मध्यप्रदेश चुनाव: भ्रामक प्रचार और छद्म हिंदुत्व से क्या पार लग पाएगी कांग्रेस की नैया ?
   दिनांक 06-नवंबर-2018
- दीपक गोस्वामी, मध्य प्रदेश से                          
मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़ अंचल में भाजपा हमेशा ही मजबूत रही है। वर्तमान में भी यहां की सर्वाधिक सीटों पर भाजपा का ही कब्जा है। यहां समाज के हर तबके ने उसे स्वीकारा है। यही कारण है कि मुद्दा विहीन कांग्रेस छद्म हिंदुत्व, भ्रामक प्रचार और अंधविश्वास के सहारे अंचल में अपनी नैया पार लगाना चाहती है।
 जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज चौहान
चुनावी दृष्टि से मध्य प्रदेश छह हिस्सों में विभाजित है- विंध्य, बुंदेलखंड, ग्वालियर-चंबल, मध्य भारत, महाकौशल और मालवा-निमाड़। कहा जाता है कि प्रदेश की सत्ता का रास्ता मालवा-निमाड़ से होकर जाता है। इसका कारण है कि इस क्षेत्र में प्रदेश की सबसे अधिक लगभग तीस प्रतिशत सीटें यानी कुल 65 सीटें आती हैं। वर्तमान में क्षेत्र की 55 सीटों पर सत्तारूढ़ भाजपा का कब्जा है। 2003 से ही भाजपा क्षेत्र में कांग्रेस पर बड़ी बढ़त बनाए हुए है। इस बार भी भाजपा की पकड़ मजबूत ही दिख रही है। 1993 और 1998 के चुनावों में कांग्रेस इन सीटों पर मजबूत थी, लेकिन 2003 में दिग्विजय सरकार के कुशासन के बाद भाजपा ने बढ़त बना ली। 2008 में भी यह सिलसिला कायम रहा और उसे 40 सीटें मिलीं, लेकिन 2013 में भाजपा ने पिछले सभी रिकॉर्ड ध्वस्त करते हुए 55 सीटें अपनी झोली में डालीं। भाजपा को 49 प्रतिशत मत मिला, जबकि कांग्रेस को महज 39 प्रतिशत। इंदौर और उज्जैन जिले भी मालवा-निमाड़ का ही हिस्सा हैं और यहां भाजपा को जनता ने खुलकर अपना समर्थन दिया है। इंदौर की 9 में से 8 सीटें और उज्जैन की सभी 7 सीटें भाजपा के पास हैं। इसी तरह उज्जैन संभाग की 29 में से 28 सीटों पर और इंदौर संभाग की 20 मे से 17 सीटों पर भाजपा काबिज है।
मध्य प्रदेश में विधानसभा की 230 सीटें हैं, जिनमें 82 सीटें आरक्षित हैं। यह कुल विधानसभा सीटों का करीब 35 प्रतिशत है। लेकिन मालवा-निमाड़ में आरक्षित सीटों की संख्या 50 प्रतिशत के करीब है। इस अंचल में 65 में से 31 सीटें आरक्षित हैं, जिनमें 9 अनुसूचित जाति और 22 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इन 31 में से 24 सीटों पर भी भाजपा का ही कब्जा है, जबकि कांग्रेस के खाते में महज 6 सीटें हैं। अनुसूचित जाति की सभी 9 और अनुसूचित जनजाति की 15 सीटों पर भाजपा काबिज है।
उक्त आंकड़े कांग्रेस के आरोप को निराधार साबित करते हैं कि भाजपा सवर्णों की पार्टी है। कांग्रेस के आरोप के उलट मालवा-निमाड़ के आंकड़े यह साबित करते हैं कि भाजपा प्रदेश में हर तबके की पहली पसंद है। केंद्र में भाजपा सरकार द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति संशोधन विधेयक लाना और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा पदोन्नति में आरक्षण की वकालत करना भी कांग्रेस के लिए चिंता का सबब हो सकता है, क्योंकि एससी/एसटी बहुल इस क्षेत्र में दोनों तबकों का मतदाता भाजपा के पक्ष में खड़ा दिखता है। हालांकि इस बार आम आदमी पार्टी की तर्ज पर कर्मचारी संगठन सपाक्स ने भी विधानसभा चुनाव में खम ठोकने का फैसला किया है। कांग्रेस की शह पर सपाक्स अनारक्षित सीटों पर मतदाताओं को बरगलाने की कोशिश कर रही है, लेकिन वह खुद ही भितरघात से जूझ रहा है। सपाक्स के भी दो फाड़ होने की खबरें सामने आ रही हैं।
मंदसौर जिले की 4 में से तीन सीटें मंदसौर, मल्हारगढ़ और गरोठ भाजपा के पास हैं, जबकि सुवासरा सीट पर कांग्रेस काबिज है। कांग्रेस की कोशिश मंदसौर के किसान आंदोलन को मुद्दा बनाकर भाजपा को बैकफुट पर धकेलने की है, लेकिन शिवराज सरकार की भावांतर योजना ने उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया। भविष्य में इस योजना को केंद्र सरकार भी मॉडल के रूप में अपनाने पर विचार कर रही है। भावांतर योजना के तहत किसानों को उनकी फसलों के उचित दाम मिल रहे हैं, जिससे वे खुश हैं। यही कारण है कि किसानों को रिझाने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को कर्ज माफी की घोषणा का सहारा लेना पड़ रहा है। लेकिन वे किसानों को यह नहीं बता पा रहे हैं कि अगर प्रदेश का किसान बदहाल है तो उसकी बदहाली दूर करने के लिए कांग्रेस के पास क्या योजना है? तुर्रा यह कि वे कहते हैं कि कंपनियों किसानों से पांच रुपये किलो आलू खरीदती हैं और उससे बने चिप्स को कई गुना अधिक कीमत पर बेचती हैं। उनकी पार्टी की सरकार बनी तो किसानों के लिए इकाइयां लगाई जाएंगी ताकि वे स्वयं आलू के चिप्स बनाकर बेचें और मुनाफा कमा सकें। लाख टके का सवाल है कि वे यह योजना कांग्रेस शासित प्रदेशों में क्यों लेकर नहीं आए?
