थानों का निर्माण तथा समाचारपत्रों का प्रकाशन कर रहा है।
पी.एफ.आई. का शुरुआती संगठन एन.डी.एफ. मई, 2003 में केरल के मराड समुद्र तट पर हुए नरसंहार में शामिल था। इसके गुर्गों ने एक सार्वजनिक नल पर पेयजल को लेकर हुए विवाद में 8 हिंदू मछुआरों की हत्या कर दी थी। इस मामले में 2009 में एक विशेष अदालत ने एन.डी.एफ. के 65 गुर्गों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। 8 जून, 2011 को सुधींद्र और विग्नेश नाम के दो लड़कों का मैसूर के महाजन कॉलेज परिसर से अपहरण कर लिया गया और कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी (के.एफ.डी.) के सदस्यों ने उनकी हत्या कर दी। इन लोगों ने अपने संगठन के लिए पांच करोड़ रुपए की फिरौती मांगी थी। गिरफ्तार किए गए के.एफ.डी. गुर्गों में आदिल उर्फ आदिल पाशा, अताउल्ला खान, अमीन उर्फ सैयद अमीन, रहमान उर्फ शब्बीर रहमान, कौसर उर्फ मोहम्मद कौसर और सफीर अहमद उर्फ सफीर शामिल हैं। इनकी गिरफ्तारी के बाद कर्नाटक सरकार ने केंद्र सरकार से के.एफ.डी. पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध किया था। पी.एफ.आई. में विलय होने वाली एम.एन.पी. पर नवंबर, 1993 में चैन्ने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय पर हमला करने का आरोप लगा था। इस घटना में 11 स्वयंसेवक मारे गए थे। इसलिए पी.एफ.आई. की चालाकी को समझने और कुचलने की जरूरत है।
 
(लेखक पी.एफ.आई. पर शोध कर रहे हैं)