चूंकि मालवा-निमाड़ में विकास दिखता है, इसलिए कांग्रेस के पास विकास से जुड़ा कोई मुद्दा भी नहीं है इसलिए इसलिए कांग्रेस नेताओं को पार्टी की सफलता पर भी संदेह है। इसकी बानगी पिछले दिनों देखने को मिली, जब राऊ से कांग्रेस विधायक जीतू पटवारी जनसंपर्क के दौरान कहते नजर आये, ''पार्टी जाए तेल लेने, मेरा ख्याल रखना।'' कांग्रेस में बेचैनी का आलम यह है कि उसके पास मुद्दे ही नहीं हैं। हाल ही में दो दिवसीय मालवा-निमाड़ दौरे पर पहुंचे राहुल गांधी कांग्रेस के लिए जमीन तैयार करने के चक्कर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पुत्र कार्तिकेय का नाम पनामा पेपर्स मामले में ले बैठे। जब मुख्यमंत्री ने मानहानि का मुकदमा करने की धमकी दी तो वे अपने बयान से पलट गए और कहा कि उन्होंने 'कन्फ्यूजन' में उनके बेटे का नाम लिया था। कुल मिलाकर भाजपा के गढ़ मालवा-निमाड़ में कांग्रेस केवल भ्रामक प्रचार के सहारे ही सत्ता में आने की उम्मीद लगाए बैठी है।
इसी तरह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ तथा कांग्रेस चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ जब राहुल गांधी इंदौर में रोड शो के लिए निकले तो उन्होंने वही रास्ता चुना, जिन रास्तों से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह गुजरे थे। इतना ही नहीं, रोड शो के दौरान अमित शाह जहां-जहां रुके थे, राहुल ने अपना वाहन उन्हीं स्थानों पर रोका। इससे स्पष्ट है कि राहुल के पास भाजपा का अनुसरण करने के सिवा और कोई विकल्प नहीं है। प्रदेश में भाजपा की लोकप्रियता से कांग्रेस इतनी सहमी हुई है कि वह अंधविश्वास और टोने-टोटकों पर उतर आई है। हाल ही में राहुल के दौरे को देखते हुए उनका मंच उत्तर दिशा की ओर बनाने का फैसला लिया गया, क्योंकि दक्षिण दिशा को हिंदू धर्म में अशुभ माना गया है। तर्क यह दिया गया कि पिछले विधानसभा चुनाव में मंच दक्षिण की ओर ही था, इसलिए कांग्रेस हारी थी! महत्वपूर्ण बात यह है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर से अपनी हर योजना या यात्रा का शुभारंभ करते हैं। इसे देखते हुए कांग्रेस नेता बार-बार महाकाल मंदिर माथा टेकने जाने लगे हैं। चुनाव से पहले उन्हें महाकाल की याद कभी नहीं आई। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अंचल में कद्दावर नेता का नहीं होना। वहीं, भाजपा के पास कैलाश विजयवर्गीय, सुमित्रा महाजन और नंदकुमार सिंह चौहान सरीखे लोकप्रिय चेहरे हैं।
उधर, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंगपा), जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) भी अनुसूचित जाति की सीटों पर अपनी ताकत दिखा रही है, लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति हमेशा दो ध्रुवीय रही है। यहां मुकाबला हमेशा कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होता आया है। बसपा, सपा जैसे क्षेत्रीय दल दशकों तक चुनाव लड़ने के बाद भी प्रदेश में अपनी जमीन तैयार नहीं कर सके हैं। गोंगपा भी एक पुरानी राजनीतिक पार्टी है, लेकिन यह भी अब तक निष्प्रभावी ही रही है। इसलिए जय आदिवासी युवा शक्ति चुनावी नतीजों पर असर डालेगा, राजनीतिक विश्लेषक ऐसा नहीं मानते। अगर मालवा का इतिहास देखें तो यहां भी भाजपा मजबूत है। जनसंघ के जमाने से ही यहां से सुंदरलाल पटवा, वीरेंद्र सकलेचा, कैलाश जोशी जैसे दिग्गज नेता निकले हैं, जिन्होंने प्रदेश की राजनीति पर अपनी छाप छोड़ी है।